FCRA Bill 2026 | विदेशी चंदे को लेकर प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक पर देश में जारी राजनीतिक और सामाजिक बहस अब अमेरिका तक पहुंच गई है। इसी बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया पर सामने आकर विधेयक को लेकर फैल रही कई धारणाओं को खारिज किया है। उनका कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का मकसद विदेशी धन पर रोक लगाना नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्पष्ट नियम सुनिश्चित करना है।

एक बिल, पांच सवाल और बढ़ती सियासी गर्मी- क्या FCRA का असली मकसद विदेशी फंडिंग रोकना है या उसकी निगरानी मजबूत करना? राजदूत क्वात्रा के स्पष्टीकरण ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है। वहीं विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों की आपत्तियां बताती हैं कि विवाद अभी खत्म होने वाला नहीं है।

क्वात्रा ने गिनाए पांच ‘मिथक’, बताया क्या है सरकार का पक्ष

क्वात्रा ने X पर जारी सिलसिलेवार पोस्ट में कहा कि FCRA का ढांचा विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़े जोखिमों को देखते हुए बनाया गया है। उन्होंने यह धारणा खारिज की कि नया कानून भारत में सिविल सोसाइटी के लिए विदेशी सहायता का रास्ता बंद कर देगा।

उनके मुताबिक भारत में FCRA के तहत पंजीकृत हजारों संस्थाएं स्वास्थ्य, शिक्षा, शोध, राहत और मानवीय कार्यों के लिए विदेशी योगदान प्राप्त कर रही हैं। यानी सरकार का तर्क यह है कि विदेशी चंदे पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा रहा, बल्कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि पैसा कहां से आया, किस उद्देश्य के लिए आया और कहां खर्च हुआ इसका स्पष्ट रिकॉर्ड रहे।

क्वात्रा ने यह भी आंकड़ा सामने रखा कि FCRA-पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी योगदान 2010-11 में करीब 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में लगभग 2.67 अरब डॉलर हो गया। उनके अनुसार भारत में 30 लाख से अधिक गैर-सरकारी संगठन हैं, जबकि FCRA पंजीकरण वाले संगठनों की संख्या करीब 14,450 है। ऐसे में अधिकांश एनजीओ इस कानून के दायरे से बाहर हैं।

FCRA Bill 2026 : असली विवाद कहां है? संपत्ति पर नए प्रावधान ने बढ़ाई चिंता

विधेयक का सबसे संवेदनशील हिस्सा विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है। प्रस्तावित व्यवस्था में FCRA पंजीकरण रद्द होने, संस्था द्वारा पंजीकरण सरेंडर करने या नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में ऐसी संपत्तियों और विदेशी योगदान की निगरानी के लिए Designated Authority का प्रावधान किया गया है।

सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था अचानक संपत्ति छीन लेने की कार्रवाई नहीं है। उसके मुताबिक पंजीकरण बहाल होने पर संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त धन वापस किए जाने की व्यवस्था है। धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति के मामले में भी उसकी धार्मिक प्रकृति बनाए रखने का प्रावधान बताया गया है।

हालांकि यहीं विपक्ष और कुछ संस्थाओं की सबसे बड़ी आपत्ति है। आलोचकों का कहना है कि पंजीकरण खत्म होने के बाद सरकारी स्तर पर संपत्तियों पर नियंत्रण का प्रावधान कार्यपालिका को बहुत व्यापक अधिकार दे सकता है। उनका तर्क है कि इससे विदेशी सहायता पर निर्भर अस्पतालों, स्कूलों, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों के कामकाज पर असर पड़ सकता है।

क्या किसी धर्म को निशाना बना रहा है FCRA?

क्वात्रा ने इस आरोप को भी सीधे खारिज किया कि विधेयक किसी खास धर्म या समुदाय को ध्यान में रखकर बनाया गया है। उनका कहना है कि FCRA का प्रावधान धर्म, समुदाय या विचारधारा के आधार पर अलग-अलग लागू नहीं होता। सभी पात्र संगठनों के लिए एक समान नियामकीय ढांचा है।

यही मुद्दा अब भारत-अमेरिका के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिकी सांसद रिले मूर ने हाल में विधेयक के प्रावधानों पर चिंता जताते हुए दावा किया था कि इससे चर्च और धार्मिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण का रास्ता खुल सकता है तथा इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ सकता है।

भारत ने इस टिप्पणी को लेकर साफ कर दिया कि FCRA में बदलाव भारत का आंतरिक विधायी विषय है। विदेश मंत्रालय ने यह भी रेखांकित किया कि दुनिया के कई लोकतांत्रिक देश विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए अपने-अपने कानून लागू करते हैं।

अमेरिका से लेकर यूरोप तक विदेशी फंडिंग पर निगरानी

क्वात्रा ने अपने बचाव में अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी दिए। उनके मुताबिक अमेरिका में विदेशी प्रभाव और वित्तीय प्रवाह से संबंधित FARA तथा FATCA जैसे कानून हैं। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा भी विदेशी फंडिंग और प्रभाव से जुड़े नियमन लागू कर चुके हैं, जबकि ब्रिटेन की संबंधित व्यवस्था जुलाई 2025 से प्रभावी हुई और यूरोपीय संघ भी इस दिशा में कानून बना रहा है।

भारत में विदेशी योगदान का नियमन नया विचार नहीं है। FCRA का पहला कानून 1976 में आया था, जिसे 2010 में नए ढांचे से बदला गया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में भी बदलाव किए गए। 2026 का प्रस्ताव इसी नियामकीय श्रृंखला को आगे बढ़ाने के तौर पर पेश किया गया है।

यही वजह है कि क्वात्रा का मिथक बनाम तथ्य वाला स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार के सामने अब चुनौती सिर्फ विधेयक पारित कराने की नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम करने की भी है कि विदेशी धन की निगरानी के नाम पर वैध सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होगी। दूसरी ओर विपक्ष और संबंधित संस्थाओं को यह स्पष्ट करना होगा कि पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए जरूरी नियमन की सीमा आखिर कहां तय की जाए।

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