नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाना या उसे सीमित करना नीतिगत फैसला है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय सरकार पर ही छोड़ना बेहतर है।

 कोर्ट का फैसला और बेंच की टिप्पणी

जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने तथा बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) का निपटारा कर दिया। बेंच ने कहा, “ये सभी मामले पॉलिसी के दायरे में आते हैं। सरकार इस पर विचार करेगी। कोर्ट का काम यह निर्देश देना नहीं है कि आप इसे बैन करें या उसे बैन करें। उन्हें इस पर विचार करने दें और फिर कोई आदेश जारी करने दें।”

समय-सीमा तय करने से इंकार

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सरकार के फैसले के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं कर रही है। केंद्र सरकार PIL में उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी। याचिकाकर्ताओं के सुझावों और सोशल मीडिया कंपनियों समेत सभी संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद उचित फैसला लेगी। यह जनहित याचिका तीन साल के बच्चे की मां कीर्ति दुआ और पीडियाट्रिशियन डॉ. शरद गुप्ता ने दायर की थी। PIL में कहा गया था कि सोशल मीडिया पर गलत और यौन क्रिया से जुड़े कंटेंट का बेरोकटोक दिखना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-2026 का भी जिक्र

याचिका में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का भी जिक्र किया गया है। जिसमें युवाओं में सोशल मीडिया की लत और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के बढ़ने की बात कही गई थी। सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम अपने प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट (CSAM) को नियंत्रित करने के लिए गंभीर कदम उठा रहे हैं।

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