वर्तमान समय में जब डिजिटल क्रांति के माध्यम से प्रशासनिक सुधारों के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तब एक आम करदाता नागरिक का केवल एक अक्षर या जन्मतिथि की त्रुटि सुधारने के लिए महीनों तक कार्यालयों के चक्कर काटना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है…
हालांकि यह राष्ट्रीयता के हित में है कि भारत के प्रत्येक नागरिक की नागरिकता के संबंध में विभिन्न प्रकार के पहचानपत्र बनाए जा रहे हैं, फिर भी आधार, मतदाता, विवाह, जन्म, मृत्यु, स्थायी निवास, मूल निवास, पासपोर्ट, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अन्य सामाजिक योजनाओं से संबंधित अनेक पहचानपत्रों को बनाने के लिए देशभर में जितने भी संबंधित संस्थान हैं, वे पहचान-पत्रों की हर स्तर पर एकरूपता बनाए रखने के लिए परस्पर समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। केंद्रीय शासन एवं प्रादेशिक शासन के अंतर्गत जन सेवा केंद्र तो अवश्य खोले गए हैं, जहां आरंभ में तो सभी प्रकार के पहचान-पत्र बन जाते थे, किंतु अब ये केंद्र भी किसी भी पहचान को पूरी तरह अपने स्तर पर प्रमाणित एवं प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। अब इन्हें केवल पहचान हेतु प्रस्तावित नाम से लेकर उसके अन्य विवरणों को अद्यतन करके ऑनलाइन अपलोड करने के कार्यदायित्व तक ही सीमित कर दिया गया है। जब से शासन के निर्देशानुसार आधार प्राधिकरण ने आधार पहचान-पत्र को नागरिकों के बैंक खातों एवं खातों में सूचीबद्ध मोबाइल नंबर से जोड़ा है, तब से आधार पत्र, मोबाइल नंबर एवं बैंक खातों में होने वाली किसी भी अनियमितता एवं त्रुटि के लिए केवल और केवल नागरिकों को दोषी ठहराकर, त्रुटि निवारण हेतु उनसे तरह-तरह के प्रमाणपत्र मांगे जा रहे हैं। चाहे किसी भी पहचान-पत्र में त्रुटियां संबंधित संस्थान अथवा प्राधिकरण के कारण हुई हों, किंतु त्रुटियों को ठीक करने के लिए अपेक्षित प्रमाणपत्र, पहचान-पत्र धारक नागरिक को ही उपलब्ध कराने पड़ रहे हैं।
इस क्रम में सामान्य नागरिकों को, और विशेषकर देश के मूल नागरिकों को, अत्यंत कष्ट एवं मानसिक उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा कष्ट व मानसिक उत्पीडऩ पहचान-पत्र बनाने वाले किसी संस्थान अथवा उसके कर्मचारी के कारण नहीं, अपितु पहचान सिद्ध करने के लिए जटिल कर दी गई शासकीय कार्यप्रणालियों के कारण हो रहा है। देश में परिव्याप्त कई तरह की समस्याओं के स्थायी उन्मूलन के लिए यदि देश के करोड़ों लोगों के प्रामाणिक प्रमाणपत्र बनाने की अनिवार्यता उभरी है, तो इसके लिए एक व्यापक कार्यनीति की आवश्यकता थी। केंद्रीय शासन को इस हेतु अपने अधीन एक नागरिक प्रलेख एवं प्रमाणन विभाग खोलकर देश के प्रत्येक जनपद में इसके चार-चार कार्यालय खोलने चाहिए थे। राज्यों के भौगोलिक एवं जनसांख्यिकीय आकार को देखकर जनपद स्तर पर चार से अधिक कार्यालय भी खोले जा सकते हैं। इस हेतु शासकीय स्तर पर पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति हो। इस प्रयास से शासन के स्तर पर एक नवीन शासकीय विभाग गठित हो सकेगा तथा साथ ही साथ शासकीय नियुक्तियां भी हो सकेंगी। यह देश में बेरोजगारी कम होने की दिशा में एक प्रेरक चरण होगा। इन विभागों के कर्मचारी देशभर में प्रत्येक नागरिक के घर जाकर पूर्व-निर्धारित समुचित शुल्क के भुगतान पर उनका हर प्रकार का पहचान, परिचय एवं नागरिकता पत्र बनाएं। पत्र बनाने के लिए निर्धारित शर्तों में से अधिसंख्य अथवा किसी शर्त की पूर्ति न होने पर नागरिक को शर्त/शर्तें पूरा करने का अवसर दिया जाए। पत्र हेतु आवश्यक जानकारियों, सूचनाओं एवं विवरणों को विभागीय कर्मचारियों व पदाधिकारियों द्वारा सत्यापित किया जाए। यदि नागरिक भारत का मूल निवासी है तथा उसके पास किन्हीं कारणों से अपनी भारतीय नागरिकता सिद्ध करने हेतु कोई प्रमाण अथवा पत्र नहीं है, तो विभागीय पदाधिकारियों के पास न्याय एवं पहचान के प्राकृतिक व सामाजिक सिद्धांत के आधार पर उसे भारतीय मूल नागरिक मानने तथा इस संबंध में उसे प्रमाणपत्र देने का अधिकार होना चाहिए।
