हर वर्ष कहानी वही होती है। मानसून देश के विभिन्न राज्यों में दस्तक देता है और भारत मानो उसके सामने घुटने टेक देता है। सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, गड्ढे खाइयों का रूप ले लेते हैं, अंडरपास जलाशयों में तबदील हो जाते हैं, जाम नालियां उफनने लगती हैं, बदबूदार सीवर का पानी घरों में घुस जाता है, लोग खुले मैनहोल में समा जाते हैं, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन चरमराने लगते हैं, पुल ढह जाते हैं, भूस्खलन गांवों को निगल जाता है और हमारी तथाकथित ‘विश्वस्तरीय’ स्मार्ट सिटी प्रशासनिक लकवे की तैरती हुई नुमाइश बन जाती है। विकास का मुखौटा उतर जाता है। यह विफलता का वार्षिक अनुष्ठान है।

अफसोस, जब आम लोग बारिश से पैदा हुई आपदा से जूझ रहे होते हैं, तब हमारे नेता अपनी परंपरागत राजनीतिक रस्म अदायगी में व्यस्त दिखाई देते हैं। वे मौतों पर शोक जताते हैं, संवेदनाएं व्यक्त करते हैं और सहायता का भरोसा दिलाते हैं। दूसरी ओर, नौकरशाही वातानुकूलित कमरों में औपचारिक बैठकों और भोज के दौरान आपदा के कारणों और उसके प्रभावों का विश्लेषण करती है। उनके सुझाव और समाधान भी उफनते नालों की तरह बह जाते हैं। सभी यह मानकर संतुष्ट हो जाते हैं कि उन्होंने अपना कत्र्तव्य निभा दिया। फिर वही घिसा-पिटा वाक्य दोहराया जाता है-‘इससे सबक लिया जाएगा।’ वस्तुत: यह नौकरशाही की विफलता का आधिकारिक गान बन चुका है।

सवाल यह है कि क्या वास्तव में किसी को इसकी चिंता है? मानसून हर वर्ष तबाह शहरों और बर्बाद बुनियादी ढांचे की याद छोड़ जाता है लेकिन कोई जवाबदेह नहीं ठहराया जाता। आखिर सरकार तब ही क्यों जागती है, जब लाखों लोग बेघर हो जाते हैं और करोड़ों रुपए की संपत्ति नष्ट हो जाती है? विडंबना यह भी है कि राजनीतिक नेतृत्व अब भी यह मानता है कि केवल धनराशि मंजूर कर देने से समस्या का समाधान हो जाएगा। जबकि न तो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और न ही राज्य आपदा प्रबंधन बोर्ड अपनी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कर पाते हैं। विशेषज्ञों की सलाह की अनदेखी होती है और फिर दोष पिछली सरकारों पर मढ़ दिया जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आम आदमी महज आंकड़ों में बदलकर रह गया है, जिनका राजनीतिक सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है। यह संवेदनहीन राजनीति और निष्क्रिय प्रशासन का जीवंत प्रमाण है। हर काम ‘कामचलाऊ’ तरीके से होता है। सभी सरकार को कोसते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं कि बारिश शासन-प्रशासन की सबसे कठोर और निष्पक्ष परीक्षा लेने वाली प्रकृति की शक्ति है।

स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए है कि केंद्र और राज्य सरकारों की उदासीनता पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों तक को नहीं बख्श रही। लालच में अंधाधुंध निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, जिससे ये क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति और अधिक संवेदनशील बनते जा रहे हैं। वर्ष 2022 में उत्तराखंड के जोशीमठ में आई दरारें और बेंगलुरु के प्रतिष्ठित आई.टी. पार्कों में आई बाढ़ भी हमें कोई सबक नहीं सिखा सकी। निस्संदेह, भारत की समस्या मानसून नहीं, बल्कि सुशासन का अभाव है। हर वर्ष बारिश से पहले नगर निकाय बड़े-बड़े दावे करते हैं कि मानसून से निपटने की पूरी तैयारी कर ली गई है लेकिन जैसे ही बारिश शुरू होती है, वही स्थान सबसे पहले जलमग्न हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो केवल बारिश ही इन तैयारियों से अनजान हो। सबसे दुखद पहलू यह है कि हमने विफलता को सामान्य मान लिया है। जलमग्न सड़कें अब मौसमी असुविधा भर समझी जाती हैं। पुलों का ढहना भी लोगों को चौंकाता नहीं। जिस जलभराव से अनेक देशों में राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है, उसे भारत में ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। बारिश समाप्त होते ही सुधार की चर्चा भी ठंडी पड़ जाती है और अगले मानसून तक केवल नुकसान का दायरा बढ़ जाता है।

