महामारियां क्रूर और सीखने का सबसे बुरा समय होती हैं। सबक सबसे अच्छे तरीके से महामारी के बीच के समय में सीखे जाते हैं, जैसे कि वर्तमान में फ्लू का प्रकोप। भारत के विभिन्न हिस्सों में इस साल पिछले साल की तुलना में 2-10 गुना अधिक मामले सामने आए हैं। सरकारी सलाह में भी जनता से सतर्क रहने को कहा गया है लेकिन घबराने को नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि इसका क्या मतलब है। एक अच्छी तरह से स्थापित वायरस गंभीर चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। फिर भी, संक्रमण को रोकने के लिए सलाह जारी करना आवश्यक है, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों को भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचने और मास्क के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए। इसमें उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों और स्वास्थ्य कर्मियों का टीकाकरण भी शामिल हो सकता है। नियंत्रण का अर्थ है यह सुनिश्चित करना कि संक्रमित व्यक्तियों को उचित चिकित्सा देखभाल मिले।

कोविड के बाद, भारत में वायरल रोगों की निगरानी की एक उत्कृष्ट प्रणाली है। इन्फ्लूएंजा पॉजिटिविटी दर में एक निर्धारित सीमा से अधिक वृद्धि होने पर अलर्ट जारी किया जाना चाहिए। चयनित अस्पतालों में किए गए हमारे अध्ययन में पाया गया कि गंभीर तीव्र श्वसन संक्रमण के साथ भर्ती मरीजों में पॉजिटिविटी दर इस वर्ष 16 प्रतिशत थी, जबकि पिछले वर्ष यह 12 प्रतिशत थी। निगरानी और कार्रवाई के बीच का संबंध कमजोर है। यह अंतर आई.सी.एम.आर. (प्रयोगशाला निगरानी का संचालन), एन.सी.डी.सी. (प्रतिक्रिया का समन्वय) और राज्य स्वास्थ्य प्रणालियों (प्रतिक्रिया का कार्यान्वयन) के बीच है। आगे का रास्ता एक एकीकृत कमान संरचना स्थापित करना है, जिसे बीमारी के प्रकोप और महामारियों के दौरान प्रभावी प्रतिक्रिया के समन्वय और कार्यान्वयन के लिए स्पष्ट अधिकार प्राप्त हों। हम कोविड से यह सबक सीखने में विफल रहे।

वर्तमान में संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए, प्राथमिकता अनावश्यक मौतों को रोकने की होनी चाहिए। सरकारी सलाह में ऐसे लोगों से भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचने और मास्क पहनने का आग्रह किया जाना चाहिए। सरकारें अक्सर इस बात से डरती हैं कि ऐसी सलाह से दहशत फैल सकती है। उचित प्रतिक्रिया और दहशत फैलाने वाली प्रतिक्रिया के बीच एक बहुत पतली रेखा होती है। विश्वभर की सरकारें इस संतुलन को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। उन पर और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) पर कभी-कभी अतिप्रतिक्रिया का आरोप लगाया जाता है। हालांकि, अगर हमारी प्राथमिक चिंता जीवन बचाना है, तो अतिप्रतिक्रिया अल्पप्रतिक्रिया से बेहतर है। हालांकि सामान्य परिस्थितियों में टीकाकरण की आवश्यकता पर बहस की जा सकती है लेकिन प्रमुख मौसमी प्रकोप के दौरान उच्च जोखिम वाले समूहों के टीकाकरण पर विचार न करके, हम अगली महामारी के लिए अप्रस्तुत रहने का जोखिम उठाते हैं। 

यहां तक कि इन्फ्लूएंजा के चरम मौसम में भी एंटीवायरल दवाओं का कम उपयोग भी जांच का विषय है-इन्फ्लूएंजा प्रबंधन दिशा-निर्देशों पर पुनॢवचार की आवश्यकता है। प्रकोप, विभिन्न स्तरों की महामारियां और वैश्विक महामारियां एक निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इनके लिए एक सुनियोजित प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। लघु-महामारी की स्थितियां हमारी प्रतिक्रिया और संचार रणनीतियों को परिष्कृत करने का अवसर प्रदान करती हैं।-आनंद कृष्णन

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