अमेरिका के बाद जापान ने भी प्रमुख ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। जापान के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर बढ़ाकर 1.25% कर दी है। यह करीब 31 साल में बैंक ऑफ जापान की सबसे ऊंची ब्याज दर है। बैंक ने महंगाई के 2% टार्गेट से ऊपर निकलने के खतरे को देखते हुए यह कदम उठाया है। इस फैसले के बाद दुनिया के वित्तीय बाजारों की नजर अब भारत की मौद्रिक नीति पर भी टिक गई है। बैंक ऑफ जापान की दो दिन चली बैठक शुक्रवार को खत्म हुई। इसमें ब्याज दर को 1% से बढ़ाकर 1.25% करने के प्रस्ताव को 7-2 वोट से मंजूरी मिली। बोर्ड के सदस्य तोइचिरो असादा और अयानो सातो ने इस फैसले का विरोध किया।

31 साल के हाई पर जापान की ब्याज दर

जापान लंबे समय तक बेहद कम ब्याज दर वाली अर्थव्यवस्था रहा है। ऐसे में 1.25% तक पहुंची दर उसके लिए बड़ा बदलाव है। बैंक ऑफ जापान ने साफ संकेत दिया है कि अगर अर्थव्यवस्था और महंगाई का उसका अनुमान सही साबित होता है तो आगे भी ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं। 1.25% की दर अब उस अनुमानित दायरे के निचले स्तर के भीतर आ गई है, जिसे बैंक तटस्थ ब्याज दर मानता है। यानी ऐसा स्तर जो अर्थव्यवस्था को न तो ज्यादा बढ़ावा देता है और न ही उस पर खास दबाव डालता है।

एक ही महीने में BOJ, Fed और ECB ने बढ़ाई दरें

इस फैसले की खास बात यह भी है कि एक ही महीने में बैंक ऑफ जापान, अमेरिकी फेडरल रिजर्व और यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई को लेकर केंद्रीय बैंकों की चिंता साफ दिखाई देती है। जापान के इस कदम के बाद शुरुआती कारोबार में येन डॉलर के मुकाबले करीब 0.5% कमजोर होकर 156.75 प्रति डॉलर पर आ गया। हालांकि, इस महीने अब तक येन करीब 2% मजबूत हुआ है।

एचएसबीसी के चीफ एशिया इकोनॉमिस्ट फ्रेड न्यूमैन के मुताबिक, बैंक ऑफ जापान के बयान और दो सदस्यों की असहमति से संकेत मिलता है कि आगे दरों में बढ़ोतरी को लेकर बैंक अभी सतर्क रुख अपना सकता है। बाजार की नजर अब इस बात पर होगी कि दिसंबर में फिर दर बढ़ाने के संकेत मिलते हैं या नहीं।

भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?

जापान में ब्याज दर बढ़ने का असर सिर्फ जापानी बाजार तक सीमित नहीं रह सकता। वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिका और जापान जैसे बड़े बाजारों में मिलने वाला रिटर्न महत्वपूर्ण होता है। अगर जापान में ब्याज दरें लगातार बढ़ती हैं तो कुछ निवेशक अपने पैसे का रुख जापान की ओर कर सकते हैं।

सेबी रजिस्टर्ड मार्केट एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, जापान की दर बढ़ने से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और डॉलर पर दबाव आ सकता है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FIIs के लिए जापानी एसेट्स आकर्षक हो सकते हैं। हालांकि, उनके मुताबिक निवेशक तुरंत अपना पैसा नहीं निकालेंगे और आगे जापान में होने वाली संभावित दर बढ़ोतरी पर नजर रखेंगे। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में इसका सकारात्मक असर हो सकता है, क्योंकि अमेरिकी बॉन्ड और डॉलर पर दबाव बनने की संभावना है।

RBI पर भी बढ़ सकता है दर बढ़ाने का दबाव

जापान, अमेरिका और यूरोप के बाद अब भारत की ब्याज दर नीति पर भी बाजार की नजर है। खासकर तब, जब भारत और दूसरे देशों के बीच ब्याज दर का अंतर कम होता है तो विदेशी निवेश को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट इंद्रनील पैन के मुताबिक, भारत में ब्याज दर बढ़ाने का चक्र अपेक्षाकृत जल्दी शुरू करने की जरूरत पड़ सकती है। उनके अनुसार, दरों का अंतर कम होने से रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल कई अर्थशास्त्री भारतीय रिजर्व बैंक से 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं। दिसंबर 2025 में RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती करके इसे 5.25% किया था।

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की लीड इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा के मुताबिक, अक्टूबर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है। हालांकि, उनका अनुमान है कि आगे दरों में बढ़ोतरी का चक्र सीमित रह सकता है और कुल बढ़ोतरी करीब 50 से 75 बेसिस पॉइंट तक हो सकती है।

RBI के लिए चुनौती बनी महंगाई

भारत में महंगाई के आंकड़े भी ब्याज दर को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं। जुलाई में खुदरा महंगाई 4.5% और जून में 4.4% रही थी। यानी लगातार तीसरे महीने खुदरा महंगाई 4% से ऊपर बनी हुई है। खाद्य महंगाई जुलाई में बढ़कर 6% हो गई, जबकि इससे पिछले महीने यह 5.5% थी। चीनी और सब्जियों की कीमतों में तेजी का इसमें बड़ा योगदान रहा। इसी दौरान कोर महंगाई भी 3.9% से बढ़कर 4.2% हो गई।

डीबीएस बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट राधिका राव के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने, घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती और कोर महंगाई में बढ़ते दबाव को देखते हुए आने वाले समय में सीमित दर बढ़ोतरी की जरूरत बन सकती है।

अगर आरबीआई अपनी 5 से 7 अक्टूबर के बीच होने वाली बैठक में रेपो रेट में इजाफा करता है, तो बैंक भी लोन्स पर ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं। इससे होम लोन, पर्सनल लोन और अन्य लोन्स पर ब्याज दरें बढ़ने का दबाव बढ़ जाएगा।

दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों का सख्त रुख

बैंक ऑफ जापान के अलावा बैंक ऑफ इंग्लैंड ने भी संकेत दिया है कि अगर मिडिल ईस्ट का संघर्ष लंबा खिंचता है तो ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक ने भी महंगाई से जुड़े कुछ जोखिमों के बढ़ने की बात कही है।

मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। महंगा तेल दुनिया भर में महंगाई का दबाव बढ़ा सकता है। ऐसे में केंद्रीय बैंकों के सामने आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती और बड़ी हो गई है।

भारत के लिए आने वाले महीनों में महंगाई, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की चाल, विदेशी निवेश और अमेरिका-जापान के ब्याज दर अंतर अहम संकेतक रहेंगे। इन्हीं से यह तय करने में मदद मिलेगी कि आरबीआई आगे ब्याज दरों को लेकर क्या रुख अपनाता है।

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