प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ का 139वां एपिसोड 25 अक्तूबर, 2026 को प्रसारित किया गया था। मोदी जी ने स्थानीय उत्पादों यानी कि स्वदेशी को बढ़ावा देने का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि बिहार के पूर्णिया का मखाना अब ग्रीस (यूनान) तक पहुंच रहा है। देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार के सीमांचल (पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज) की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत से अधिक है। अन्य निर्यात और उत्पादों को लेकर उन्होंने कर्नाटक के कलबुर्गी की अरहर (तुअर) दाल का मालदीव निर्यात होने तथा महाराष्ट्र के आदिवासी उत्पादों और खादी की बढ़ती लोकप्रियता का भी उल्लेख किया। उन्होंने युवाओं से कुटीर उद्योगों, स्थानीय कारीगरों और महिला स्वयं सहायता समूहों के उत्पाद खरीदने की अपील भी की है।
स्थानीय उत्पादों के इस्तेमाल का सिद्धांत महात्मा गांधी जी के आर्थिक चिंतन का नतीजा है। आज देश के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, जिसके चलते मोदी जी को फिर इसके आह्वान की आवश्यकता हुई। गांधीवादी आत्मनिर्भरता के प्रमुख आधार जानना आम देश वासी के लिए जरूरी है। महात्मा गांधी जी के विचारों के अनुसार, व्यक्ति को अपनी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं के लिए अपने निकटतम परिवेश और स्थानीय कारीगरों पर निर्भर रहना चाहिए। महात्मा गांधी जी का मानना था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। सच्चा स्वराज तभी मिल सकता है जब प्रत्येक गांव अपनी भोजन, वस्त्र और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें स्वयं पूरी करने में सक्षम हो। बड़े और मशीनीकृत उद्योगों की बजाय, गांधीजी ने हस्तशिल्प, चरखा और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया, ताकि श्रम-प्रधान भारत में हर हाथ को काम और सम्मान मिल सके। बावजूद इसके, यह गांधीवादी सिद्धांत आज भी बहस का एक बिन्दू है, इनकी आवश्यकता और सार्थकता देश के लिए नकारी नहीं जा सकती।
स्थानीय उत्पादों के उपयोग पर आधारित, गांधीवादी आत्मनिर्भरता के सिद्धांत का अंतिम लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि आॢथक विकास का लाभ समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे सबसे गरीब और उपेक्षित व्यक्ति तक पहुंचे। यह सिद्धांत आज के वैश्विक संदर्भ में भी स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने और सतत् विकास के लिए प्रासंगिक माना जाता है लेकिन हम इस सिद्धांत की श्रेष्ठता को क्यों नहीं मान रहे? मोदी जी ने ‘मन की बात’ के सम्बोधन में महातमा गांधी जी के ही दिल की बात यानी कि स्थानीय उत्पादों के इस्तेमाल की बात की है। यह निष्पक्ष और महत्वपूर्ण उद्घोष है। क्या यह सत्य नहीं कि स्थानीय स्तर पर निर्मित वस्तुओं और हस्तशिल्प से ग्रामीण और कुटीर उद्योगों से जुड़े लाखों कारीगरों, बुनकरों व छोटे उद्यमियों को रोजगार मिलता है। देश में ही वस्तुओं के उत्पादन से विदेशी आयात घटता है और मुद्रा की बचत होती है। खादी, हस्तशिल्प और स्थानीय कृषि उत्पादों जैसी चीजों को प्राथमिकता मिलने से गांवों की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
हाल ही में गांधी जयंती पर अकेले गांधी ग्रामोद्योग के उत्पादों की बिक्री 28 करोड़ रुपए से अधिक दर्ज की गई, जो लोगों में स्वदेशी के प्रति बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। इसी तरह सभी स्थानीय उत्पादों के लिए और गति देने की जरूरत है। स्थानीय उत्पादों को चुनना सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि यह देश के विकास और आत्मनिर्भरता में प्रत्येक नागरिक की सीधी भागीदारी है। इस बात को शिक्षा संस्थानों के जरिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
क्यों न हम रोजमर्रा की खरीदारी में बड़े ब्रांड्स की बजाय स्थानीय दुकानदारों, साप्ताहिक बाजारों या कारीगरों से सामान खरीदें। दीवाली या अन्य अवसरों पर स्थानीय दीये, हस्तनिर्मित सजावट का सामान और स्वदेशी उपहार चुनें। इससे देश के अनेक गरीबों की आय में वृद्धि होगी। स्थानीय उत्पादों का इस्तेमाल करने से न केवल देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, बल्कि स्थानीय कारीगरों और पर्यावरण को भी लाभ मिलता है। निहित है कि हम सभी स्थानीय उत्पादों के इस्तेमाल पर देश के आर्थिक हित में फिर से मजबूत पहल करें और समाज को दिशा देने वाले इस कार्य में रोल मॉडल का काम करें। इससे हम टैरिफ जैसे अमरीकी आॢथक कूटनीति के हथियारों का मुकाबला भी कर सकते हैं।-डा. वरिन्द्र भाटिया



















