देखा जाये तो राजनीति में बात सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी गांव में मकान टूटे और एक नेता ने नाराजगी जता दी। सवाल यह है कि शिवराज ने यह आवाज उस सरकार के खिलाफ उठाई है, जिसके मुखिया उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री हैं।
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों फिर वही पुराना सवाल सिर उठाने लगा है कि क्या सूबे की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान का दखल अब भी उतना ही दमदार है, या मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी अलग लकीर खींचने में जुटे हैं? ऊपर से सब कुछ भाजपा के अनुशासित कुनबे जैसा दिखता है, लेकिन बुधनी के कोसमी गांव से लेकर किसानों की मूंग खरीदी और लाड़ली बहना योजना तक, कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने भोपाल के सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
ल्लेखनीय है कि ताजा चिंगारी सीहोर जिले के कोसमी गांव से उठी है। यह वही इलाका है, जहां शिवराज सिंह चौहान की बरसों पुरानी राजनीतिक जमीन रही है। गांव में आदिवासी परिवारों के मकान हटाए जाने, फसलों को नुकसान पहुंचने और कुओं को मिट्टी से भरने की शिकायतों पर शिवराज ने अपनी ही पार्टी की सरकार के अधिकारियों को कठघरे में खड़ा कर दिया। उनका रुख साफ था कि सरकार किसी की भी हो, गरीब और आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की और मुख्यमंत्री मोहन यादव से बात करने की बात कही।
देखा जाये तो राजनीति में बात सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी गांव में मकान टूटे और एक नेता ने नाराजगी जता दी। सवाल यह है कि शिवराज ने यह आवाज उस सरकार के खिलाफ उठाई है, जिसके मुखिया उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री हैं। मोहन यादव ने भी मामले को हल्के में नहीं लिया। उन्होंने मुख्य सचिव से जांच कराने और प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आवास तथा भोजन की व्यवस्था करने की बात कही। दूसरी तरफ, कलेक्टर की रिपोर्ट में वन भूमि पर अतिक्रमण और सागौन के पौधों को नुकसान पहुंचाने के आरोप सामने आए। यानी मामला केवल सियासी बयानबाजी का नहीं, बल्कि वन संरक्षण, प्रशासनिक कार्रवाई और आदिवासी परिवारों के अधिकारों का भी है।
लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में हर घटना का एक स्थानीय और एक राजनीतिक अर्थ होता है। कोसमी का मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि शिवराज ने जिस इलाके में लंबे समय तक अपनी राजनीतिक पकड़ बनाई, वहीं की घटना पर उनका इस तरह सामने आना कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल अपने पुराने मतदाताओं के प्रति जवाबदेही है, या इसके पीछे भोपाल की सत्ता के साथ तालमेल का कोई बड़ा सवाल भी छिपा है?
इस कहानी का दूसरा सिरा लाड़ली बहना योजना से भी जुड़ता है। शिवराज की राजनीति की पहचान बनी इस योजना ने प्रदेश में महिलाओं के बीच उनकी अलग छवि बनाई। अब मुख्यमंत्री मोहन यादव की ओर से योजना के खर्च को भारी बताने वाली टिप्पणी ने पुरानी राजनीतिक विरासत और मौजूदा सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ दी है। शिवराज के लिए यह योजना महज सरकारी खर्च का हिसाब नहीं, उनकी राजनीतिक पहचान का भी हिस्सा है। वहीं, मौजूदा सरकार के सामने बजट, दूसरी योजनाओं और विकास कार्यों के बीच संतुलन बैठाने की चुनौती है।
तीसरा मोर्चा किसानों का है। मूंग की खरीदी को लेकर जब किसान परेशान हुए, तब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीद तेज करने की मांग की। राज्य सरकार को आखिरकार खरीदी बढ़ाने की मांग पर सहमति देनी पड़ी। देखा जाये तो यहां भी तस्वीर दिलचस्प है। केंद्र में मंत्री शिवराज, राज्य में मुख्यमंत्री मोहन यादव और बीच में किसान, जिनकी फसल और भुगतान का सवाल सीधे सरकार की जवाबदेही से जुड़ा है। शिवराज का हस्तक्षेप किसानों के लिए मददगार हो सकता है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह राज्य सरकार पर दबाव भी बनाता है।
यही वजह है कि शिवराज बनाम मोहन की चर्चा बार-बार लौट आती है। एक तरफ शिवराज हैं, जिनकी पहचान लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल, जनकल्याणकारी योजनाओं और प्रदेश के गांव-गांव में बने पुराने संपर्कों से जुड़ी है। दूसरी तरफ मोहन यादव हैं, जिन्हें अपनी सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और नेतृत्व की अलग पहचान स्थापित करनी है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, मगर प्रदेश की राजनीति में उनका असर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
फिर भी, हर मतभेद को मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई मान लेना जल्दबाजी होगी। भाजपा में संगठन का अपना अनुशासन और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका है। अभी तक सामने आई घटनाएं प्रशासन, किसान नीति और राजनीतिक विरासत पर मतभेद दिखाती हैं; मगर वे किसी औपचारिक सत्ता-संघर्ष को साबित नहीं करतीं।
फिलहाल मध्य प्रदेश की राजनीति का असली इम्तिहान बयानों से आगे होगा। कोसमी की जांच में क्या कार्रवाई होती है, प्रभावित परिवारों को क्या राहत मिलती है, लाड़ली बहना योजना को लेकर राज्य सरकार क्या फैसला करती है और किसानों की खरीदी व्यवस्था कितनी दुरुस्त होती है, इन सवालों के जवाब ही आगे की तस्वीर साफ करेंगे।
बहरहाल, भोपाल की सियासत में मामा शिवराज की हुंकार अब भी गूंज रही है, तो मुख्यमंत्री मोहन यादव भी अपने फैसलों से सत्ता पर अपनी पकड़ और नेतृत्व की लकीर खींचने में जुटे हैं। दोनों के बीच सियासी खिंचाव की आहट साफ सुनाई दे रही है, लेकिन इसे खुली जंग का नाम देना अभी जल्दबाजी होगी। असली तस्वीर तब खुलेगी जब यह सामने आये कि कोसमी के मामले में सरकार के कदम क्या होते हैं, लाड़ली बहना योजना पर क्या रुख अपनाया जाता है और किसानों के सवाल पर किसका पलड़ा भारी पड़ता है। क्योंकि मध्य प्रदेश की राजनीति में सियासी इरादे सिर्फ बयानों से जाहिर नहीं होते, उनका असली रंग फैसलों में दिखता है। भोपाल में फिलहाल बयान गूंज रहे हैं, लेकिन निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अगली चाल कौन चलता है और बाजी किस करवट बैठती है?-नीरज कुमार दुबे



















