‘ईज ऑफ डूइंग बिजनैस’ एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजैंडे पर है। हाल ही में केंद्रीय सचिवों के साथ समीक्षा बैठक में पुरानी रट फिर सुनाई दी कि लालफीताशाही हटाओ, विभागों में तालमेल बिठाओ। लेकिन भारत में कारोबार की असली समस्या की जड़ कारोबार की शुरूआत से पहले ही ली जाने वाली दर्जनों मंजूरियां, रजिस्ट्रेशन और लाइसैंस प्रोसैस पर होने वाले भारी खर्च के बावजूद प्रक्रिया में होने वाली लंबी देरी है। सही मायने में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनैस’, ‘अर्न एंड पे’ आधारित होना चाहिए। यानी पहले कारोबार जमाओ और बाद में रजिस्ट्रेशन, मंजूरियों और लाइसैंस आदि की फीस अदा करो।
एक रैस्टोरैंट के लिए करीब 30 मंजूरियों में महीनों लगते हैं। दफ्तरों के बीच तालमेल व एक तय समय में मंजूरी के अभाव में एक मेज से दूसरी मेज तक मंजूरी भ्रष्टाचार बढ़ाती है। डिजिटल क्रांति के बावजूद एक दस्तखत के बाद अगले दस्तखत के बीच की खाई से जहां हजारों महत्वाकांक्षी युवा, जो नौकरी मांगने की बजाय नौकरी देने का जज्बा रखते हैं, हिम्मत हार कर बैठ जाते हैं। मंजूरियों पर करोड़ों रुपए खर्च : 500 करोड़ रुपए के निवेश से किसी फैक्टरी के लिए करीब 25-30 एकड़ औद्योगिक जमीन चाहिए। इस पर पंजाब में स्टैंप ड्यूटी जमीन के कलैक्टर रेट का 7 फीसदी व 1 फीसदी रजिस्ट्रेशन फीस मिलाकर करीब 2.40 करोड़ रुपए बैठती है। इस पर एक्सर्टनल डिवैल्पमैंट चार्जेज (ई.डी.सी.) के अलावा कई तरह की अप्रूवल व लाइसैंस फीस और सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर फंड लेवी मिलाकर खर्च 3 करोड़ रुपए के पार जाएगा।
बिजली कनैक्शन, पर्यावरण मंजूरी और पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की सहमतियां, प्रोजैक्ट का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन, फैक्टरी लाइसैंस, फायर-एन.ओ.सी. और लेबर, जी.एस.टी. विभाग का रजिस्ट्रेशन आदि मिलाकर एक कारोबारी को 500 करोड़ रुपए के निवेश से एक फैक्टरी के लिए नींव की पहली ईंट रखने से पहले ही 10-12 करोड़ रुपए रजिस्ट्रेशन, अप्रूवल और लाइसैंसों आदि पर खर्च करने पड़ते हैं।
पंजाब की इंडस्ट्रियल एंड ट्रेड डिवैल्पमैंट पॉलिसी 2026 के तहत सी.एल.यू., ई.डी.सी. और जी.एस.टी. रिफंड के प्रावधान के बावजूद रिफंड की खिड़की खुलने में ही 3 से 5 साल लगते हैं। यही खाई असली समस्या है कि कारोबारी को तमाम अप्रूवल, रजिस्ट्रेशन और लाइसैंसों के लिए पैसा पहले देना होता है और रिफंड के लिए वर्षों तक विभागों के चक्कर काटने पड़ते हैं। जब तक स्वतंत्र थर्ड पार्टी ऑडिट के मुताबिक कारोबार मुनाफे में न आ जाए, तब तक अप्रूवल, रजिस्ट्रेशन व लाइसैंस फीस क्यों न टाल दी जाए? तीन मोर्चों पर चुनौती : पहले जमीन सबसे कड़ी चुनौती है। जमीनों के मालिकाना रिकॉर्ड बिखरे हुए हैं, कृषि जमीन पर इंडस्ट्री लगाने के लिए चेंज ऑफ लैंड यूज (सी.एल.यू.) ही महीनों तक ङ्क्षखचता है और सड़क, पानी व ड्रेन के कनैक्शन अक्सर निर्माण पूरा होने के बाद ही मिलते हैं। चार नए लेबर कोड लागू होने के बावजूद श्रम सुधार के नाम पर नया कानून भी इंस्पैक्टरों व पोर्टल पर निर्भर करता है। कांट्रैक्ट इंफोर्समैंट सबसे कमजोर है। डूइंग बिजनैस रिपोर्ट में भारत कांट्रैक्ट इंफोर्समैंट के मामले में 163वें स्थान पर है लेकिन ट्रायल कोर्ट में कमॢशयल विवाद के निपटान में औसतन 1445 दिन लगते हैं।
