13 सितम्बर को जैसे ही अंतिम ब्रिक्स काफिला भारत मंडपम से निकला, जिसके 2 सप्ताह पहले एस.सी.ओ. शिखर सम्मेलन और आगे जी20 था, तो किसी को एक गुस्ताख सवाल पूछने के लिए माफ किया जा सकता है-भारत आखिरी बार अपने सभी 7 दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ एक मेज पर कब बैठा था? वह 27 नवम्बर, 2014 को काठमांडू में था। उसके बाद से सब कुछ खाली कुर्सी का ही एक इतिहास रहा है।
विडंबना तीखी है। प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स नेताओं से कहा कि ग्लोबल साऊथ दुनिया के संकटों की अग्रिम पंक्ति में और उसके फैसलों की पिछली पंक्ति में बैठता है और हमें इस ‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ को ‘सांझेदारी के मंच’ में बदलना चाहिए। दक्षिण एशिया, जो मानवता का एक चौथाई हिस्सा है, उसकी कोई पंक्ति ही नहीं है। प्रति व्यक्ति जी.डी.पी. के आधार पर पीटरसन इंस्टीच्यूट फॉर इंटरनैशनल इकोनॉमिक्स का एक अनुमान बताता है, ‘ग्लोबल साऊथ दुनिया की 85 प्रतिशत आबादी और वैश्विक जी.डी.पी. के लगभग 39 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है’। सार्क ने 12 वर्षों में कोई शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं किया और इसके विदेश मंत्री औपचारिक रूप से आखिरी बार मार्च 2016 में मिले थे। दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। पड़ोस में ढोल एक दशक से खामोश है।
सार्क किसी अन्य के विचार से पहले बंगलादेश का विचार था और इसके 1985 के चार्टर ने इसे कागज पर पृथ्वी का सबसे अधिक आबादी वाला क्षेत्रीय समूह बना दिया। कागज पर ही इसका अधिकांश हिस्सा सीमित रहा है। अनुच्छेद III नेताओं को वर्ष में कम से कम एक बार मिलने के लिए प्रतिबद्ध करता है। अनुच्छेद X प्रत्येक स्तर पर सर्वसम्मति की मांग करता है और ‘द्विपक्षीय और विवादास्पद मुद्दों’ को बाहर रखता है। सार्क की आबादी का लगभग तीन-चौथाई और उसके उत्पादन का 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा भारत का है। सर्वसम्मति, जो प्रवेश का मूल्य था, ने सभी को वीटो दे दिया। यह मंच पंगु होने से बहुत पहले ही कमजोर हो चुका था-इसके 18 में से 11 शिखर सम्मेलन स्थगित किए गए थे, वे सभी 18 सितम्बर, 2016 को जम्मू और कश्मीर के उरी में 12वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड के प्रशासनिक बेस पर हुए आतंकी हमले से पहले के थे। श्रीलंका ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में तब तक मेजबानी करने से इंकार कर दिया, जब तक कि भारतीय शांति सेना (आई.पी.के.एफ.) वापस नहीं हट गई, मालदीव और भूटान ने बुनियादी ढांचे, वित्तीय और राजनीतिक बाधाओं के कारण इसे स्थगित किया और पाकिस्तान, बंगलादेश तथा नेपाल में घरेलू अस्थिरता के कारण आगे और व्यवधान उत्पन्न हुए।
विदेश मंत्री 2021 तक महासभा के इतर अनौपचारिक रूप से मिलते रहे, जब काबुल की ओर से कौन बोलता है, इस सवाल ने इसे भी समाप्त कर दिया। नेपाल 2014 से अध्यक्ष पद पर बना हुआ है। समितियां संयुक्त सचिव स्तर पर मिलती हैं और बकाए का भुगतान किया जाता है। नई दिल्ली ने वही किया जो बड़ी शक्तियां करती हैं-उसने मंच के इर्द-गिर्द निर्माण किया। उरी के एक महीने के भीतर, भारत ने गोवा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के साथ-साथ बिम्सटेक आऊटरीच शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। बंगाल की खाड़ी के इस समूह में सार्क के 8 में से 5 सदस्य हैं और पाकिस्तान नहीं है। यह काबुल, माले या सिंधु तक नहीं पहुंच सकता।
