नैनीताल: यहां पर कैंची धाम पहाड़ियों की तराई में बाबा नीम करौली (नीब करौरी) का एक ऐसा आश्रम है जहां आस्था के साथ प्राकृतिक सौंदर्य सबको आकर्षित करता है। यह आश्रम सिर्फ श्रद्धालुओं ही नहीं पंछियों का भी आश्रय स्थल रहा है। हालांकि अब इस सुरम्य आश्रम के आसपास गौरेया और अन्य पक्षी कम दिखते हैं। इस क्षेत्र के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी और इसके साथ वाहनों से वायु और ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ गया। इससे पक्षियों का यह नैसर्गिक ठिकाना उनके अनुकूल नहीं रहा। प्रदूषण कैंची धाम में जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहा है।
उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध कैंची धाम में ध्वनि प्रदूषण के साथ पर्यावरणीय बदलाव देखे जा रहे हैं। बर्ड वाचर और वन विभाग के अधिकारी क्षेत्र में पक्षियों की मौजूदगी घटने पर चिंता जाहिर कर रहे हैं। कैंचीधाम और पांगरा की पहाड़ियां कभी पक्षियों के कलरव से गूंजती रहती थीं। लेकिन अब यहां पक्षियों की कई प्रजातियां दिखना बंद हो गई हैं।
पर्यटन का विकास वन्यजीवों के अनुकूल नहीं
बर्ड वाचर जगजीवन सिंह धामी के मुताबिक जब किसी भी जगह पर टूरिज्म बढ़ता है तो वहां के स्थानीय लोगों के अलावा वन्यजीव भी प्रभावित होते हैं। उनका दावा है कि घरों के आसपास आसानी से दिखाई देने वाली गौरैया अब कैंची धाम क्षेत्र में करीब गायब हो चुकी हैं। कई अन्य पक्षी प्रजातियां भी यहां से पलायन कर रही हैं।
कैंची धाम और पंगोट में पक्षियों का बसेरा
धामी ने बताया कि कैंची धाम और पंगोट की पहाड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। यह पूरा क्षेत्र पक्षी विविधता के लिए अहम माना जाता रहा है। यहां पर ब्रिटिश शासन काल में बर्ड वाचिंग की गतिविधियां चलती रहती थीं। क्षेत्र में गौरैया, लाफिंग थ्रश सहित पक्षियों की अनेक प्रजातियां और कई किस्म के पेड़-पौधे पाए जाते थे। पानी के स्रोतों के आसपास बड़ी तादाद में पक्षी देखने को मिलते थे। करीब तीन साल पहले तक लोग बाबा नीब करौरी महाराज के दर्शन के साथ यहां की नैसर्गिक सुंदरता के बीच पक्षियों की मौजूदगी का आनंद लेने के लिए पहुंचते थे। हालांकि अब यहां पर्यटकों का दबाव बढ़ने, वाहनों की आवाजाही बढ़ने और अन्य गतिविधियों के बढ़ने से पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर विपरीत असर पड़ रहा है।
पक्षियों और पेड़-पौधों के संरक्षण की जरूरत
जगजीवन सिंह धामी के मुताबिक, नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन रिजर्व साल 2016 में अस्तित्व में आया था। करीब 114 वर्ग किलोमीटर का यह क्षेत्र करीब 1000 से 2611 मीटर की ऊंचाई पर फैला हुआ है। यहां की जैव विविधता को देखते हुए कैंची धाम और आसपास के क्षेत्रों में पक्षियों के संरक्षण पर खास ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र का व्यापक सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि पहले यहां कौन-कौन सी पक्षी प्रजातियां और पेड़-पौधे मौजूद थे और अब उनकी स्थिति क्या है। इस अध्ययन से उन प्रजातियों की पहचान की जा सकती है जिनकी संख्या घट रही है। इसी के आधार पर पक्षियों और वनस्पति प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रभावी योजना तैयार की जा सकती है।
वाहनों के कारण बढ़ रहा प्रदूषण
नैनीताल के वन क्षेत्राधिकारी आनंद लाल ने बताया कि कैंची धाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। अन्य क्षेत्रों को जोड़ने वाला हाईवे भी इसी क्षेत्र से गुजरता है। ऐसे में सड़क पर वाहनों का आवागमन काफी बढ़ गया है। इससे बढ़ने वाला प्रदूषण पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने कहा कि कैंची धाम इलाका नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन रिजर्व से सटा हुआ है। यहां की वन संपदा पहले काफी समृद्ध रही है। कैंची धाम से पांगरा तक के क्षेत्र में पहले चिड़ियों की करीब 3000 प्रजातियां पाई जाती थीं, लेकिन अब यहां पक्षियों की कमी महसूस की जा रही है।
लाल ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण एक गंभीर चुनौती है। शोर का माहौल पक्षियों के प्रजनन और उनके घोंसले बनाने के लिए अनुकूल नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि हाईवे के आसपास कुछ पेड़ों की पत्तियों के रंग में बदलाव भी दिखाई दे रहा है। बढ़ते पर्यटन के बीच वन्यजीवों और पक्षियों के संरक्षण के लिए पर्यटन की व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है। वन क्षेत्राधिकारी ने कहा कि कैंचीधाम में इलेक्ट्रिक और प्रदूषण रहित वाहनों के संचालन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे यहां प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।



















