उप्र के पुलिस महानिदेशक रहे डॉ. विक्रम सिंह और सीबीआई के पूर्व विशेष निदेशक एमएल शर्मा के आकलन हैं कि राम मंदिर चंदा-चढ़ावा चोरी का मामला शायद ही किसी निष्कर्ष तक पहुंचे, क्योंकि जांच के नाम पर जो किया जा रहा है, उसमें कई छिद्र हैं और वह सवालिया भी है। बड़ी आरामदेह जांच चल रही है। जांच के नाम पर तमाशा किया जा रहा है। अहम और संदेहास्पद सवाल यह है कि जिन 8 आरोपितों को पुन: 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया है, उनकी रिमांड पुलिस ने क्यों नहीं मांगी? यदि रिमांड नहीं है, तो आरोपितों से पूछताछ, सवाल-जवाब कैसे किए जाएंगे? पूछताछ नहीं होगी, तो कथित अपराधियों से बरामदगी कैसे होगी? अपराध के सुराग और नेटवर्क कैसे खुलेंगे? बरामदगी तभी महत्वपूर्ण और कानूनी है, जब आरोपित कबूल करें और खुलासा करें कि चोरी का धन, आभूषण आदि कहां रखे हैं? पैसे का कहां निवेश किया गया है? जब तक ये जानकारियां पुष्ट, सत्यापित नहीं होंगी, तब तक अपराध साबित नहीं किया जा सकता। ये दोनों शीर्ष पुलिस अधिकारी मानते हैं कि जो कार्रवाई ट्रस्ट ने की और करीब 80 लाख रुपए की बरामदगी विशेष जांच टीम से भी छिपाई और प्राथमिकी 20 दिन के बाद दर्ज कराई गई, इन सबके बीच इतने छिद्र हैं कि जांच किसी निष्कर्ष या नतीजे तक पहुंचने की उम्मीद क्षीण है। गौरतलब है कि विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने खुलासा किया है कि बीती 5 जून को राम मंदिर ट्रस्ट ने खुद प्राथमिक जांच कराई। पुलिस की मदद ली गई और आरोपित अविनाश शुक्ला के घर से करीब पांच लाख रुपए नकदी का काला बैग बरामद किया गया, लेकिन 7 जून को ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल ने ‘चोरी’ से इंकार किया। कहा कि कुछ उल्लेखनीय बात नहीं हुई। पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह इसे ट्रस्ट की ‘गैर-कानूनी’ हस्तक्षेप मानते हैं। पुलिस किसके आदेश पर उस छापेमारी में शामिल हुई? उनका सवाल है कि रुपए बरामद होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई गई? दरअसल हमारा भी यह मानना है कि पहली बरामदगी और 25 जून को प्राथमिकी दर्ज कराने के बीच 20 लंबे दिनों का फासला था। उस दौरान आरोपितों और उनके आकाओं ने सबूत मिटा दिए होंगे, चोरी की रकम ठिकाने लगा दी होगी और उसके बावजूद अयोध्या पुलिस ने आरोपितों को रिमांड पर नहीं लिया, तो जाहिर है कि जांच का निष्कर्ष नहीं निकलेगा। क्या चंदा-चढ़ावा चोरी का इतना संवेदनशील, भ्रष्ट मामला ‘बेनतीजा’ भी रह सकता है? साफ लगता है कि ट्रस्ट के स्तर पर बहुत कुछ छिपाया जा रहा है, लिहाजा अपराध में बराबर की भूमिका चंपत राय बंसल, अनिल मिश्रा आदि की भी है! पुलिस ने चंपत राय से भी पूछताछ की है और उनका बयान दर्ज कर लिया गया है, लेकिन उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है और न ही उन्हें आरोपित करार दिया गया है। क्यों…? आश्चर्य यह है कि पुलिस ने 8 आरोपितों के घर पर छापेमारी की। नकदी, आभूषण और महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए जाने का दावा भी किया जा रहा है।

आरोपितों के परिजनों से भी पूछताछ की गई है। फिर भी अदालत में पुलिस ने आरोपितों की रिमांड क्यों नहीं मांगी? क्या पुलिस सब कुछ जानती है? क्या पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य जुटा लिए हैं? हमें तो राजनीतिक दबाव, आरोपितों को संरक्षण, सांठगांठ का मामला लगता है। ‘बड़ी मछलियां’ डर रही होंगी कि ये ‘छोटी मछलियां’ कहीं सच न उगल दें और ‘मगरमच्छ’ जाल में न फंस जाएं! गौरतलब यह भी है कि प्रभु श्रीराम के मंदिर में व्यापक, अनवरत चोरी की जाती रही, उसकी जांच तो अभी जारी है, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के आंदोलन का मुद्दा उछाल दिया है। उसमें सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को भी लपेटने की कोशिश की गई है। क्या 2027 के विधानसभा चुनाव का बड़ा मुद्दा चंदा-चढ़ावा चोरी भी बन सकता है? जांच तो उन राम-शिलाओं की भी होनी चाहिए, जो चांदी की बनी थीं। साथ में दीपक और फूल भी चांदी के थे। देश के करीब 5 लाख गांवों में 100-100 रुपए की पर्ची काट कर धन इक_ा किया गया था। कहां है वह धन? कौन हिसाब देगा? इस मामले में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और घपला करने वालों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। भविष्य में इस तरह का घपला न हो, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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