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सनातन धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा गया है। इन्हें प्रसन्न करना बेहद आसान होता है। इसी कारण से उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। बता दें कि माता सती और फिर उनके पार्वती स्वरूप ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। आज इस आर्टिकल में बताने जा रहे हैं कि किस तरह से मां पार्वती ने भगवान भोलेनाथ को कड़ी तपस्या कर मनाया था।
कौन हैं भोलनाथ की पहली पत्नी
बता दें कि भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती हैं। माता सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। राजा दक्ष ने कठोर तपस्या कर मां भगवती को प्रसन्न किया था। जिसके बाद उन्होंने मां भगवती से अपने घर पुत्री रूप में आने के लिए कहा था। दक्ष की तपस्या से प्रसन्न होकर माता भगवती ने सती के रूप में उनके घर जन्म लिया था। देवी भगवती का रूप होने के राजा दक्ष की सभी पुत्रियों में सती सबसे अधिक अलौकिक थीं। वह बचपन से शिव भक्ति में लीन रहती थीं। वहीं भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता सती ने सच्चे मन से आराधना की थी। जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हुए।
सती ने दे दी थी प्राणों की आहूति
लेकिन राजा दक्ष भगवान शिव को सती के लिए योग्य वर नहीं मानते थे। लेकिन माता सती ने अपने पिता व राजा दक्ष के खिलाफ जाकर शिव से विवाह कर लिया। वही राजा दक्ष ने गुस्से में भगवान शिव और माता सती को यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया। जब सती बिना बुलाए पिता के घर यज्ञ में पहुंची तो उन्होंने भगवान शिव का अपमान किया। जिसके चलते यज्ञवेदी में माता सती ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
ऐसे हुआ माता पार्वती का जन्म
माता सती ने जब अपने शरीर का देह त्याग करते हुए संकल्प लिया कि वह राजा हिमालय की पुत्री के यहां जन्म लेंगी और भगवान शिव से विवाह करेंगी। वहीं माता सती का पार्थिव शरीर लेकर भगवान शिव उनका स्मरण करते रहे। भगवान शिव को दुखी देख जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। इसके बाद माता सती ने पर्वतराज हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ से पार्वती के रूप में जन्म लिया। इसके बाद भोलेनाथ को पति के रूप में पाने लिए वह तपस्या के लिए वन में चली गईं। माता पार्वती की अनेक वर्षों की कठिन तपस्या और कठोर उपवास के बाद भगवान भोलेनाथ ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
भगवान शिव ने ली देवी पार्वती की परीक्षा
जब तपस्या के दौरान भगवान शिव ने माता पार्वती की परीक्षा ली। तो उन्होंने सप्तऋषियों को परीक्षा लेने के लिए पार्वती के पास भेजा। सप्तऋषियों ने पार्वती के पास जाकर उनको समझाने की कोशिश कि शिव अमंगल वेषधारी, अघोड़ और जटाधारी हैं। वह पार्वती के लिए उपयुक्त वर नहीं हैं। सप्तऋषियों ने कहा कि वह भगवान शिव से विवाह कर सुखी नहीं रहेंगी। जिसके बाद माता पार्वती से ध्यान छोडऩे के लिए कहा। लेकिन माता पार्वती अपने विचारों पर दृढ़ रहीं। माता पार्वती की दृढ़ता देख सप्तऋषि काफी ज्यादा प्रसन्न हुए। जिसके बाद सप्तऋषियों ने माता पार्वती को उनका मनोरथ पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। फिर वह भगवान शिव के पास लौट आए। माता पार्वती के दृढ़ निश्चय की वजह से भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर उनसे विवाह किया।

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