अग्नि दुर्घटनाओं की तरह तो नहीं, पर मौटे तौर पर सरकारों को इस बात का अंदाजा है कि देश के किन इलाकों में भूकंप आ सकता है। जिस देश में साफ नजर आने वाले खतरे की नेताओं और सरकारों को परवाह नहीं, उन्हें छिपे हुए अचानक आने वाले खतरों से देश के लोगों को बचाने की क्या परवाह होगी…

वेनेजुएला में एक मिनट के अंदर दो बड़े विनाशकारी भूकंप में करीब दो हजार लोगों की मौत हो गई। इस प्राकृतिक आपदा में करीब 10 हजार लोग घायल हो गए। बगैर किसी चेतावनी के आने वाली भूकंप जैसी आपदाएं सरकारों को चेताती हैं कि पहले से बचाव के उपाय किए जाएं, ताकि कम से कम जानमाल का नुकसान हो सकें। भूकंप का खतरा भारत में भी है। देश के कई हिस्सों में कई बार शक्तिशाली भूकंपों ने भारी तबाही मचाई है। सवाल यह है कि पूर्व में आए इन भूकंपों से देश की सरकारों ने कोई सबक सीखा है। क्या देश में ऐसे इंतजाम किए गए हैं कि भूकंप आने पर कम से कम जानमाल का नुकसान हो। दरअसल भारत के राजनीतिक दलों और सरकारों से किसी भी प्राकृतिक आपदा से पहले और बाद में बचाव की ज्यादा उम्मीदें नहीं की जा सकती हैं। कारण साफ है, केंद्र और राज्यों की सरकारों को सामने स्पष्ट नजर आते हुए खतरों से लोगों को बचाने का कोई इंतजाम नहीं हो, वे भूकंप जैसे छिपे हुए खतरों से कैसे बचाएंगे। दिल्ली के बाद लखनऊ में आग से 15 लोगों की मौत हो गई। ऐसी लाखों इमारतें अकेले उत्तर प्रदेश में हैं, जिनमें आग से बचाने के कोई उपाय नहीं किए गए हैं। जब दिल्ली में आग लगी तभी राज्यों की सरकारों को सतर्क हो जाना चाहिए था। लेकिन सरकारों ने लोगों की जान की परवाह नहीं की।

अगले ही दिन बिहार के मुजफ्फरपुर में आग ने पांच-छह मरीजों को लील लिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के नोएडा और फिर मध्य प्रदेश के इंदौर में आग ने फ्लैट और शोरूम खाक कर दिए। तीन दिन में आग की चार भयानक घटनाओं ने लोगों को डरा दिया है और करीब 26 लोगों की जलकर या काले धुएं की चपेट में आकर मौत हो गई है। राष्ट्रीय और राज्य स्तर के अनुमानों के अनुसार, वाणिज्यिक और आवासीय क्षेत्रों के 60 प्रतिशत से अधिक छोटे और मध्यम भवन बिना वैध फायर एनओसी के चल रहे हैं। देश भर में दमकल केंद्रों में 97.5 प्रतिशत, दमकल कर्मियों में 96.2 प्रतिशत और अग्निशमन उपकरणों में लगभग 80 प्रतिशत तक की कमी है। देश के लगभग हर बड़े शहर में सुरक्षा नियमों को दरकिनार किया जा रहा है। यह खतरा ऐसा है, जो साफ दिखाई देता है। इससे बचाव के शत-प्रतिशत इंतजाम भी किए जा सकते हैं। इसके बावजूद राज्यों और केंद्र ने पूर्व में हुए ऐसे हादसों से सबक नहीं सीखा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है, सामने स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहे खतरे से निपटने में सरकारें नाकाम हैं, तो भूंकप जैसी अचानक आने वाली आपदा और उसके भयावह रूप से सरकारें कैसे निपटेंगी। जबकि भूगर्भ वैज्ञानिक साफ चेता चुके हैं कि देश के कितने हिस्सों में कभी भी भीषण भूकंप आ सकता है। पिछले दो दशकों में देश में 10 बड़े भूकंप आए हैं, जिनमें 20000 से अधिक लोगों की जान गई है। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी के मुताबिक भारत में करीब 20 करोड़ इमारतें भूकंपीय क्षेत्र 4 और 5 में आती हैं। इनमें से कई इमारतें 30-40 साल पहले बनी थीं और इनमें से कई इमारतें नेशनल बिल्डिंग कोड्स का पालन नहीं करती हैं। भूकंप संभावित क्षेत्रों में जोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है, वहीं जोन-5 में ज्यादा प्रबल रहती है। दिल्ली-एनसीआर का इलाका सीस्मिक जोन-4 में आता है और यही वजह है कि उत्तर भारत के इस क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियां तेज रहती हैं। भूगर्भ विशेषज्ञों ने भारत के करीब 59 फीसदी भू-भाग को भूकंप संभावित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया है।

