अब केंद्रीय मंत्री देश के विश्वविद्यालयों में जाएंगे, पूरा दिन खर्च करेंगे, जेन-जी के चेहरों से संवाद करेंगे, उनकी तकलीफें, समस्याएं, खामियां जानने की कोशिश करेंगे, अपनी सरकार की नीतियां, योजनाएं भी साझा करेंगे और इस तरह एक व्यापक वोट बैंक के छिटकने की संभावनाओं को कम करेंगे। क्या ऐसे प्रयास, प्रत्येक सरकार के स्तर पर, निरंतर और सिलसिलेवार नहीं किए जाने चाहिए? यह योजना भी प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर शुरू की जा रही है। प्रधानमंत्री ने देश में जेन-जी के आक्रोश, गुस्से और आंदोलनों को भांप, समझ लिया है, लिहाजा मंत्रियों की यूनिवर्सिटीज में प्रवास की नौबत आई है। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने ऐसे भी निर्देश मंत्रियों को दिए हैं कि वे लगातार फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स, लिंक्डइन आदि सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहें और युवाओं से संवाद करते रहें। लोकतंत्र में ऐसे जनसंपर्क, जनसंवाद जरूरी भी हैं, लेकिन वे नियमित होने चाहिए। अब जब जेन-जी के साथ-साथ जेन-अल्फा (स्कूली छात्र) भी देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलित हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी को संवाद का यह ‘अग्निपथ’ सूझा है। हम इसे लोकतांत्रिक सरकार का गलत निर्णय नहीं मानते, लेकिन मंत्रियों का फोकस सोशल मीडिया और जेन-जी पर ही टिका रहेगा, तो मंत्रालयों पर ध्यान कौन देगा? मंत्रालयों के अपरिहार्य, नीतिगत निर्णयों को कौन क्रियान्वित करेगा? मंत्री की प्राथमिक और संवैधानिक जवाबदेही तो मंत्रालय के प्रति होनी चाहिए। उसी के आधार पर वह जनता के प्रति जवाबदेह साबित हो सकता है। मंत्रियों को चुनावों के मद्देनजर वोट बैंक को बचाने की कवायद में जुटना पड़ेगा, तो जाहिर है कि मंत्रालय और सरकार के बुनियादी काम प्रभावित होंगे। जेन-जी वह पीढ़ी है, जिसका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। इसकी आबादी करीब 37-40 करोड़ मानी जाती है। यह देश में कोई भी परिवर्तन करने में सक्षम है, क्योंकि इनमें से अधिकांश 2029 के लोकसभा चुनाव में मतदाता होंगे। बहरहाल देश में फिलहाल 57 केंद्रीय विश्वविद्यालय और 522 राज्य विश्वविद्यालय हैं।

उनके अलावा, 420-450 निजी तथा करीब 125 डीम्ड यूनिवर्सिटी हैं। केंद्रीय मंत्री करीब 1300 विश्वविद्यालयों में जाएंगे और जेन-जी से संवाद कर उन्हें शांत और संतुष्ट करने की कोशिश करेंगे। हमें लगता है कि यदि प्रधानमंत्री मोदी के 12-साला कालखंड में भी शिक्षा-व्यवस्था और खासकर स्कूलों की दुरावस्था पर गंभीर ध्यान दिया जाता, तो मंत्रियों को भी ‘कंटेंट क्रिएटर’ बनने की हास्यास्पद नौबत नहीं आती। शिक्षा की संपूर्ण व्यवस्था और बुनियादी ढांचा ही जर्जर है। हमारी बुनियादी शिक्षा ऐसी है कि कक्षा-3 के 75 फीसदी बच्चे, कक्षा-5 के 50 फीसदी और कक्षा-8 के 25 फीसदी छात्र कक्षा-2 की पुस्तक पढऩे में असमर्थ पाए गए। यह ‘प्रथम’ एनजीओ की 2014-15 की सालाना रपट का निष्कर्ष है। भारतीय स्कूलों की गुणवत्ता का अध्ययन किया गया, तो 110 देशों में भारत का स्थान नीचे से दूसरा था। यह घोर निराशाजनक और भयानक आंकड़ा है। राजधानी दिल्ली में एक अध्ययन कराया गया था, जिसमें करीब 54 फीसदी बच्चे ही कुछ वाक्य पढऩे में समर्थ रहे। चिंतनीय तथ्य यह है कि शिक्षा पर जीडीपी का 4.5 फीसदी बजट दिया गया था, जिसे घटा कर 2.6 फीसदी कर दिया गया है। सरसंघचालक मोहन भागवत सरीखे व्यक्ति भी कहते रहे हैं कि यह बजट कमोबेश 6 फीसदी होना चाहिए। नीति आयोग की रपटों में ही यह तथ्य सामने आया है कि देश के हजारों स्कूलों में बच्चों के लिए पेयजल, शौचालय की बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। अध्यापकों को घोर अभाव और संकट है, लिहाजा देश भर में आंदोलन किए जा रहे हैं।

विश्व बैंक का ‘लर्निंग पावर्टी इंडेक्स’, कोरोना महामारी के बाद, बढ़ कर करीब 70 फीसदी हो गया है। अर्थात 10 साल के अधिकांश बच्चे सरल पाठ नहीं पढ़ पाते। हमारी शिक्षा-प्रणाली सिर्फ रटने की विद्या सिखाती है, नतीजतन करीब 80 फीसदी स्नातकों को एक अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती। बेरोजगारी बढऩे का बुनियादी कारण यह भी है कि हमारे स्नातक स्तर के युवा ‘कौशलहीन’ हैं। करीब डेढ़ करोड़ युवा औसतन हर वर्ष स्नातक की डिग्री लेते हैं। करीब 48 फीसदी छात्र 12वीं तक अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। उसके कई कारण हैं। ऐसे दयनीय हालात में जेन-जी का आक्रोश फूटा है, जिसे सहजता या संवाद से ही मंत्री शांत नहीं कर सकेंगे, यह हमारा आकलन है।

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