कोरोना काल में लॉकडाउन हर तबका बुरी तरह प्रभावित हुआ है। किसी का बिजनेस चौपट हो गया तो किसी को काम नहीं मिल रहा है। यहां तक कि कई परिवार ऐसे हैं जिनके लिए रोजी रोटी का भी संकट खत्म हो गया है। हर किसी का कामकाज भी प्रभावित हुआ। अब लॉकडाउन के बाद जनजीवन नॉर्मल होकर पटरी पर लौटने लगा है, लेकिन दर्जनों परिवार अभी भी ऐसे हैं जो लॉकडाउन जैसे हालात से गुजर रहे हैं। ये वह परिवार हैं जिनकी रोजी रोटी शादी समारोह या सामूहिक आयोजनों पर निर्भर है। इनमें भी सबसे बुरी हालत शहर में रहने वाले करीब 200 से अधिक घोड़ा बग्गी व चित्रशाला वालों के हैं। 300 से अधिक परिवार डीजे वालों के हैं जिनकी आज भी बिजनेस न चलने से रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
घोड़ा बग्गी बेचने की नौबत
अनलॉक वन, टू, थ्री, फोर और अब 1 अक्टूबर से फाइव भी शुरू हो गया है। लेकिन बैंड-बाजा, घोड़ा बग्गी आदि वालों का तो अभी भी लॉकडाउन ही जैसी स्थित है। इस पेशे से जुड़े बिजनेस मैन की माने तो वह हर वर्ष सीजन में इतना कमाते थे कि पूरा परिवार सुकून से जीवन यापन करता था। इतना ही नहीं उनके पेशे से जुड़े लोगों की भी रोजी रोटी आसानी से चलती थी। लेकिन जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है और सामूहिक आयोजन बंद हुए है तब से ऐसी स्थिति आ गई है कि वह घोड़ा बग्गी वाले घोड़ा बग्गी तक बेचने को तैयार हैं। शहर में करीब दो सौ से अधिक घोड़ा बग्गी वाले हैं जो कभी बारातों में दूल्हा को बैठा शादी समारोह में जाते हैं तो कहीं सामूहिक आयोजनों में और जुलूस की शान बना करते हैं। शहर में घोड़ा बग्गी, बैंड आदि का बिजनेस करने वाले श्यामगंज, प्रेमनगर, इज्जतनगर, बारादरी, पीलीभीत बाईपास रोड, बदायूं रोड और मिनी बाईपास सहित कई स्थानों पर इन लोगों के परिवार हैं, जिनकी रोजी रोटी इस बिजनेस के दम पर ही चलती है, लेकिन लॉकडाउन के बाद से अब इनके पास कोई विकल्प ही नहीं है। ऐसे में इन लोगों ने जो रुपए बिजनेस में लगाया था वह भी नहीं निकल पा रहा है्। घोड़ा बग्गी का काम करने वालों का कहना है कि संकट के दौर से गुजर रहे हैं समझ नहीं आ रहा है कि घोड़ों को खिलाएं या खुद और परिवार को खिलाएं।
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