चुनाव आयोग, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता, विपक्षी आंदोलन और राजनीति के निशाने पर हैं। कांग्रेस कार्यसमिति और शेष विपक्ष की सामूहिक मांग है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को निलंबित किया जाए। यदि संभव है, तो उसे रद्द ही कर दिया जाए। अभी तक जिन 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, उन्हें बहाल किया जाए। यह कैसे संभव है, क्योंकि उनमें से 2.80 करोड़ से ज्यादा मतदाता तो ‘दिवंगत’ (मृत) हो चुके हैं। शेष 10.57 करोड़ काटे गए नामों पर चुनाव आयोग को बाध्य किया जाना चाहिए। दिल्ली में यह मामला सामने आया है। ‘बेला एस्टेट’ में अधिकतर झुग्गी-झोंपडिय़ां थीं। लोगों ने अवैध अतिक्रमण किए हुए थे और वे वहां बसे हुए थे। 2022-23 में उन झुग्गियों को तोड़ दिया गया। वहां 728 वैध मतदाता रहते थे, जिनके पास चुनाव आयोग की मान्यता थी और वे लगातार मतदान करते रहे थे। झुग्गियां टूटीं, तो वे बेघर हो गए। एसआईआर अभियान के तहत बीएलओ को उस जगह कोई नहीं मिला। किसी एक ने ‘मतदाता पहचान पत्र’ दिखाया। नतीजतन 728 में से 727 मतदाताओं के नाम काट दिए गए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी उन बेघरों के पास गए और मोबाइल पर ईआरओ से पूछा कि इतने नाम किस आधार पर काट दिए गए? बहरहाल जब यह खबर टीवी चैनलों और अखबारों की सुर्खियों में आ गई कि ‘बेला एस्टेट’ के बेघर परिवार फ्लाईओवर के नीचे जीने को विवश हैं, तो चुनाव आयोग ने अपने बीएलओ भी वहां भेजे। कटे हुए नामों के उन लोगों को ‘फॉर्म 6’ भर कर ‘नया मतदाता’ बनने की सलाह दी गई। खबर बताई जाती है कि 418 लोगों से ‘फॉर्म 6’ भरवा भी लिए गए हैं। अब नई मतदाता-सूची में उनके नाम भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने यह ‘संवैधानिक फ्रॉड’ खेला है। फॉर्म 6 उन लोगों के लिए है, जो बिल्कुल पहली बार मतदाता बनना चाहते हैं। वे पहले कभी भी मतदाता न रहे हों। ऐसा घोषणा-पत्र भी भर कर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। लेकिन ये तो पहले भी मतदाता रहे हैं और उन्होंने एसआईआर में ‘अधिकृत फॉर्म’ भी भरा था। क्या यह संवैधानिक कवायद है? यदि 418 काटे गए नाम, अंतत:, मतदाता बन जाते हैं, तो शेष लोग भी मतदाता बनाए जा सकते हैं।
तो फिर एसआईआर का औचित्य क्या रहा? क्या इस तरह चुनाव आयोग ‘फ्रॉड’ नहीं कर रहा है और फॉर्म 6 के साथ ‘झूठे’ घोषणा पत्र भी नहीं भरवा रहा है? नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की जानकारी में यह पूरा मामला है, लिहाजा उनका आंदोलन सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता के इस्तीफे पर केंद्रित है। राहुल को यकीन है कि अंतत: प्रधानमंत्री मोदी ही सीईसी का इस्तीफा करवाएंगे, क्योंकि ज्ञानेश तो उन्हीं की ‘कठपुतली’ हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने तो प्रधानमंत्री का ही इस्तीफा मांग लिया है। फॉर्म 6 के इस कथित फर्जीवाड़े में भाजपा के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा भी फंसे हैं। वह जब राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे, तो वह पंजाब के मतदाता थे और ‘आप’ के प्रत्याशी थे, लेकिन बाद में ‘आप’ के 7 राज्यसभा सांसद पालाबदल कर भाजपा में शामिल हो गए, तो अब उन्हें दिल्ली का मतदाता बनाया गया है। इसमें कोई अपराध नहीं है, क्योंकि व्यक्ति स्थानांतरित होता है, तो मतदाता भी बदला जा सकता है। अलबत्ता संवैधानिक हेराफेरी न की जाए। बताया जाता है कि राघव चड्ढा से फॉर्म 6 भरवाया गया है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते, लेकिन ‘आप’ ऐसा कह रही है और अदालत में इसे चुनौती देने की बात भी पार्टी ने की है। दरअसल एसआईआर का मुद्दा बेहद पेचीदा हो गया है। दिल्ली में ही 9 लाख से अधिक बांग्लादेशी बस चुके हैं। वे अभी तक मतदाता भी बने रहे हैं। सवाल यह है कि चुनाव आयोग ने उन्हें एसआईआर के दौरान क्या चिह्नित किया है? सर्वोच्च अदालत में यह मामला विचाराधीन है और एक मामले में तो एसआईआर को ‘अवैध’ करार देने की भी मांग की गई है। जो भी हश्र होगा, देखा जाएगा, लेकिन इस मुद्दे ने हमारी राजनीति को बिल्कुल विभाजित और विषाक्त बना दिया है। विपक्ष को चुनाव आयोग की मनमानियां पसंद नहीं हैं और सारा देश इस मसले पर आंदोलित है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी लेकर आ रहा है। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए हटाना आसान नहीं है, क्योंकि विपक्ष के पास वांछित बहुमत नहीं है, फिर भी इसके जरिए चुनाव आयोग के खिलाफ एक तरह का माहौल तो बन ही रहा है।



















