कुछ मिनट की रील या क्षणिक प्रसिद्धि के लिए किया गया प्रदर्शन किसी युवा के पूरे करियर को बर्बाद कर सकता है। इस बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे केवल युवा अकेले जिम्मेदार नहीं है बल्कि समकालीन समाज और मीडिया का परिवेश भी दोषी है…
आज का दौर सोशल मीडिया का दौर है, जहां ‘अटेंशन इकॉनमी’ यानी आपका ध्यान खींचने की अर्थव्यवस्था का बोलबाला है। इस डिजिटल युग में यह कहावत आम है कि ‘जो दिखता है, वही बिकता है।’ हाल के दिनों में, एसआईआर यानी स्पेशल इंटेसिव रिवीजन के विरोध की आड़ में देश के विभिन्न हिस्सों में जिस प्रकार के भौंडे, उग्र और सनसनीखेज प्रदर्शन देखने को मिले हैं, उन्होंने चिंतकों, समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं को गहरी चिंता में डाल दिया है। जब युवा पीढ़ी अपने किसी असंतोष को व्यक्त करने के लिए शालीन लोकतांत्रिक तरीकों को छोडक़र तमाशेबाजी, उपद्रव और रातों-रात सोशल मीडिया पर वायरल होने की सनक का सहारा लेती है, तो यह न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बल्कि खुद उन युवाओं और देश के भविष्य के लिए एक गंभीर खतरा बन जाता है। आज की युवा पीढ़ी में वायरल होने की भूख है और वह रील्स संस्कृति का मकडज़ाल उन पर हावी है। आज के युवा एक ऐसे इंफॉर्मेशन सिस्टम में बड़े हो रहे हैं जहां हर पल खुद को साबित करने और लाइक्स, शेयर्स एवं व्यूज बटोरने का दबाव है। पारंपरिक रूप से विरोध प्रदर्शन वैचारिक स्पष्टता, लंबे संघर्ष, और लोकतांत्रिक बहसों पर आधारित होते थे।
इसके विपरीत, आज के भौंडे प्रदर्शनों का मुख्य उद्देश्य वैचारिक विरोध जताना नहीं बल्कि किसी भी तरह कैमरे की नजर में आना और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम में ट्रेंड करना होता है। युवा तत्काल संतुष्टि यानी इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। जब प्रदर्शनों में शालीनता के स्थान पर अमर्यादित नारेबाजी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और सोशल मीडिया पर सनसनीखेज रील्स बनाने को प्राथमिकता दी जाती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि विरोध का वास्तविक मुद्दा पीछे छूट चुका है और व्यक्तिगत ख्याति या अराजकता का आनंद आगे आ गया है। एल्गोरिदम का मनोविज्ञान यह है कि यहां सनसनी और उग्रता ही बिकती है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब (शॉट्र्स), एक्स (ट्विटर) और फेसबुक जैसे प्लेटफॉम्र्स के एल्गोरिदम का मुख्य उद्देश्य यूजर को अधिक से अधिक समय तक ऐप पर रोके रखना है ताकि विज्ञापन से राजस्व कमाया जा सके। डेटा विज्ञान यह साबित करता है कि मानव मस्तिष्क तटस्थ या न्यूट्रल कंटेंट की तुलना में अत्यधिक उत्तेजक, क्रोधित करने वाली या सनसनीखेज सामग्री पर तेजी से प्रतिक्रिया देता है। जब कोई युवा किसी सामान्य, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की तस्वीर डालता है तो उसे सीमित व्यूज मिलते हैं। इसके विपरीत, यदि वह कोई उग्र नारेबाजी, पुलिस के साथ तीखी नोकझोंक या कोई भौंडा स्टंट करता हुआ वीडियो पोस्ट करता है, तो एल्गोरिदम उसे तेजी से बूस्ट कर देता है। रातों-रात मिलने वाले हजारों लाइक्स और कमेंट्स युवा मस्तिष्क में डोपामाइन (खुशी और उत्साह देने वाला हॉर्मोन) का तेज संचार करते हैं जिसके कारण उसे इस प्रकार की हरकतों को दोहराने यानी वायरलिटी की लत लग जाती है। डिजिटल युग में युवाओं के बीच इंस्टेंट फेम और क्लाउट चेसिंग यानी हर कीमत पर ऑनलाइन चर्चा में बने रहने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। आधुनिक जीवनशैली में कई युवा खुद को उपेक्षित या गुमनाम महसूस करते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसा मंच देता है जहां वे खुद को हीरो या किसी बड़े आंदोलन का नायक साबित कर सकते हैं।
युवा भूल जाते हैं कि वे जिस मुद्दे के लिए सडक़ पर उतरे हैं, उसकी गंभीरता क्या है? उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि उनका कैमरा किस एंगल से सबसे नाटकीय दिख रहा है। वहीं सोशल मीडिया के एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं को ऐसी सामग्री से लगातार घेरते रहते हैं जो उनकी पहले से बनी सोच या गुस्से को सही ठहराती है। इसे इको चैंबर कहा जाता है। जब एक युवा लगातार अपनी फीड में उग्र और भडक़ाऊ वीडियो देखता है तो उसका मस्तिष्क यह मानने लगता है कि चरम कदम उठाना ही एकमात्र और सही रास्ता है। भारत का संविधान अपने नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का मौलिक अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की जीवन रेखा है। परंतु जब इस अधिकार का दुरुपयोग कर इसे उपद्रव और तमाशे में बदला जाता है तो इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है परंतु असहमति जब अनुशासनहीनता और अराजकता का रूप ले ले तो वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार बन जाती है। एसआईआर या किसी दूसरे महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय पर गंभीर बौद्धिक बहस या तार्किक विरोध होना चाहिए लेकिन भौंडे प्रदर्शन उस पूरे मुद्दे की गंभीरता को ही समाप्त कर देते हैं। नीति निर्माताओं और आम जनता का ध्यान मूल समस्या से हटकर उस तमाशे पर केंद्रित हो जाता है जिससे संवाद के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।
उग्र प्रदर्शनों में युवा अकसर व्यक्तिगत विवेक खो बैठते हैं और भीड़ का हिस्सा बनकर ऐसा कुछ कर बैठते हैं जो वे सामान्य स्थिति में कभी नहीं करते। यह प्रवृत्ति समाज में कानून के शासन को कमजोर करती है। आज की युवा पीढ़ी में शॉर्टकट की मानसिकता घर कर गई है। विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने वाले युवा अकसर इस बात से अनजान होते हैं कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। डिजिटल युग में पुलिस और प्रशासन, तकनीक यानी सीसीटीवी फेशियल रिकग्निशन, वीडियो फुटेज का व्यापक उपयोग कर रहे हैं। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या हिंसा में शामिल होने पर युवाओं के नाम पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। आज के समय में पुलिस वेरिफिकेशन किसी भी सरकारी नौकरी, उच्च शिक्षा, पासपोर्ट प्राप्ति या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में चयन का एक अनिवार्य हिस्सा है। लिहाजा कुछ मिनट की रील या क्षणिक प्रसिद्धि के लिए किया गया प्रदर्शन किसी युवा के पूरे करियर को हमेशा के लिए बर्बाद कर सकता है। इस बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे केवल युवा अकेले जिम्मेदार नहीं है बल्कि समकालीन समाज और मीडिया का परिवेश भी समान रूप से उत्तरदायी है। कई बार मुख्यधारा का मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपद्रवी तत्वों को जरूरत से ज्यादा सनसनीखेज कवरेज देते हैं। यह खेल गलत है।
डा. पवन कुमार शर्मा



