पड़ोस ने विनम्रता से इंतजार करना बंद कर दिया है। बंगलादेश, जो इस मंच का रचयिता था, इसका सबसे मुखर शोक मनाने वाला रहा है। मुहम्मद यूनुस ने दिसम्बर में कहा था कि वह सार्क की बैठक के लिए ‘भले ही केवल 5 मिनट के लिए’ तैयार हो जाते। तारिक रहमान की निर्वाचित सरकार पुनरुद्धार को एक विदेश नीति का उद्देश्य मानती है और कहती है कि ढाका को सार्क और बिम्सटेक के बीच चयन करने की आवश्यकता नहीं है। मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जूू ने 2 बार पुनरुद्धार का आह्वान किया और माले को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया है। नई सरकारों, चरमराई अर्थव्यवस्थाओं और टैरिफ युद्ध ने छोटे देशों को याद दिला दिया है कि एक गुट ही उनकी एकमात्र सौदेबाजी की ताकत है। नई दिल्ली का जवाब अपरिवर्तित है-दक्षिण एशिया में हर कोई जानता है कि कौन-सा देश सार्क को रोक रहा है, यह पाकिस्तान है जो आतंकवाद को राजकीय नीति के साधन के रूप में त्यागने से इंकार करता है।
इस्लामाबाद ने विकल्पों की तलाश शुरू कर दी है। पाकिस्तानी, चीनी और बंगलादेशी राजनयिक जून, 2025 में कुनमिंग में मिले, पाकिस्तान ने कहा है कि क्षेत्रीय समूहों को ‘किसी की हठधर्मिता का बंधक’ नहीं बनाया जाना चाहिए और पाकिस्तानी रिपोॄटग एक ऐसे संगठन का वर्णन करती है, जिसे बीजिंग के साथ मिलकर तैयार किया गया है, जो सार्क की जगह ले सकता है। जो देश भारत मंडपम में ग्लोबल साऊथ की बात करता है, उस पर अपने दरवाजे के बाहर खड़े दक्षिण एशिया को जवाब देने की जिम्मेदारी है। फिर, कैसे? पहला, प्रक्रिया को शिखर सम्मेलन से अलग करें। भारतीय प्रधानमंत्री के इस्लामाबाद में कदम रखे बिना भी मंत्री और विदेश सचिव अनुच्छेद IV और V के तहत काठमांडू में बैठक कर सकते हैं। दूसरा, अनुच्छेद VII का उपयोग करें-ग्रिड, आपदा प्रबंधन और फूड बैंक के लिए एक्शन कमेटियां।
तीसरा, अनुच्छेद ङ्ग को वैसा ही पढ़ें, जैसा वह लिखा गया है। आतंकवाद 1987 में ही द्विपक्षीय नहीं रहा था, जब सदस्यों ने आतंकवाद के दमन पर सार्क क्षेत्रीय सम्मेलन पर हस्ताक्षर किए थे, इसलिए भारत की पूर्व शर्त को मंच के भीतर भी आगे बढ़ाया जा सकता है। चौथा, नेपाल को अध्यक्षता सौंपने दें। पांचवां, एक शर्त के साथ माइनस-ङ्ग को स्वीकार करें-ङ्ग किसी परियोजना से अनुपस्थित हो सकता है, चार्टर से कभी नहीें, ताकि कोई विकल्प दक्षिण एशिया की मेज पर बीजिंग को न बैठा दे। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 2003 में कहा था-‘मित्र बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं’। इस्लामाबाद शिखर सम्मेलन जल्द नहीं होगा और शायद तब तक होना भी नहीं चाहिए, जब तक पाकिस्तान की आतंकवादी प्रवृत्ति मैदान में बनी हुई है। इसके बावजूद यह मंच फिर से सांस ले सकता है, यदि सबसे बड़ा सदस्य यह निष्कर्ष निकाले कि अनुपस्थिति की तुलना में उपस्थिति कम महंगी है।-मनीष तिवारी (वकील, सांसद एवं पूर्व मंत्री)



















