ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘नक्सलवादी’, जो नक्सलवादी चारू मजूमदार की बायोपिक के रूप में बनाई गई थी, से लेकर हाल ही में बनी ‘लाल सलाम’ और ‘टैंगो चार्ली’ तक सैंकड़ों ऐसी फिल्में बनीं, जिनमें हथियारबंद नक्सलियों के पक्ष में नैरेटिव बनाने की कोशिश की गई थी। एक ओर पुलिस खलनायक के रूप में दिखती, दूसरी तरफ राजसत्ता आमजन के दुश्मन के रूप में और नक्सलवादी हालात के मारे एकमात्र उद्धारक के तौर पर। विभिन्न भाषाओं में हजारों नाटक आपको नक्सलियों के प्रति सहानुभूति प्रदॢशत करते दिखते रहे होंगे। साहित्य की ओर झांकें तो ‘हजार चौरासीवें की मां’ से लेकर ‘नृशंस’ तक लाखों पन्ने आपको मिल सकते हैं, जिनमें एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हथियार उठाने के नक्सली संघर्ष को न्यायोचित ठहराने की कोशिश की जाती रही।
ये लेखक, फिल्मकार, विचारक और रंगकर्मी जंगलों में हथियार के साथ तो नहीं दिखते, नक्सलियों के उन दस्ते में भी नहीं दिखते जो अस्पताल और ट्रेन उड़ाने जाते रहे हैं। ये हमारे-आपके पड़ोस में दिखते हैं, ये विश्वविद्यालयों में दिखते हैं, ये हवाई जहाज पर दिखते हैं, इनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं, ये विदेशों में व्याख्यान देने जाते हैं। राजसत्ता पर ‘अधिकार’ करने की लड़ाई नक्सली हथियारों के साथ लड़ते हैं, ये सभ्य समाज के बीच उनके पक्ष में नैरेटिव बनाकर उनके मनोबल को बनाए रखने का काम करते हैं। ये समाज को बदलने के झूठे सब्जबाग, जिसके बारे में इन्हें पता है कि ये कभी साकार नहीं हो सकता, दिखाकर युवाओं को सीधे संघर्ष में उतरने को प्रेरित करते हैं।
प्रधानमंत्री ने सही कहा, ‘‘माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। इस नक्सलवाद ने 4 दशकों तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को बंदूक की नोक पर दबोच करके रखा था, संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीें और देश के सामान्य नागरिकों की रक्षा में सुरक्षा बल के 3500 से ज्यादा जवान शहीद हो गए।’’
सीधी लड़ाई तो बंदूकों से लड़ी जा सकती है, ऐसी लड़ाई, जिसे दुश्मन हमारी बगल में बैठ कर हमारे ही संसाधनों से लड़ रहा हो, वहां मुकाबला मुश्किल हो जाता है। तब और भी, जब आपको उस नैरेटिव की लड़ाई के लिए तैयार होना हो, जो देश में 80 वर्षों से अपने पंजे और दांत हर दिन हर पल मजबूत करने में लगी है। जाहिर है, प्रधानमंत्री को स्वाधीनता दिवस के भाषण में दिमागी नक्सली को आइसोलेट करने की बात कहनी पड़ती है। गौरतलब है कि इनकी ये गतिविधियां बीते 14 वर्षों से नहीं, हर सरकारों के समय जारी रही हैं, चाहे इंदिरा गांधी हों या राजीव गांधी या फिर आज नरेन्द्र मोदी। इसीलिए यदि किसी राजनीतिक पार्टी, जिसे लोकतंत्र और भारत की संप्रभुता में विश्वास है, को यदि यह भ्रम है कि ये ‘दिमागी नक्सली’ उनके पक्ष में हैं तो यह भ्रम साफ कर लेना चाहिए। वास्तव में ये मौके की तलाश में रहते हैं।
वास्तव में दिमागी नक्सली ही नहीं, हर वामपंथी आंदोलन के दो चेहरे होते हैं, एक जो लोकसभा, विधानसभा में दिखाई देते हैं, उनका लक्ष्य राजसत्ता पर अधिकार और अंतत: तथाकथित साम्यवाद के नाम पर देश के तमाम संसाधनों पर अधिकार का होता है। यह साम्यवाद ऐसा है, पूरी दुनिया में अब जिसकी कल्पना तक नहीं की जाती लेकिन भारत में दिमागी नक्सलियों ने अपने स्वार्थ में इसे बचाए रखा है। वास्तव में इनकी लड़ाई भारत की हर मजबूत सरकार से है। इन्हें हमेशा एक कमजोर लुंजपुंज सरकार चाहिए होती है, ताकि देश भारत के संविधान से नहीं, इनकी मर्जी से, इनकी सहूलियतों से चलता रहे। नक्सली जब बिहार में स्कूल और अस्पताल उड़ा रहे थे, तब एक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता से मैंने पूछा था, यह तो आम जन के उपयोग की चीज है, इसे क्यों ध्वस्त किया जा रहा है? उन्होंने कहा था, आम जनता को सहूलियत मिल जाएगी तो क्रांति कौन करेगा।
दिमागी नक्सली यही चाहते हैं, जनता कष्ट में रहेगी, शासन व्यवस्था अव्यवस्थित रहेगी तो देश को अपने अनुसार चलाना आसान रहेगा। वास्तव में दिमागी नक्सल एक सुविधाभोगी प्रजाति है, उसे ए.सी. चाहिए, बंगला चाहिए, लंबी गाड़ी चाहिए, विदेश यात्रा चाहिए। इस सबके लिए वे कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार रहते हैं, अपने कामरेडों को भी, जिन्होंने जंगलों में जान गंवा दी, संविधान को भी, स्वतंत्रता को भी, देश को भी। ये हर उस स्थिति के साथ होते हैं, जो देश के विरुद्ध होती है, चाहे वह आतंकवाद हो, कश्मीर हो, सियाचिन हो। ऐसा तब आसान हो जाता है, जब देश में अस्थिरता, अराजकता और कमजोर शासन व्यवस्था रहती है। दुनिया के कई देशों की भी इच्छा भारत को इसी अस्थिरता में देखने की होती है। प्रधानमंत्री ने गलत नहीं कहा, हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल, ये दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। हिंसा, अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव लगा रहे हैं।-विनोद अनुपम



















