हमें यह समझना होगा कि देश की एकता केवल सरकारों या सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कत्र्तव्य है। सरदार पटेल का जीवन हमें सिखाता है कि मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग जरूरी हैं…
देश की अखंडता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण करवाती है। भारत विविधताओं का देश है। यहां अनेक धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और रीति-रिवाजों के लोग एक साथ रहते हैं। हमारी यही विविधता भारत की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन इस विविधता को एकता के सूत्र में पिरोकर रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती भी रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी सैकड़ों रियासतों को एकजुट करके एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करना। इस ऐतिहासिक कार्य को जिस महान व्यक्तित्व ने अदम्य साहस, दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ पूरा किया, वे थे भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल। उनकी जयंती 31 अक्टूबर को देशभर में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
लौह पुरुष का अद्वितीय योगदान : सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में हुआ था। उनका जीवन संघर्ष, अनुशासन, साहस और राष्ट्रसेवा की प्रेरणादायक मिसाल है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। बारडोली सत्याग्रह की सफलता के बाद उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि मिली, जो आगे चलकर उनके नाम का अभिन्न हिस्सा बन गई। पटेल केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि कुशल प्रशासक, दृढ़ निर्णय लेने वाले नेता और आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राष्ट्रनायक भी थे। स्वतंत्रता के समय भारत के सामने विभाजन, सांप्रदायिक तनाव, प्रशासनिक अव्यवस्था और रियासतों के भविष्य जैसी गंभीर समस्याएं थीं। ऐसे कठिन समय में उन्होंने देश को एक सूत्र में बांधने का ऐतिहासिक दायित्व निभाया।
रियासतों का एकीकरण : आधुनिक भारत की नींव : 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस समय देश का राजनीतिक एकीकरण पूरा नहीं हुआ था। ब्रिटिश शासन के अंत के साथ सैकड़ों देशी रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा अपने भविष्य का निर्णय करने का प्रश्न था। इन रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करना अत्यंत जटिल कार्य था। सरदार पटेल ने वीपी मेनन जैसे कुशल प्रशासनिक सहयोगियों के साथ मिलकर इस चुनौती का सामना किया। उन्होंने संवाद, कूटनीति, समझदारी और आवश्यक दृढ़ता के माध्यम से अधिकांश रियासतों को भारत में शामिल करने में निर्णायक भूमिका निभाई। हैदराबाद और जूनागढ़ जैसे मामलों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण निर्णय लिए। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की प्रक्रिया की अपनी अलग परिस्थितियां थीं, जिनमें तत्कालीन शासक और अन्य राष्ट्रीय नेतृत्व की भी भूमिका रही। यह कार्य केवल राजनीतिक सीमाओं को जोडऩे तक सीमित नहीं था। इसका वास्तविक उद्देश्य भारत की एकता, सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करना था। यदि उस समय रियासतों का एकीकरण सफल नहीं होता, तो आज भारत का राजनीतिक स्वरूप काफी अलग हो सकता था। इसी असाधारण योगदान के कारण सरदार पटेल को ‘भारत का लौह पुरुष’ कहा जाता है।
राष्ट्रीय एकता दिवस का महत्त्व : भारत सरकार ने वर्ष 2014 में सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। इसका उद्देश्य देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के प्रति नागरिकों की प्रतिबद्धता को मजबूत करना तथा पटेल के योगदान को याद करना है। इस अवसर पर देशभर में एकता दौड़, शपथ ग्रहण समारोह, संगोष्ठियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी कार्यालयों और विभिन्न संस्थानों में विद्यार्थियों तथा कर्मचारियों को राष्ट्र की एकता और अखंडता बनाए रखने की शपथ दिलाई जाती है। राष्ट्रीय एकता दिवस केवल एक महान नेता की जयंती मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन करने का दिन भी है। हमें विचार करना चाहिए कि क्या हम अपने दैनिक व्यवहार में एकता, सहिष्णुता और भाईचारे के मूल्यों को पर्याप्त महत्व दे रहे हैं? क्या हम भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर पैदा होने वाली दूरियों को कम करने का प्रयास कर रहे हैं? विविधता में एकता ही भारत की पहचान : भारत की शक्ति उसकी भौगोलिक विशालता या आर्थिक क्षमता में ही नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक एकजुटता में भी निहित है। हिमाचल प्रदेश की देवभूमि से लेकर गुजरात के समुद्री तटों तक, कश्मीर की वादियों से लेकर कन्याकुमारी तक, अलग-अलग भाषाएं और परंपराएं होने के बावजूद भारतीयता की भावना हमें एक-दूसरे से जोड़ती है। हालांकि, वर्तमान समय में समाज के सामने कई चुनौतियां भी हैं।
जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिक तनाव, क्षेत्रीय असहिष्णुता, अफवाहें और सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाएं सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकती हैं। छोटी-छोटी बातों पर आपसी मतभेदों को दुश्मनी में बदल देना राष्ट्रहित के अनुकूल नहीं है। हमें यह समझना होगा कि देश की एकता केवल सरकारों या सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। सरदार पटेल का जीवन हमें सिखाता है कि मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग के माध्यम से बड़े से बड़े लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं। राष्ट्रीय एकता का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोगों के विचार एक जैसे हों, बल्कि इसका अर्थ है कि अलग-अलग विचार रखने के बावजूद हम संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्र के सम्मान के प्रति प्रतिबद्ध रहें।
युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण : भारत विश्व के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की युवा शक्ति यदि सकारात्मक दिशा में आगे बढ़े, तो भारत विकास, विज्ञान, शिक्षा, तकनीक और सामाजिक प्रगति के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां प्राप्त कर सकता है। इसके लिए युवाओं में राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना आवश्यक है।



















