सत्ता की लत बड़ी विचित्र होती है। कोई व्यक्ति सत्ता में जितने लंबे समय तक रहता है, उतना ही वह शिष्टाचार और नियमों के पालन को देशभक्ति और असहमति को देशद्रोह समझने लगता है। उसे लगने लगता है कि उसके खिलाफ उठने वाला हर नारा राष्ट्र पर हमला है, हर विरोध किसी साजिश का हिस्सा है और सवाल पूछने वाला हर नागरिक उसका दुश्मन है। जब जेन-काी के नेतृत्व में कॉकरोच जनता पार्टी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी, तो उसका सामना सरकार के बैरिकेड, लाठीचार्ज, पैलेट गन, हिरासत और ऐसी पुलिस से हुआ, जो अक्सर विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार मानने की बजाय कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखती है। दूसरी ओर, सरकार भी नागरिकों की बात सुनने के प्रति आश्वस्त नजर आती है।
विडंबना यह नहीं कि पुलिस बल का इस्तेमाल करती है या कार्रवाई के दौरान अति हो जाती है। लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को बल प्रयोग की जरूरत पड़ती है। असली आक्रोश इस बात को लेकर है कि जब बल का इस्तेमाल हद से आगे बढ़ जाता है, तब जवाबदेही पूरी तरह गायब हो जाती है और किसी को दोषी नहीं ठहराया जाता। नतीजा सामने है-पुलिस भीड़ में नागरिकों को देखने की बजाय भीड़ देखती है, शिकायतों की बजाय खतरा नजर आता है और अधिकारों के सम्मान से पहले आज्ञाकारिता की अपेक्षा की जाती है। सवाल उठता है, क्या कभी किसी अधिकारी की नौकरी इसलिए गई कि उसने अनावश्यक लाठीचार्ज का आदेश दिया? शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक कार्रवाई के बाद कितने अधिकारियों पर आपराधिक मुकद्दमा चला? कितने वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर लिए गए फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा हुई? पुलिस द्वारा संवैधानिक सीमाएं लांघने पर कितने पीड़ितों को मुआवजा मिला? पुलिस कार्रवाई के संवैधानिक दायरे से बाहर जाने पर कितने गृह मंत्रियों ने माफी मांगी? इन सवालों के जवाब व्यवस्था में आई विकृति की ओर इशारा करते हैं।
कांस्टेबल आसान बलि का बकरा बन जाते हैं, जबकि आदेश देने वाले अधिकारी सुरक्षित रहते हैं। सरकार किसी भी भूमिका से इंकार कर देती है (जिलाधिकारी से पूछिए)। वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों का बचाव करते हैं। आंतरिक जांचें संस्थागत आत्मरक्षा की कवायद बन जाती हैं। कुछ महीने बाद सभी आगे बढ़ जाते हैं, सिवाय उन लोगों के, जिनकी हड्डियां टूट चुकी होती हैं या जिनका व्यवस्था से विश्वास चकनाचूर हो चुका होता है। हर पुलिस अधिकारी तक एक बेहद स्पष्ट संदेश पहुंचता है-अत्यधिक बल प्रयोग करने का जोखिम न्यूनतम है लेकिन संदिग्ध आदेश मानने से इंकार करने का जोखिम बहुत बड़ा। समितियां रिपोर्टें दे चुकी हैं, विशेषज्ञ सुधारों के खाके तैयार कर चुके हैं और उच्चतम न्यायालय के फैसले बार-बार पुलिस सुधार, कार्यगत स्वतंत्रता तथा राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षा की आवश्यकता रेखांकित कर चुके हैं। इसके बावजूद ये सुझाव इतिहास की धूल खाती फाइलों में दबे रह जाते हैं। मूलभूत रूप से कुछ नहीं बदलता, क्योंकि कोई भी सरकार नियंत्रण के अपने साधनों को स्वेच्छा से छोडऩा नहीं चाहती। क्यों? क्योंकि विचारधारा चाहे जो हो, सरकारों को बिना सुधार वाला पुलिस बल राजनीतिक रूप से सुविधाजनक लगता है। पुलिस सुधार मरते नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक सुविधा के हाथों उनकी हत्या कर दी जाती है और फिर उन्हें भुला दिया जाता है।
राजनेताओं को अपना आदेश लागू कराने के लिए आज्ञाकारी पुलिस चाहिए और पुलिस को मनचाही तैनाती, पदोन्नति और संरक्षण के लिए राजनीतिक संरक्षण। नतीजा एक जहरीला गठजोड़ है, जिसमें संविधान के प्रति निष्ठा पर सरकार के प्रति वफादारी अक्सर भारी पड़ जाती है। आश्चर्य नहीं कि मंत्रियों के बदलते ही पुलिस विभाग में बड़े पैमाने पर तबादले होने लगते हैं। और भी चौंकाने वाली बात यह है कि ‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2025’ के अनुसार जाति, धर्म और राजनीतिक संबद्धता पुलिस की धारणा और उसके व्यवहार को प्रभावित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 27 प्रतिशत से अधिक लोगों ने यौन उत्पीडऩ और अपहरण जैसे मामलों में भीड़ की हिंसा को उचित ठहराया, जिससे कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति को प्रभावी रूप से वैधता मिलती है। गिरफ्तारियों के मामले में केवल 41 प्रतिशत ने कहा कि प्रक्रियाओं का ‘हमेशा पालन’ किया जाता है, जबकि 21 प्रतिशत ने माना कि उनका पालन ‘कभी-कभार’ या ‘कभी नहीं’ होता।
स्पष्ट है कि जेन-काी के विरोध प्रदर्शनों को पुलिस सुधारों का उत्प्रेरक बनना चाहिए, जिन्हें सरकारें 7 दशकों से अधिक समय से टालती आ रही हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने के लिए अधिकारियों का निश्चित कार्यकाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए। भीड़ नियंत्रण में तैनात पुलिस इकाइयों के लिए बॉडी कैमरे अनिवार्य किए जाने चाहिएं और कदाचार के दोषी अधिकारियों के खिलाफ समयबद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। यदि अत्यधिक बल प्रयोग व्यवस्था की समस्या है, तो जवाबदेही नीचे नहीं, ऊपर की ओर जानी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, सुधार का हर वादा राजनीतिक रंगमंच की एक और कवायद बनकर रह जाएगा।
नागरिकों को ऐसी पुलिसिंग चाहिए, जो संविधान के एक सरल सिद्धांत को याद रखे-नागरिक राज्य का विरोधी नहीं, बल्कि संप्रभु है। लाठी का अस्तित्व उस संप्रभुता की रक्षा के लिए है, उसे दबाने के लिए नहीं। अब समय आ गया है कि हमारे राजनेता यह बहाना न बनाएं कि ‘पुलिस ने स्वतंत्र रूप से कार्रवाई की।’ अब इस कहानी पर कोई विश्वास नहीं करता। स्पष्ट है कि लोकतंत्र और बल प्रयोग से छूट की ताकत साथ-साथ नहीं चल सकते। एक प्रश्न का उत्तर मिलना आवश्यक है-क्या पुलिस केवल देश के कानून से चलेगी या सरकार के निर्देशों से?-पूनम आई. कौशिश



















