की संस्कृति में वहां की भौगोलिक परिस्थितियां काफी असर
किसी भी राज्य की संस्कृति में वहां की भौगोलिक परिस्थितियां काफी असर डालती है। छत्तीसगढ़ में देश के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा बारिश होती है, इसलिए यहां धान की फसल ली जाती है। धान की विपुल फसल होने के कारण छत्तीसगढ़ देशभर में धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध है। यहां के किसानों की आय के मुख्य जरिया भी धान की फसल है। यहां तीज त्यौहारों से लेकर दैनिक जीवन में चावल का बहुतायत से उपयोग होता है।
छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति-खान-पान, बोली-भाषा और वेश-भूषा पर गर्व की अनुभूति दिलाने के लिए मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की पहल पर एक मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर को प्रदेश मंे बोरे बासी दिवस के रूप में मनाने, सामूहिक रूप से बोरे बासी खाने का आह्वान किया गया। सामाजिक समरसता के साथ-साथ किसानों और श्रमवीरों का मान बढाने की दिशा में एक प्रशंसनीय कदम है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति और लोक परंपराओं, तीज-त्यौहारों को प्रोत्साहन देने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के लोकगायन में भी बोरे बासी का विवरण मिलता है। यह हमारी संस्कृति में रची-बसी है। यहां अमीर-गरीब सभी के घरों में इसे चाव से खाया जाता है। मेहमानों को भी इसे परोसा जाता है। लोक गायक शेख हुस्सैन जी ने बासी खाने वाले किसानों, श्रमवीरों के सम्मान के लिए ‘बटकी म बासी अउ चुटकी म नून, मै हा गांवथव ददरिया तैहां कान दे के सुन’ जैसा लोकगीत गाया।
गर्मी के मौसम में जब तापमान अधिक होता है तब छत्तीसगढ़ में बोरे बासी विशेष तौर पर खाई जाती है। यह लू से बचाने का काम करती है। वही दूसरी ओर इससे शरीर को कई प्रकार के पोषक तत्व भी मिलते हैं। उल्टी, दस्त जैसी बीमारियों में यह शरीर में पानी की कमी को दूर करती है। इन्ही खूबियों के कारण बोरे बासी छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय है। आमतौर पर घरों में पके हुए अतिरिक्त चावल के सदुपयोग के लिए बोरे बासी तैयार की जाती है। इसके गुणकारी महत्व को देखते हुए इसे घरो घर खाने का प्रचलन है।  

की संस्कृति में वहां की भौगोलिक परिस्थितियां काफी असर
छत्तीसगढ़ की संस्कृति है कि विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में यदि अचानक कोई मेहमान आ जाये अथवा कोई व्यक्ति आ जाए तो वह भूखा न जाए। सुबह जब लोग काम पर जाए तो उसके लिए तात्कालिक तौर पर भोजन की व्यवस्था हो जाए शायद इसी उद्देश्य से उपलब्ध सदस्य से अधिक खाना बनाने का रिवाज प्रचलित है। रात के बचे हुए चावल को पानी में डुबाकर रख देते है और सुबह नास्ते या भोजन के तौर पर विशेष कर सबेरे से ही काम पर जाने वाले किसान और श्रमिक खाते है इसे ही ‘बोरे बासी’ कहा जाता है।
बोरे बासी जहां गर्मी के मौसम में ठंडकता प्रदान करता है, वहीं पेट विकार को दूर करने के साथ ही पाचन के लिए रामबाण डिश है। बोरे बासी पर्याप्त पौष्टिक आहार के रूप में उभर कर सामने आया है। बोरे बासी को लोग प्याज, टमाटर-हरी मिर्च की चटनी, आम का आचार, करमता बाजी, चेच भाजी, अमारी भाजी, बिजौरी व पापड़ आदि के साथ चाव से खाया जाता है। यह धीरे-धीरे हमारी रोज की चलन में आ गया और छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध डिश बन गया।आलेख- डॉ.ओमप्रकाश डहरिया-श्री जीएस. केशरवानी

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