नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाएगा, जिसमें रिटायर्ड जज, पूर्व डीजीपी, पूर्व सीबीआई डायरेक्टर और अन्य लोग शामिल होंगे।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने कहा कि पैनल में शामिल किए जाने वाले अन्य सदस्यों के बारे में अलग-अलग पक्षों से सुझाव मिलने के बाद बुधवार को कमेटी बनाने का आदेश जारी किया जाएगा।
किन शिकायतों और आरोपों की होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वह दिल्ली में 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा के वीडियो फुटेज और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को जांच के लिए हाई-पावर कमेटी को सौंपने का निर्देश देगा। यह पैनल उन महिला प्रदर्शनकारियों की शिकायतों और आरोपों की भी जांच करेगा जिन्हें दिल्ली और अन्य इलाकों में विरोध मार्च के दौरान निशाना बनाए जाने की खबर थी।
अदालत ने मांगा एफआईआर का विवरण
बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से उन एफआईआर का विवरण मांगा जिनमें छात्र प्रदर्शनकारियों को आरोपी बनाया गया है और जिन्हें रद किया जाना है। इससे संकेत मिलता है कि कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है।
बेंच ने एक वकील से कहा, “छात्रों की जिंदगी दांव पर है। हमें इस पर विचार करना होगा। उनका भविष्य अभी बाकी है। उन्हें अनुच्छेद 19 के तहत विरोध करने का अधिकार है।” यह वकील छात्र प्रदर्शनकारियों के बिना माफी मांगे उनके खिलाफ मामले रद करने का विरोध कर रहा था।
तुषार मेहता ने क्या कहा?
मेहता ने कहा कि पुलिस ने 2,800 से ज्यादा असामाजिक तत्वों की पहचान की है, जो पहले गंभीर अपराधों में शामिल रहे हैं और 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार थे।
3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्र प्रदर्शनकारियों को रिहा करने के अपने आदेश में आपराधिक इतिहास शब्द का इस्तेमाल केवल उन लोगों के लिए किया गया था जो गंभीर और जघन्य अपराधों में शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि राज्य कानून के अनुसार बाकी छात्रों के खिलाफ एफआईआर बंद कर सकते हैं या वापस ले सकते हैं।
यह स्पष्टीकरण केंद्र द्वारा यह कहे जाने के बाद आया कि वह उन छात्रों के खिलाफ एफआईआर को आगे न बढ़ाने को लेकर गंभीर है जिन्होंने नीट परीक्षा पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शनों (जिसमें दिल्ली में 20 जुलाई का संसद मार्च भी शामिल है) में हिस्सा लिया था, बशर्ते उनका कोई आपराधिक इतिहास न हो।
‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार’
सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि सिर्फ विरोध-प्रदर्शन होने की वजह से पुलिस की ज्यादती या लाठीचार्ज को सही नहीं ठहराया जा सकता और इस बात पर जोर दिया था कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार पूरी तरह से सुरक्षित है।



