देरी भी एक टैक्स : केंद्र सरकार ने भले ही जन विश्वास एक्ट 2022 के तहत अंग्रेजों के जमाने से लागू काले कानूनों से आजादी दिलाई, पर राज्यों में मंजूरी, लाइसैंस और रजिस्ट्रेशन में देरी की यह कीमत देश की जी.डी.पी. का सालाना 1.5 से 2.5 फीसदी के बीच आंकी जाती है। यह ऐसा टैक्स है, जो सरकारी खजाने में नहीं जाता, बल्कि यह सिस्टम की लापरवाही और लेट-लतीफी के लिए चुकाया जा रहा है। यू.ए.ई. ने कारोबार के लिए करीब 4,000 प्रोसैस खत्म करके उन पर लगने वाला समय 70 फीसदी तक घटाया। लेनदेन के विवादों से जुड़ी 200 से ज्यादा प्रक्रियाओं के लिए जांच का समय सिंगापुर ने आधा कर दिया है।
असली आर्थिक सुधार : निवेश बाजार के आकार पर नहीं, बल्कि भरोसेमंद स्थिरता के पीछे भागता है-मंजूरियों में कितनी देर लगती है, बिजली सप्लाई पूरी है या नहीं, जमीन का सी.एल.यू. कितनी तेजी से होता है, लॉजिस्टिक्स काम करता है या नहीं। केंद्र सरकार के डिपार्टमैंट फॉर प्रोमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डी.पी.आई.आई.टी.) का बिजनैस रिफॉम्र्स एक्शन प्लान एक तीखा सवाल पूछता है कि क्या राज्य सरकारें कारोबार की अड़चनें कम रही हैं, या कोरे ऐलान कर रही हैं? अलग राजनीतिक विचारधारा के बीच कई राज्यों ने प्रशासनिक अनुशासन की एक नई मिसाल कायम की है। गुजरात ने नीति की निरंतरता और बुनियादी ढांचे से व्यापक सुधार किया, तमिलनाडु के औद्योगिक क्लस्टर, तेलंगाना की टी.एस.आई. पास ने प्रोसैस में देरी के लिए जवाबदेही के साथ तय समय में मंजूरियां दीं। कर्नाटक ने मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देते हुए टैक ईकोसिस्टम पर भरोसा किया, तो वहीं आंध्र प्रदेश ने तमाम मंजूरियों के लिए संबधित विभागों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रखा। पंजाब समेत कई राज्यों का सिंगल-विंडो सिस्टम दरअसल सिंगल-विंडो फॉरवर्डिंग सिस्टम है। ऑनलाइन अर्जी करीब 30 विभागों की भूलभुलैयां में खो जाती है। फाइलें डिजिटल हैं पर प्रक्रिया डिजिटल नहीं हुई।
आगे की राह : मंजूरी के लिए राज्य एक तय समय सीमा सार्वजनिक करें व इसके बीतने पर उन मानवीय हस्तक्षेप को दूर करें, जो फाइलों पर कुंडली मार कर बैठ जाते हैं। मेघालय के आॢटफिशियल इंटैैलिजैंस (ए.आई.) संचालित शिकायत विभाग में दाखिल ऑनलाइन फाइल खुद अलर्ट बन जाती है। राज्य ईज ऑफ डूइंग बिजनैस के बारे में गंभीर हैं तो रिफंड के लिए लंबे इंतजार की बजाय सी.एल.यू., स्टैंप ड्यूटी, ई.डी.सी., बिजली कनैक्शन व प्रदूषण बोर्ड की फीस 3 से 5 साल के लिए टाली जाए। (लेखक कैबिनेट मंत्री रैंक में पंजाब इकोनॉमिक पॉलिसी एवं प्लानिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन भी हैं)-डा. अमृत सागर मित्तल



