भारत के मानसून संकट की सबसे गंभीर समस्या जवाबदेही का अभाव है। बार-बार बुनियादी ढांचा विफल होता है लेकिन शायद ही कभी किसी पर ठोस कार्रवाई होती है। जांच समितियां गठित होती हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं और नए वादे किए जाते हैं, परंतु व्यवस्था में सुधार नहीं आता। आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि आपदा आने से पहले रोकथाम पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। संक्षेप में कहें तो मानसून न मित्र है, न शत्रु। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसने हजारों वर्षों से भारत का जीवन पोषित किया है। वास्तविक शत्रु है लापरवाही, अव्यवस्थित योजना, कमजोर शहरी प्रबंधन, उपेक्षित आधारभूत संरचना और नियमों के पालन में ढिलाई। इसके साथ यह सुविधाजनक विश्वास भी जुड़ा है कि जनता की स्मृति बाढ़ के पानी से भी तेजी से सूख जाएगी। 

मानसून वरदान बनेगा या अभिशाप, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक नेतृत्व अल्पकालिक राजनीतिक लाभ की बजाय दीर्घकालिक आपदा-रोधी क्षमता को प्राथमिकता देता है या नहीं। जब तक भारत तात्कालिक राजनीतिक दिखावे की जगह दीर्घकालिक तैयारी, आत्मसंतोष की जगह दक्षता और बहानों की जगह जवाबदेही को नहीं अपनाएगा, तब तक बारिश की पहली बूंदें केवल सड़कें ही नहीं बहाएंगी, बल्कि यह भ्रम भी धो देंगी कि भारत का बुनियादी ढांचा भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार है।

देश के पास इंजीनियरिंग कौशल, वित्तीय संसाधन और तकनीकी दक्षता भी उपलब्ध है, जिससे वह मानसून का कहीं बेहतर प्रबंधन कर सकता है। कमी केवल एक चीज की है-दृढ़ और निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति की। आवश्यकता इस बात की है कि पूरे वर्ष शहरी नियोजन, भवन निर्माण नियमों के कड़ाई से पालन, सार्वजनिक अवसंरचना के नियमित रखरखाव और विभिन्न एजैंसियों के बीच प्रभावी समन्वय को प्राथमिकता दी जाए, न कि केवल मानसून आने से कुछ सप्ताह पहले औपचारिक तैयारियों का प्रदर्शन किया जाए। भारत यदि विश्वस्तरीय राजमार्ग, हवाई अड्डे और डिजिटल अवसंरचना विकसित कर सकता है, तो वह जलवायु-अनुकूल शहर, आधुनिक जल निकासी प्रणाली, पुनर्जीवित आद्र्रभूमियां, सख्त भवन मानक और वैज्ञानिक शहरी नियोजन भी विकसित कर सकता है। इसके लिए केवल राजनीतिक संकल्प की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि भारत आपदा के बाद राहत पहुंचाने की संस्कृति से आगे बढ़कर आपदा की रोकथाम की नीति अपनाए। समय की दीवार पर साफ लिखा दिखाई दे रहा है कि किसी राष्ट्र की प्रगति इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह अनुमानित आपदाओं के बाद कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देता है, बल्कि इस बात से कि वह उन्हें पहले ही रोक पाने में कितना सक्षम है।-पूनम आई. कौशिश

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