यदि शासन का उद्देश्य देश के प्रत्येक नागरिक की नागरिकता प्रमाणित कर देश में विद्यमान अवैध लोगों की पहचान उजागर करना है अथवा शासन चाहता है कि वह सज्जन नागरिकों के बीच में से दुर्जन एवं देशविरोधी नागरिकों की पहचान करके उन्हें कठोर दंड दे, तो ऐसा करे। किंतु ऐसा हो कहां रहा है! ऐसा होने की राह में अनेक विसंगतियां परिव्याप्त हैं। इसी कारणवश अपनी-अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए देश के करदाताओं, सज्जन एवं मूल नागरिकों को अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है। इसमें उनका समय एवं धन, दोनों का व्यय हो रहा है। साथ ही साथ मूल नागरिक होकर भी तथा करदाता की भूमिका में होते हुए भी उन्हें अपनी नागरिकता की मौलिक पहचान सिद्ध करने के लिए भीषण संघर्ष करना पड़ रहा है। स्थान-स्थान पर लंबी-लंबी पंक्तियों में प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। शारीरिक एवं मानसिक कष्ट सहन करने पड़ रहे हैं। मौलिकता की प्रलेखीय पहचान सिद्ध होने तक उन्हें कितने अधिक मानसिक उत्पीडऩ से गुजरना पड़ रहा है। प्रलेखीय स्तर पर मौलिकता सिद्ध होने तक मूल नागरिक होकर भी वे स्वयं को देश में पराया मान रहे हैं। क्या किसी मूल नागरिक के लिए आम साधारण व्यक्ति होकर यह कम मानसिक आघात है? यह अत्यंत कष्टकारी अनुभव है। इसका अनुभव वही कर सकता है, जो पारिवारिक साधारण व्यक्ति है तथा भारत का मूल नागरिक होकर भी स्थान-स्थान पर विभिन्न विभागों में जा-जा कर अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए प्रमाणपत्रों के चक्रव्यूह में पिस रहा है। यहां ऊपर पहले ही लिखा जा चुका है कि देश के सज्जन, सत्यनिष्ठ, करदाता एवं पीढिय़ों से मूल नागरिक होने का अधिकार रखने वाले व्यक्तियों के हर प्रकार के शासकीय पहचान एवं परिचय पत्र उनके घर अथवा कार्यालय में जाकर बनवाए जाएं। इस हेतु केंद्रीय शासन को एक विस्तृत कार्ययोजना बनानी होगी। एक नवीन नागरिक प्रलेख एवं प्रमाणन विभाग खोलना होगा, जो केंद्रीय स्तर का विभाग होगा, जिसकी अधिक से अधिक शाखाएं देश के सभी जनपदों में गठित की जाएं। केंद्रीय विभाग एवं इसकी जनपद स्तर की शाखाओं में अपेक्षित संख्या में कर्मचारियों एवं पदाधिकारियों की नियुक्ति हो। वे सरकारी कर्मचारी हों। उन्हें समस्त सरकारी सुविधाएं, लाभ एवं अन्य सहायताएं प्राप्त हों। नागरिक प्रलेख एवं प्रमाणन विभाग देश में पहले से कार्यरत चुनाव आयोग, आधार प्राधिकरण तथा अन्य संबंधित पहचान निर्धारण संस्थानों के साथ कार्यकारी समन्वय स्थापित करके देश के प्रत्येक नागरिक के समस्त पहचानपत्रों, परिचय-पत्रों तथा अन्य पत्रों को बनाने, बनाते समय उनमें हुई त्रुटियों को ठीक करने, विवरणों को संशोधित करने तथा अंतत: पत्रों को नागरिक तक सुरक्षित पहुंचाने का कार्य करे।
इस एकीकृत और जन-हितैषी व्यवस्था के लागू होने से न केवल आम जनता को पहचान-पत्रों की त्रुटि-सुधार प्रक्रिया में होने वाली अनावश्यक भागदौड़ से मुक्ति मिलेगी, बल्कि शासकीय प्रणालियों की विश्वसनीयता में भी अभूतपूर्व वृद्धि होगी। वर्तमान समय में जब डिजिटल क्रांति के माध्यम से प्रशासनिक सुधारों के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तब एक आम करदाता नागरिक का केवल एक अक्षर या जन्मतिथि की त्रुटि सुधारने के लिए महीनों तक कार्यालयों के चक्कर काटना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। सरकार का प्राथमिक दायित्व नागरिक को सुरक्षा और सम्मान प्रदान करना है, न कि उसे अपनी ही पहचान सिद्ध करने के लिए संदिग्ध की भांति खड़ा कर देना। यदि यह प्रस्तावित ‘नागरिक प्रलेख एवं प्रमाणन विभाग’ पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता है, तो देश में डिजिटल इंडिया की अवधारणा वास्तव में सार्थकता प्राप्त करेगी। इससे डेटा की पुनरावृत्ति रुकेगी, जिससे राजस्व और संसाधनों की भारी बचत होगी।-विकेश कुमार बडोला



















