किसी चुनावी प्रणाली की अखंडता केवल चुनावों के संचालन पर ही नहीं, बल्कि उन प्रक्रियाओं की सार्वजनिक समझ पर भी निर्भर करती है जिनके माध्यम से मतदाता सूचियां तैयार, संशोधित और अंतिम रूप दी जाती हैं। विशेष सघन पुनरीक्षण एस.आई.आर. को लेकर हाल ही में हुई सार्वजनिक बहस ने ड्राफ्ट-चरण की जानकारी और अंतिम मतदाता-सूची के आंकड़ों के बीच अंतर करने के महत्व को उजागर किया है।
व्यापक रूप से प्रसारित एक दावे में ‘13 करोड़ मतदाताओं के हटाए जाने’ का उल्लेख है। चुनाव आयोग की आपूर्ति की गई सामग्री के अनुसार, यह आंकड़ा विभिन्न श्रेणियों में आने वाली ड्राफ्ट-चरण की प्रविष्टियों से संबंधित है, जिसमें लगभग 2.8 करोड़ मृत, 3 करोड़ अनुपस्थित। पता न चलने वाले, 6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित और 1 करोड़ दोहरे नामांकन शामिल हैं। ये श्रेणियां 13 करोड़ अंतिम विलोपन के समतुल्य नहीं हैं। मतदाता-सूची की प्रक्रिया सत्यापन, दावों और आपत्तियों तथा अंतिम रूप दिए जाने के दौर से गुजरती है, जिसके बाद अंतिम सूची तैयार की जाती है।
भारत का चुनावी इतिहास यह प्रदर्शित करता है कि संस्थागत विश्वसनीयता समय के साथ निर्मित हुई है। 1990 के दशक में टी.एन. शेषन का कार्यकाल आयोग की मौजूदा शक्तियों के अधिक मुखर प्रयोग के लिए याद किया जाता है, जिसमें आचार संहिता का सख्ती से अमल और आयोग की भूमिका की अधिक दृश्यता शामिल है। उस दौर का महत्व केवल यह नहीं था कि आयोग ने शक्ति का प्रयोग किया, बल्कि यह था कि नागरिक उसे राजनीतिक दबावों से स्वतंत्र रूप से कार्य करने में सक्षम संस्था के रूप में तेजी से देखने लगे।
तीन दशक बाद, चुनौती का स्वरूप भिन्न है। आयोग ऐसे सूचना परिवेश में काम करता है जहां कोई दावा उसकी प्रासंगिकता समझे जाने से पहले ही लाखों स्क्रीन पर यात्रा कर सकता है। चुनावी डेटा, प्रशासनिक निर्णय और तकनीकी प्रक्रियाएं एक शीर्षक या एक छोटे वीडियो तक सीमित की जा सकती हैं। ऐसे परिवेश में, संस्थागत संचार चुनावी पारदर्शिता का हिस्सा बन जाता है।
मतदाता-सूची पुनरीक्षण पर हालिया बहस इस बिंदू को स्पष्ट करती है। ड्राफ्ट अभ्यास से जुड़े एक बड़े आंकड़े को ऐसा अर्थ मिल सकता है जो उसकी वास्तविक प्रशासनिक स्थिति से काफी भिन्न हो। आयोग का अपना चुनावी ढांचा समावेशन के लिए दावों, प्रस्तावित समावेशन या विलोपन पर आपत्तियों और निवास के सुधार या स्थानांतरण के आवेदनों के बीच अंतर करता है। इसलिए, सार्वजनिक संदेह का उत्तर केवल यह नहीं हो सकता कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक प्राधिकारी है। संवैधानिक दर्जा आयोग के जनादेश को स्थापित करता है जब उस जनादेश का प्रयोग पारदर्शिता के साथ किया जाता है और उसके निर्णय समझने तथा जांचने योग्य होते हैं, तब जनविश्वास मजबूत होता है। इसके लिए आयोग से हर आलोचक को संतुष्ट करने की अपेक्षा नहीं की जाती। कोई भी स्वतंत्र संवैधानिक संस्थान सार्वभौमिक सहमति की मांग करके कार्य नहीं कर सकता। हालांकि, इसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से समझाए, प्रासंगिक जानकारी सुलभ रूपों में प्रकाशित करे और अनंतिम जानकारी, प्रशासनिक निर्णयों तथा अंतिम परिणामों के बीच अंतर बताएं।
यही सिद्धांत गलतियों पर भी लागू होता है। भारत के पैमाने की चुनावी प्रक्रिया का संचालन करने वाला संस्थान अपरिहार्य रूप से त्रुटियों, चूकों और विवादों का सामना करेगा। संस्थागत विश्वसनीयता के लिए यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसी समस्याएं उत्पन्न नहीं हो सकतीं। इसके लिए यह प्रदर्शित करने की आवश्यकता है कि स्थापित प्रक्रियाओं के माध्यम से त्रुटियों की पहचान की जा सकती है, उन्हें सुधारा जा सकता है और उनका हिसाब रखा जा सकता है। यहां एक बड़ा संवैधानिक पाठ मिलता है। संस्थाएं तब और मजबूत होती हैं जब उनकी प्राधिकार के साथ पारदर्शिता भी जुड़ी होती है। स्वतंत्र बने रहने के लिए चुनाव आयोग को जांच-पड़ताल से अछूता रखने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, अनुमानित प्रक्रियाएं, सुलभ जानकारी और तर्कसंगत स्पष्टीकरण स्वतंत्रता को अधिक विश्वसनीय बना सकते हैं।
इसलिए चुनावों में जनविश्वास को किसी संस्था में बिना विचारे अंधविश्वास के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह विश्वास होना चाहिए कि संस्था के पास कार्य करने का प्राधिकार है, गलतियों को सुधारने की प्रक्रियाएं हैं और अपने निर्णयों को समझाने का खुलापन है।
यही अंतत: चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का अधिक टिकाऊ आधार है। नागरिकों से बिना प्रश्न किए विश्वास करने की अपेक्षा करना नहीं, बल्कि एक ऐसी चुनावी प्रणाली जिसमें नागरिकों के पास विश्वास करने का पर्याप्त कारण हो क्योंकि संस्था लगातार यह प्रदर्शित करती है कि वह कैसे और क्यों कार्य करती है।-रविंदर ननरा



















