वट सावित्री विवाहित महिलाओं द्वारा अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र के लिए किया जाता है। वट सावित्री व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या को होता है। इस प्रकार इसे ज्येष्ठ अमावस्या के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन को पवित्र माना जाता है क्योंकि शनि जयंती भी इसी दिन पड़ती है। दृक पंचांग के मुताबिक इस वर्ष वट सावित्री 10 जून, दिन गुरुवार को मनाई जाएगी। वट सावित्री व्रत वाले दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की विधिविधान से पूजा-अर्चना करती और बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं।
वट सावित्री व्रत व पूजा विधि
इस दिन विवाहित महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। माथे पर पीला सिंदूर लगाएं और आभूषण (सोलह-श्रृंगार) धारण करें। बरगद के पेड़ के सामने सत्यवान और सावित्री की मूर्ति रखें। मूर्ति और बरगद के पेड़ पर जल सिंदूर, मिठाई अक्षत, चंदन और फूल चढ़ाकर दीया जलाएं। पेड़ के चारों ओर लाल या पीले रंग का पवित्र धागा बांधें और पेड़ के चारो ओर कम से कम सात फेरे लें। इस दिन सावित्री सत्यवान कथा का विशेष महत्व है। जरूरतमंदों को कपड़े, भोजन या धन का दान करें। पूजा पूरी होने के बाद विशेष व्यंजन तैयार करें और प्रसाद बांटें।
इसलिए होती हैं बरगद की पूजा
बरगद के पेड़ की पूजा को लेकर मान्यता है वट वृक्ष त्रिमूर्ति भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी छाल में विष्णु जी ,जड़ में ब्रह्मा जी और शाखाओं में शिव जी का वास होता है। इसलिए इस दिन इसकी पूजा होती है। मान्यताओं के अनुसार सावित्री ने इस दिन ही अपने पति को यमराज के चंगुल से बचाया था। इस प्रकार अपने जीवनसाथी की लंबी आयु और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए, महिलाएं इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं। यह व्रत विवाहित महिलाओं में अपने पति के प्रति प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
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