अभी कुछ समय पहले तक यदि कोई युवती कैमरे के सामने खड़ी होकर रोटी बेलती, बच्चों के लिए भोजन बनाती, पति के लिए टिफिन तैयार करती और यह कहती कि उसे अपने परिवार के साथ रहना पसंद है, तो आधुनिक विमर्श उसे पिछड़ेपन का प्रतीक घोषित करने में देर नहीं लगाता। लेकिन आज वही दृश्य करोड़ों लोगों को आकॢषत कर रहा है।

अमरीका की हन्ना नीलमैन और नारा स्मिथ जैसी सोशल मीडिया हस्तियां केवल लोकप्रिय नहीं हुईं, वे एक बहस बन गईं। उनके वीडियो में कोई क्रांति नहीं होती, बस एक शांत रसोई, बच्चों की खिलखिलाहट, घर की लय और बिना हड़बड़ी का जीवन। आश्चर्य यह है कि इन्हें सबसे अधिक वही पीढ़ी देख रही है जिसे हम ‘जेन-काी’ कहते हैं। आज, 21वीं सदी के तीसरे दशक में एक विचित्र दृश्य सामने है। सोशल मीडिया पर लाखों युवतियां लिनन के सादे वस्त्रों में रोटी सेंकती दिखाई देती हैं, बगीचे से फूल तोड़ती हैं, बच्चों के लिए भोजन बनाती हैं, पति के लौटने की प्रतीक्षा करती हैं और इस जीवन को गर्व से ‘ट्रैड वाइफ’ अर्थात (ट्रेडिशनल/पारंपरिक पत्नी) का नाम देती हैं। सोशल मीडिया से उपजा यह शब्द कुछ ही वर्षों में पश्चिमी दुनिया में करोड़ों बार देखा और सुना जाने लगा। प्रश्न उठना स्वाभाविक है, क्या यह नारीवाद की पराजय है? क्या आधुनिक स्त्री सचमुच फिर से अतीत की ओर लौटना चाहती है? या कहानी कुछ और है?

पहली दृष्टि में यह प्रश्न दृश्य जितना सरल दिखाई देता है, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है। अक्तूबर, 2025 में  किंग्स कॉलेज लंदन के ग्लोबल इंस्टीच्यूट फॉर वुमन्स लीडरशिप  द्वारा 18 से 34 वर्ष की महिलाओं पर किए गए अध्ययन ने एक रोचक तथ्य सामने रखा। लगभग 59 प्रतिशत युवतियों ने माना कि ‘ट्रैड वाइफ’ की सोच समाज पर नकारात्मक या हानिकारक प्रभाव डाल सकती है, जबकि केवल लगभग 5 में से 1 महिला ने इसे सकारात्मक माना। यदि ऐसा है, तो फिर यह प्रवृत्ति इतनी लोकप्रिय क्यों हो रही है? शोधकत्र्ताओं का उत्तर विचारणीय था। उनके अनुसार महिलाओं को पारंपरिक पुरुष-प्रधान व्यवस्था की लालसा नहीं है लेकिन वे उस जीवन से थक चुकी हैं, जिसमें उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे पेशेवर यानि करियर की दुनिया में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करें, आर्थिक रूप से पूर्णत: आत्मनिर्भर भी रहें और घर की अधिकांश जिम्मेदारियां भी निभाएं। यह आंदोलन परंपरा का उत्सव कम और मानसिक थकान का मौन प्रतिरोध अधिक प्रतीत होता है। यहीं से चर्चा का केंद्र बदल जाता है। दरअसल दशकों तक स्त्रियों से कहा गया कि स्वतंत्रता का रास्ता केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा से होकर जाता है। बताया गया कि पहचान परिवार से नहीं, पद से बनेगी, सम्मान रिश्तों से नहीं, वेतन से मिलेगा और सफलता का शिखर घर नहीं, पेशेवर दुनिया में ऊंची कुर्सी है। लेकिन आज वही पीढ़ी पूछ रही है, यदि यही सफलता है, तो सुकून कहां है?