जानकार सीस्मिक जोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज्यादा बताते हैं। गौरतलब है कि मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सीस्मिक जोन-3 की श्रेणी में आते हैं। जबकि भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है, जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। नेशनल सेंटर फॉर सिसमोलॉजी के मुताबिक भारत के 29 शहरों पर भूकंप का गंभीर खतरा है। इन शहरों में दिल्ली समेत नौ राज्यों की राजधानियां भी हैं। ये ज्यादातर शहर हिमालय जोन से लगे हैं। हिमालय से लगे शहर दुनिया के उन शहरों में शुमार हैं, जहां भूकंप का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। दिल्ली, पटना, श्रीनगर, कोहिमा, पुडुच्चेरी, गुवाहाटी, गंगटोक, शिमला, देहरादून, इम्फाल और चंडीगढ़ भूकंपीय क्षेत्र के जोन चार और पांच में हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) के मुताबिक ये वो शहर हैं जहां आबादी का घनत्व बहुत सघन है और ये गंगा के मैदानी भाग हैं। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि सिस्मिक जोन-4 में आने वाली राजधानी दिल्ली भूकंप के बड़े झटके से खासा प्रभावित हो सकती है। अगर यहां 7 की तीव्रता वाला भूकंप आया तो दिल्ली की कई सारी इमारतें और घर रेत की तरह भरभराकर गिर जाएंगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि दिल्ली की इमारतों में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री ऐसी है, जो भूकंप के झटकों का सामना करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं है। दिल्ली में मकान बनाने की निर्माण सामग्री ही आफत की सबसे बड़ी वजह है। दिल्ली में 1760 से अधिक अनधिकृत कॉलोनियां हैं। इन अनधिकृत कॉलोनियों में गैर-इंजीनियरिंग इमारतें बनी हैं, जिनमें भूकंप प्रतिरोध क्षमता शायद ही हो। भूकंप के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील और खतरनाक माने जाने वाले जोन पांच में भारत का पूरा पूर्वोत्तर है। इनमें जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात के साथ उत्तरी बिहार के कुछ हिस्से और अंडमान निकोबार हैं।

वहीं जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा, दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात के कुछ हिस्से और महाराष्ट्र का कुछ भाग जोन चार में हैं। गुजरात का भुज 2001 में भयावह तरीके से भूकंप की चपेट में आया था। इस भूकंप में 20 हजार लोग मारे गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2025 में आदेश दिया था कि ऐसी सभी इमारतें, जिनमें 100 या उससे अधिक लोग रहते हैं, उनके ऊपर भूकंप-रोधी होने वाली किसी एक श्रेणी का साफ उल्लेख होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश अन्य जनहित के आदेशों की तरह सरकारी फाइलों में दफन हो गया। अग्नि दुर्घटनाओं की तरह तो नहीं, पर मौटे तौर पर सरकारों को इस बात का अंदाजा है कि देश के किन इलाकों में भूकंप आ सकता है। जिस देश में साफ नजर आने वाले खतरे की नेताओं और सरकारों को परवाह नहीं, उन्हें छिपे हुए अचानक आने वाले खतरों से देश के लोगों को बचाने की क्या परवाह होगी। देश में ऐसा एक भी राज्य नहीं है, जहां की किसी भी तरह की इमरातें, अग्नि दुर्घटनाओं से सुरक्षित हों, या उनमें अग्नि दुर्घटना होने पर बचाव के पूरे कानूनी प्रावधान हों, ऐसे में छिपे हुए अचानक आए खतरनाक भूकंप से बचाने के लिए इंतजाम भगवान भरोसे है। होना तो यह चाहिए था कि इतने अग्निकांडों के बाद देश में सरकारों की नींद खुल जानी चाहिए थी। देश के जितने भी व्यावसायिक या निजी इमारतें हैं, उनमें आग से बचाव के इंतजामों की तत्काल जांच की जानी चाहिए थी। आग लगने पर लोगों की जान खतरे में डालने वाले ऐसे भवनों को तत्काल सील किया जाना चाहिए था। इससे भी महत्वपूर्ण जिन विभागों की अग्निशमन के उपायों की जांच करने की जिम्मेदारी है, उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए थी। एक के बाद एक अग्नि दुर्घटनाएं होती रहीं, किन्तु सरकारों की नींद नहीं खुली।-योगेंद्र योगी

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