यह महज एक सवाल नहीं है अथवा आश्चर्य की मन:स्थिति नहीं है या चौंकाऊ खबर नहीं है कि अमरीका ईरान पर परमाणु हमला करेगा या नहीं! मानवीय और युद्धों के इतिहास में सिर्फ एक ही परमाणु हमला दर्ज है, जब अमरीका ने 6 और 9 अगस्त, 1945 को जापान के दो शहरों-हिरोशिमा और नागासाकी-पर एटम बम गिराए थे और शहरों को मिट्टी-मलबे में तबदील कर दिया था। क्रमश: करीब 1,40,000 और करीब 74,000 लोग मारे गए थे। महीनों और सालों बाद भी विकिरण के भयानक प्रभाव सामने आते रहे और बीमारियों से मरने वालों की संख्या अनगिनत है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के उस दौर में सिर्फ अमरीका ही परमाणु सम्पन्न देश था। सोवियत संघ ने 29 अगस्त, 1949 को सफल परमाणु परीक्षण किया और ब्रिटेन ने 1951 में परमाणु परीक्षण किया, लिहाजा अमरीका के लिए कोई तात्कालिक विध्वंसकारी चुनौती नहीं थी। आज स्थितियां और समीकरण बिल्कुल भिन्न हैं। आज रूस के पास सर्वाधिक परमाणु हथियार हैं। चीन के पास भी करीब 620 परमाणु हथियार बताए जाते हैं और वह रूस, अमरीका के बाद तीसरा सबसे बड़ा शस्त्रागार है। हम रूस और चीन का उल्लेख इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि दोनों देश ईरान के ‘अभिन्न मित्र’ हैं और युद्ध के दौरान हथियारों, मिसाइलों, ड्रोन, वायु रक्षा प्रणालियां, सेटेलाइट रणनीतिक तस्वीरें आदि ईरान को मुहैया कराते रहे हैं। अमरीका इस यथार्थ को बखूबी जानता है।
बीते दिनों राष्ट्रपति टं्रप, उनके कुछ मंत्री, सामरिक सलाहकार, जनरल आदि ‘कैंप डेविड’ गए थे और गोपनीय बैठकें हुई थीं। राष्ट्रपति टं्रप के समर्थक और करीबी रहे सांसदों के भी बयान सार्वजनिक हुए थे, लिहाजा परमाणु हमले की आशंकाएं उभरीं। राष्ट्रपति टं्रप ने एक साक्षात्कार में कहा है कि उन्हें युद्ध समाप्त करने की हड़बड़ी नहीं है। अभी तक अमरीका ने हल्की सैन्य ताकत का ही इस्तेमाल किया है। अब अमरीका-इजरायल मिल कर ईरान पर निर्णायक हमला करेंगे। इस बयान की व्याख्या की गई चूंकि पांच माह से भी लंबी जंग के बावजूद अमरीका ईरान को घुटनों पर नहीं ला सका है, लिहाजा अब ‘निर्णायक हमला’ परमाणु का ही किया जा सकता है। हालांकि इस संदर्भ में राष्ट्रपति टं्रप का कोई बयान अथवा आदेश सार्वजनिक नहीं हुआ है, फिर भी सवालिया आशंकाएं जताई जा रही हैं कि क्या अमरीका ईरान को ‘जापान’ बना सकता है? गौरतलब यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति के बयान के बिना ही ईरान ने पलटजवाब दिया है कि यदि अमरीका ने परमाणु हमला किया, तो उसे उसी तरह का जवाब दिया जाएगा। सवाल है कि क्या ईरान ने ‘परमाणु बम’ बना लिया है? हालांकि ईरान अब भी ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (एनपीटी) का सदस्य है, लेकिन एक साल से अधिक समय से ‘अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी’ (आईएईए) ईरान के परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण नहीं कर पा रही है। उसे यह भी पुष्ट जानकारी नहीं है कि ईरान में कितना यूरेनियम संवर्धन किया जा रहा है! अमरीका-इजरायल के कई हमलों के बावजूद ईरान के परमाणु केंद्र-नतांज, बुशहर, इस्फहान, फोर्डो आदि-यथावत और सुरक्षित बताए जाते हैं। सवाल है कि क्या अमरीका अब उन केंद्रों पर सीमित परमाणु हमले अथवा परमाणु सम्मत मिसाइल या बम से हमले कर उन्हें बिल्कुल नष्ट कर देना चाहता है? यह अमरीका का युद्ध थोपने का एक बुनियादी मकसद भी था। लेकिन उस स्थिति में विकिरण फैलेगा, तो कितनी मौतें होंगी? कितना विनाश होगा? खाड़ी देश का अधिकांश हिस्सा उस परमाणु विकिरण की चपेट में आ सकता है! शायद अमरीका इन यथार्थों को भी जानता है! लिहाजा रक्षा विशेषज्ञों के आकलन हैं कि अमरीकी परमाणु हमले की संभावनाएं नगण्य हैं। राष्ट्रपति टं्रप ऐसे बयानों के जरिए ईरान को सिर्फ डराना और उसे दबाव में लाने की रणनीति खेल रहे हैं। दोनों देशों के बीच शांति के जिस समझौता-दस्तावेज पर दस्तखत किए गए थे, उसकी आधिकारिक अवधि 17 अगस्त को समाप्त हो चुकी है। दोनों देश अब हमले करने या युद्ध को विस्तार देने को स्वतंत्र हैं। यदि राष्ट्रपति टं्रप ने अब ईरान के साथ किसी भी तरह की बातचीत से इंकार कर दिया है, तो ईरान ने भी ऐसी किसी संभावना को खारिज कर दिया है। अब ईरान की एक और रणनीति सामने आई है कि वह युद्ध को यूरोपीय देशों तक विस्तार देना चाहता है। खाड़ी के अमरीकी ठिकानों पर कब्जे कर लेना चाहता है।



















