दरअसल ‘दिमागी नक्सल’ वे हैं, जो भारत के संविधान को नहीं मानते। देश में संसदीय प्रणाली के विरोधी हैं, लिहाजा संसद को खारिज करते हैं। वे भारत में न्यायपालिका को बुर्जुआ और बेईमान मानते हैं, लिहाजा न्याय की इस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। उनका लक्ष्य था-2050 तक भारत की सत्ता पर काबिज होना, लेकिन यह स्वप्न भंग हो चुका है। बेशक उनके हाथों में हथियार नहीं हैं, लेकिन वे ‘बैक डोर’ से हिंसा-समर्थक हैं। वे अफजल गुरु, याकूब मेमन सरीखों को ‘आतंकवादी’ नहीं मानते, बल्कि उनकी मौत को ‘न्यायिक हत्या’ करार देते हैं। वे भारत में सत्ता और व्यवस्था बदलने के लिए विदेशी पैसा पाने के हिमायती हैं। वे उन हथियारबंद, वामपंथी-माओवादी आतंकियों के कट्टर समर्थक हैं, जिन्होंने 500 से अधिक स्कूल और 300 से अधिक अस्पताल बारूद से मिट्टी-मलबा कर दिए। वे उन हत्यारों के मानवाधिकारों के भी पैरोकार हैं, जिन्होंने 2004-25 के दौरान 8956 मासूम लोगों की हत्याएं कीं। मोदी सरकार के कालखंड में ही 2024 तक 516 सुरक्षाकर्मियों को ‘शहीद’ किया। वे उस मॉडल के समर्थक हैं, जिसमें 25,000 करोड़ रुपए की ‘उगाही’ का बंदोबस्त था। वे अफीम की खेती भी करते थे, यह खुलासा नीति आयोग (पूर्व में योजना आयोग) की रपटों में हुआ है। वे अच्छी सडक़ें, लंबे-चौड़े राजमार्ग और विकसित गांव बनाए जाने के प्रयासों के धुर विरोधी रहे हैं। क्या भारत सरकार में वित्त और गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम, दिल्ली के 10 साल तक मुख्यमंत्री रहे केजरीवाल और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व सांसद महबूबा मुफ्ती खुद को इस जमात के प्रतिनिधि मानते हैं? चिदंबरम आज भी राज्यसभा सांसद हैं, क्या फिर भी वह संसदीय प्रणाली के विरोधी हैं? यदि ऐसा है, तो ऐसे नेताओं को राजनीतिक तौर पर खारिज किया जाना चाहिए। बहरहाल करीब छह दशक तक नक्सलवाद का ‘हथियारबंद आतंकवाद’ जारी रहा। कभी देश के 10 राज्यों के 136 जिलों में ‘रेड कॉरिडोर’ था, लेकिन इस ‘सशस्त्र क्रांति’ के बावजूद औसत किसान आज भी गरीब, कर्जदार है।
आदिवासी आज भी जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्षरत हैं, लेकिन जमींदार वर्ग आज भू-माफिया बन चुका है। ‘दिमागी नक्सल’ किस क्रांति और सामाजिक बदलाव, समानता की बात करते रहते हैं? यकीनन नक्सलवाद का लगभग सफाया मोदी सरकार और देश की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन उसके दिमागी, वैचारिक, सोच के ‘अवशेष’ आज भी जिंदा और सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ का जो उल्लेख किया था, वह बेमानी नहीं है। ‘दिमागी नक्सल’ जानते हैं कि प्रधानमंत्री ने किन्हें चिह्नित किया था! ऐतिहासिक लालकिले से प्रधानमंत्री का संबोधन किसी राजनेता का नहीं, संपूर्ण भारत की प्रतिनिधि आवाज का संबोधन होता है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के तौर पर डा. मनमोहन सिंह ने भी 13 अप्रैल, 2006 को ‘अर्बन नक्सली’ को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना था। तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने भी ‘अर्बन नक्सलियों’ को ‘लाल आतंकवाद’ करार देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती माना था। 2004 और 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने गुप्त दस्तावेजों में ‘अर्बन नक्सल’ का जिक्र किया था। खुद चिदंबरम 30 नवंबर, 2008 से 31 जुलाई, 2012 तक भारत सरकार के गृहमंत्री रहे और ‘लाल आतंकवाद’ के खात्मे के लिए उन्होंने कुछ रणनीतिक अभियान भी शुरू कराए। सेना तक को उतारने पर विमर्श किए गए। कांग्रेस को तो ‘दिमागी नक्सल’ का कड़ा विरोध करना चाहिए, क्योंकि छत्तीसगढ़ में ‘हथियारबंद नक्सलियों’ ने एक ही बारूदी हमले में राज्य के पूरे कांग्रेस नेतृत्व को मौत के घाट उतार दिया था। आज कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों का विरोध कर रही है, अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं, जो आज प्रासंगिक भी नहीं हैं। बेशक ‘दिमागी नक्सल’ की जमात आज भी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर के रूप में, एनजीओ में, पत्रकारिता में, यहां तक कि प्रख्यात सरकारी अस्पतालों में भी, लेखक-विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में और बुद्धिजीवी वर्ग में मौजूद है। ‘दिमागी नक्सल’ होना मानसिक फैशनपरस्ती और बौद्धिक होने का लाइसेंस भी है। यह जमात आज भी नक्सलवाद को ‘क्रांति’ करार देती है।



