यदि किसी विचारधारा ने स्त्री से कहा था कि वह हर बंधन से मुक्त होगी, तो फिर आज वह पहले से अधिक तनावग्रस्त क्यों दिखाई देती है? यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल काम के घंटे बढ़ जाना, परिवार और बच्चों को समय न देने का अपराधबोध बढ़ जाना और अकेलापन बढ़ जाना रह गया है, तो क्या उस स्वतंत्रता की परिभाषा पर पुनॢवचार नहीं होना चाहिए?  समस्या यह नहीं कि स्त्री ने काम करना शुरू किया, समस्या यह है कि उसे यह विश्वास दिलाया गया कि घर और परिवार को महत्व देना उसकी महत्वाकांक्षा की हार है। यहीं आधुनिक नारीवाद अपनी सबसे बड़ी वैचारिक भूल करता दिखाई देता है। उसने विकल्प देने का दावा किया लेकिन धीरे-धीरे उसने एक नया आदर्श गढ़ दिया-ऐसी स्त्री, जो लगातार उत्पादक हो, लगातार सफल हो, लगातार स्वयं को सिद्ध करती रहे।

नतीजन आज पश्चिम की अनेक युवतियां यह नहीं कह रहीं कि उन्हें अधिकार नहीं चाहिए। वे यह कह रही हैं कि उन्हें ऐसा जीवन चाहिए, जिसमें अधिकारों के साथ अपनापन भी हो, आय के साथ आत्मीयता भी हो और उपलब्धियों के साथ घर-परिवार का सुकून भी हो। यह विद्रोह रसोई के पक्ष में नहीं है, यह उस जीवन के विरुद्ध है जिसने सफलता को थकान का दूसरा नाम बना दिया। आज का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि परिवार और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी हैं। भारतीय दृष्टि कभी ऐसा नहीं मानती थी। यहां परिवार बंधन नहीं, सहारा था, दायित्व बोझ नहीं, संबंधों का विस्तार था। आधुनिकता ने व्यक्ति को स्वतंत्र तो बनाया लेकिन कई बार उसे अकेला भी छोड़ दिया। यही कारण है कि आज ‘ट्रैड वाइफ’ का आकर्षण केवल एप्रन या रसोई नहीं, उसका आकर्षण वह भाव है कि कोई घर है जहां लौटना सार्थक लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर स्त्री गृहिणी बनना चाहती है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि किसी स्त्री का करियर उन्मुख होना गलत है। लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि उस विचारधारा पर प्रश्न उठ रहे हैं, जिसने जीवन के एक ही मॉडल को प्रगति का प्रमाणपत्र बना दिया था। यदि प्रगति स्त्री से उसका घर, उसका समय, उसके रिश्ते और उसकी मुस्कान छीन ले, तो क्या उसे अब भी प्रगति कहा जाना चाहिए?

शायद इसलिए यह विमर्श किसी एप्रन, किसी रसोई या किसी वायरल वीडियो का नहीं है, यह विर्मश उस सभ्यता का है, जिसने स्त्री को आकाश तो दिया, पर कई बार उसके पैरों तले की धरती खींच ली। शायद ‘ट्रैड वाइफ’ आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आज की स्त्री केवल आॢथक स्वतंत्रता नहीं, भावनात्मक स्थिरता भी चाहती है। वह केवल करियर नहीं, परिवार भी चाहती है। इसलिए वास्तविक संघर्ष नारीवाद और परंपरा के बीच नहीं है। वास्तविक संघर्ष उस जीवन-दर्शन के विरुद्ध है, जिसने स्त्री की सफलता को उसकी पेशेवर सफलता से मापना शुरू कर दिया है। शायद प्रश्न यह नहीं है कि स्त्री घर लौटना चाहती है या दफ्तर जाना चाहती है। प्रश्न यह है कि क्या हमने ऐसा समाज बनाया है, जहां उसे दोनों में से किसी एक को चुनने की विवशता न हो? क्योंकि स्वतंत्रता का सर्वोच्च रूप विकल्पों की बहुलता है, न कि किसी एक जीवन-पद्धति को आधुनिकता और दूसरी को पिछड़ेपन का प्रमाणपत्र दे देना। और संभवत: आने वाला समय इसी सत्य को पुन: खोजने वाला है।-डा. नीलम महेंद्र

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
July 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
2728293031