यदि एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियामक अधिनियम) संशोधन बिल संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के विचारार्थ भेजा जाता है, तो इसके साफ मायने हैं कि यह बिल लटक गया। बेशक जेपीसी में भाजपा-एनडीए सांसदों का बहुमत होगा और अध्यक्ष भी उन्हीं का होगा, लेकिन विमर्श, सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं, प्रभावित क्षेत्रों-संगठनों के तर्क और पक्ष-विपक्ष की टकरावपूर्ण राजनीति के मद्देनजर बिल पर सम्यक विचार करने में 4-6 महीने का वक्त लगना स्वाभाविक है। जेपीसी की रपट के बाद भी संसद में सहमति बन पाएगी और बिल सहजता से पारित होगा, इसके आसार नगण्य हैं। इस कानून में संशोधन करना और उसे सख्ती से लागू करना इसलिए बेहद जरूरी है, क्योंकि एफसीआरए के जरिए देश की सुरक्षा, संप्रभुता, लोकतंत्र को बदनाम करने की कोशिशें जारी रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ दुराग्रही अभियान, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समर्थक पत्रकारिता-लेखन और ‘नवजात’ कॉकरोच जनता पार्टी आदि को भी विदेशी पैसा मिलता रहा है। यह कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं है, बेशक कोई कुछ भी स्पष्टीकरण देता रहे या दावे करे, लेकिन विदेशी फंडिंग मिलती रही है। अमरीका, ब्रिटेन के कौन से फाउंडेशन और संगठन भारत में देश-विरोधी हरकतों को पैसा दे रहे हैं, उनके ब्यौरे स्पष्ट हैं। भारतीय स्टेट बैंक और केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास तमाम रिकॉर्ड दर्ज हैं। अमरीकी फंडिंग भारत में उसके राजदूत सर्जियो गोर के जरिए भी मिलती रही है। एफसीआरए में स्पष्ट प्रावधान है कि राजनेता, चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवार, जज-न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी और पत्रकार आदि विदेशी अंशदान नहीं ले सकते। इस प्रावधान का उल्लंघन किया जा रहा है और मीडिया में वेबसाइट, पोर्टल, प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभियाननुमा लेखन वाली एक महिला पत्रकार और यहां तक कि ‘कॉकरोचों’ को भी विदेशी फंडिंग मिल रही है। गृह मंत्रालय ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनमें 15,491 डॉलर ‘कॉकरोच’ के नाम भी दर्ज हैं। पुणे में पूर्व न्यायाधीशों और न्यायविदों के एक ताकतवर एनजीओ को भी विदेशों से पैसा मिलता रहा है।

इस सूची में राहुल गांधी समर्थक संगठन का नाम भी है। भारत में औसतन 18,500-22,963 करोड़ रुपए सालाना की विदेशी फंडिंग आती रही है। कुल 52,159 एनजीओ पंजीकृत किए गए थे। उनमें से अब 14,455 ही सक्रिय हैं। 22,498 एनजीओ के लाइसेंस रद्द कर दिए गए और 15,206 संस्थाओं के लाइसेंस ‘डीम्ड एक्सपायर्ड’ माने गए। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि पांच साल की अवधि पूरी होने के बाद लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराया गया। अमरीका के संगठनों, सांसदों और ईसाई प्रतिनिधियों ने एफसीआरए संशोधन बिल का सबसे अधिक विरोध किया है। अमरीकी कांग्रेस (संसद) में यहां तक धमकी दी गई कि यदि यह संशोधन बिल भारतीय संसद में पारित किया जाता है, तो ‘रणनीतिक साझेदारी’ के संबंध प्रभावित होंगे। क्या अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप ऐसा जोखिम उठा सकते हैं? भारत में भी कांग्रेस समेत लगभग सभी विपक्षी दलों ने बिल के विरोध के ऐलान किए हैं। उन्होंने बिल को ‘अल्पसंख्यक-विरोधी’ करार दिया। ईसाई समुदाय के प्रतिनिधि गृहमंत्री अमित शाह से मिले। उन्हें आश्वस्त किया गया कि बिल किसी के भी खिलाफ नहीं है। अलबत्ता विदेशी फंडिंग को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह, निश्चित काम के लिए अंशदान, देशहित तय करने की व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है, लिहाजा यह बिल जरूरी है। यह भी साफ किया गया कि विदेशी फंडिंग किसी भी तरह के ‘धर्मान्तरण’ के लिए नहीं होगी। भारत में मुसलमानों के मदरसों और संगठनों को अरब देशों और अन्य इस्लामिक देशों, संगठनों से खूब पैसा मिलता रहा है। एफसीआरए उसे सिर्फ कानूनी रूप देगा और नियंत्रित करेगा कि पैसा किसलिए बाहर से आया है? देश में सबसे अधिक एनजीओ 2104 तमिलनाडु में सक्रिय हैं। उनमें से कुछ ने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना का जमकर विरोध किया था। महाराष्ट्र में 1583 एनजीओ सक्रिय हैं, लेकिन जिन एनजीओ, संस्थाओं के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए, उनमें बिहार सबसे ऊपर है। उसके अलावा, उप्र, नगालैंड, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, मणिपुर, पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक लाइसेंस रद्द किए गए। सवाल सुरक्षा, संप्रभुता, लोकतांत्रिक ढांचे का है।

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