राजधानी दिल्ली के ‘रामलीला मैदान’ में विपक्ष के 21 दलों की साझा ‘वोट चोरी’ रैली सफल रही अथवा नहीं रही, हम इस पचड़े में फंसना नहीं चाहते, लेकिन देश भर में एक संदेश देने में विपक्ष जरूर सफल रहा है। यह संदेश है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता के खिलाफ ‘देशद्रोह’ का केस चलाया जाएगा और उन्हें जेल में भेजा जाएगा। यह तभी संभव होगा, जब ज्ञानेश अपने संवैधानिक पद से इस्तीफा दे दें अथवा संसद में उनके खिलाफ ‘महाभियोग’ प्रस्ताव पारित हो जाए। फिलहाल दोनों ही स्थितियां संभव नहीं लगतीं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने साफ कहा है कि हम प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को कहीं जाने नहीं देंगे, क्योंकि वे ‘वोट चोरी’ की आपराधिक साजिश में संलिप्त रहे हैं। उन पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह भी तभी संभव होगा, जब केंद्र में विपक्ष के ‘इंडी’ गठबंधन की सरकार होगी और राहुल गांधी प्रधानमंत्री होंगे। सर्वोच्च अदालत भी कानूनी कार्रवाई पर फैसला दे चुकी होगी! फिलहाल इसके भी आसार नहीं हैं, बेशक विपक्ष कितनी भी हुंकारें भरता रहे। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के ये कथन सवालिया और गलत हैं कि 2024 का लोकसभा चुनाव ‘अवैध’ था। मतदाता सूचियों से 13.5 करोड़ नाम काट दिए गए। करीब 15 फीसदी मतदाताओं के नाम काट दिए गए। हर 7 में से 1 मतदाता का नाम हटा दिया गया, जबकि जीत-हार का अंतर मात्र 3 फीसदी था। राहुल गांधी ने यह गलत बोला है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 19-20 फीसदी वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 38 फीसदी से अधिक मतदाताओं का समर्थन मिला था। कांग्रेस के 99 सांसदों और अकेली भाजपा के 240 सांसदों की संख्या के बीच बहुत बड़ा फासला है। यदि 2024 का संसदीय चुनाव ‘अवैध’ था, तो सिर्फ प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और भाजपा सांसदों के ही चुनाव ‘अवैध’ नहीं थे, बल्कि नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसदों के निर्वाचन भी ‘अवैध’ हैं। लोकसभा के समूचे 543 सांसदों के चुनाव भी ‘अवैध’ हैं। क्या भारत जैसे लोकतंत्र और संवैधानिक देश में ‘अवैध संसद’ काम कर सकती है? क्या नेता प्रतिपक्ष का यह कथन देश के मतदाताओं, जनादेश, लोकतंत्र और संविधान का मजाक नहीं उड़ा रहा है?
दरअसल यह खास किस्म की उत्तेजना, तैश, आवेश और कुंठा में बोला गया कथन है। चुनाव आयोग ने 28 अक्तूबर, 2025 को ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) का अभियान बिहार से शुरू किया था, तो मई-जून, 2024 के लोकसभा चुनाव में किसने और कैसे ‘वोट चोरी’ की? एसआईआर कर्नाटक, तेलंगाना, केरल में भी किया गया है, जहां कांग्रेस की सरकारें हैं। गौरतलब यह है कि जनवरी, 2024 में सहकारी सचिव के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद ज्ञानेश कुमार गुप्ता को 15 मार्च को, सुखबीर सिंह संधु के साथ, चुनाव आयुक्त के संवैधानिक पद पर नियुक्त किया गया था। तब राजीव कुमार सीईसी थे। यदि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच सहमति न हो, तो कोई भी निर्णय लागू नहीं किया जा सकता। यही हालिया संकट और विवाद है। ‘वोट चोरी’ तो बेहद गंभीर और साजिशाना हरकत है। बहरहाल विपक्ष की लगातार राजनीतिक मुहिम के बावजूद ‘वोट चोरी’ एक राष्ट्रीय मुद्दा, आम आदमी के सरोकार का मुद्दा नहीं बन पाया है। जिन 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, उनमें करीब 2.88 करोड़ नाम ऐसे हैं, जो ‘दिवंगत’ हो चुके हैं और 1 करोड़ से अधिक लोगों के पास दोहरे मतदाता पहचान पत्र हैं। यह अवैध और असंवैधानिक है। राजधानी दिल्ली में ही 47 लाख से अधिक के नाम ‘अनिश्चित’ हैं। यदि वे आंदोलित होते, तो दिल्ली की सडक़ें अवरुद्ध हो जातीं। हिंसा भी भडक़ सकती थी! यदि उनमें से 2 लाख मतदाता भी विपक्ष की रैली के साथ जुड़ते, तो एक असामान्य भीड़ सडक़ों पर बिछ सकती थी! किसी भी सरकार के लिए वह स्थिति चुनौतीपूर्ण होती, लेकिन ऐसी चुनौती देश के किसी भी कोने से दिखाई नहीं दी है।



















