आजकल युवाओं, जेन-जी को साधने, लुभाने, पुचकारने और उसके तराने गाने की होड़ मची है। इसमें प्रधानमंत्री मोदी सबसे आगे हैं। वह जिस आयोजन में जा रहे हैं अथवा गुजरात के वडोदरा में ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ का उद्घाटन और 35,000 करोड़ रुपए की घोषणाएं कर रहे हों या ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट’ को संबोधित कर रहे हों, उन्हें चारों तरफ ‘युवा-युवा’ ही दिखाई देते हैं। कमाल यह है कि जेन-जी भी प्रधानमंत्री से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं और उन्हें ही ‘विकसित भारत’ की बुनियाद का नेता मान रहे हैं। संभव है कि ऐसे बयान ‘प्रायोजित’ हों! प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में कुछ दीक्षांत समारोहों और श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह के मंचों से भी जेन-जी को साधने के प्रयास किए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बीते कुछ समय से ‘छात्रों की गूंज’ के जरिए जेन-जी के ‘सबसे बड़े हमदर्द’ साबित होने की राजनीति खेल रहे हैं। वह अपने आवास पर युवाओं से मुलाकातें कर रहे हैं और देश का विमर्श साझा कर रहे हैं। जेन-जी के कुछ चेहरों के साथ पुलिस स्टेशन तक जाकर और छोटा-सा धरना देकर प्राथमिकी दर्ज करवा रहे हैं, ताकि युवाओं का जन-समर्थन बटोरा जा सके। यहां तक कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कबूल किया है कि नई पीढ़ी, नई सोच के साथ नई पोशाक भी होनी चाहिए। नतीजतन उन्होंने ‘समाजवाद’ का रंग भी ‘नीला’ कर दिया है। समाजवादी नौजवान सभा से जुड़े काडर की वेशभूषा लाल-हरी के बजाय ‘गहरी नीली’ कर दी गई है। वह ‘काली-सी’ लगती है। अखिलेश की एक आंख जेन-जी पर है, तो दूसरी आंख दलितों पर है, लिहाजा बाबा अंबेडकर का राग अलापना और हर पार्टी-कार्यालय में अंबेडकर के चित्र को ‘अनिवार्य’ घोषित किया है। जेन-जी के प्रति ये तराने निस्वार्थ नहीं हैं। चुनाव जीतने के मद्देनजर जेन-जी के सुर बजाए जाने लगे हैं। यदि हमारी राजनीतिक जमात की युवाओं के प्रति चिंता और प्रतिबद्धता वाकई गंभीर होती, तो कमोबेश देश में 8.70 करोड़ युवा ऐसे न होते, जो न तो पढ़ रहे हैं, न काम कर रहे हैं और न ही कोई टे्रनिंग प्राप्त कर रहे हैं।

यह कोई निजी डाटा नहीं, बल्कि भारत सरकार के नीति आयोग के अध्ययन का निष्कर्ष है। बहरहाल 2027 में 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उनमें उप्र, गुजरात, पंजाब आदि राज्यों के चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। उप्र में अब 4.54 करोड़ जेन-जी मतदाता हैं। गुजरात में 1.23 करोड़ अर्थात करीब 28 फीसदी युवा मतदाता हैं। पंजाब में यह संख्या 53.87 लाख है। मणिपुर में 4.71 लाख और गोवा में 2.10 लाख जेन-जी मतदाता हैं। ये मतदाता किसी भी दल की सरकार बनवाने और स्थापित सत्ता को उखाड़ फेंकने में सक्षम हैं। मजबूरन जेन-जी के तराने गाने पड़ रहे हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव की घंटियां अभी से बजनी शुरू हो गई हैं। जेन-जी आबादी 37-38 करोड़ बताई जा रही है। अब हर चार मतदाताओं में से एक मतदाता जेन-जी है। कल्पना करें कि यदि अमरीकी आबादी से अधिक इतने मतदाताओं में ध्रुवीकरण होता है, तो चुनाव के नतीजे क्या हो सकते हैं? शायद इसी चुनाव-नीति के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने सभी मंत्रियों और पार्टी स्तर पर सांसदों, विधायकों और पदाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हों और जेन-जी से खुद को साझा करें। मंत्री और सांसद आदि विश्वविद्यालयों में भी जाएंगे और एक पूरा दिन युवा छात्रों के बीच बिताएंगे। उनकी समस्याओं को समझने के प्रयास करेंगे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी जेन-जी का तराना गाएंगे। क्या ऐसी कवायदों से जेन-जी को पटाया जा सकता है या भाजपा के साथ जोड़ा जा सकता है? वैसे 2024 के आम चुनाव में 40 फीसदी से अधिक युवाओं ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया था। उसके बाद अब परिदृश्य बिल्कुल बदल चुका है। बेशक जेन-जी ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग या सत्ता-परिवर्तन का आह्वान नहीं किया है, लेकिन वे शिक्षा, स्कूल, परीक्षा और रोजगार को लेकर व्यवस्था-परिवर्तन करना चाहते हैं। व्यवस्था-परिवर्तन के मायने क्या होते हैं? बेशक सरकार और विभिन्न राजनीतिक दल महसूस कर रहे हैं कि यदि जेन-जी का आक्रोश, गुस्सा, विद्रोह अपनी हदें लांघने लगेगा, तो कोई भी सत्ता बच नहीं पाएगी। यह वह समय है जब सभी दलों को युवाओं से जुड़े मसलों के प्रति सहानुभूति वाली रवैया अपनाना होगा। चुनाव के एजेंडे में युवा मसलों को जगह देनी होगी। युवाओं का सबसे बड़ा मुद्दा उन्हें शिक्षा के मुताबिक रोजगार दिलाना है। यह निश्चित है कि करोड़ों की संख्या में सभी युवाओं को सरकारी नौकरियां नहीं दी जा सकतीं। सार्वजनिक नौकरियों की अपनी सीमाएं हैं। इसलिए निजी क्षेत्र को इस तरह विकसित करना होगा कि वहां युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रोजगार मिले।

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