सरसंघचालक मोहन भागवत ने फिर दोहराया है कि भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ है। विश्व में हिंदुओं का एक ही देश है-भारत। हिंदुओं को एकजुट हो जाना चाहिए, नतीजतन बदलाव तय हैं। ये बदलाव बांग्लादेश, पाकिस्तान और दुनिया के किसी भी कोने में देखे और महसूस किए जा सकेंगे। संघ प्रमुख सभी समुदायों को बुनियादी तौर पर ‘हिंदू’ करार देते रहे हैं, उनका डीएनए भी एक ही मानते रहे हैं, बेशक पूजा-पद्धतियां और कुछ रीति-रिवाज भिन्न हैं। सरसंघचालक ने आरएसएस की सोच और विचारधारा को भी ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ कहा है। संघ हिंदुओं के हित, कल्याण, सामथ्र्य, विकास और संरक्षण के लिए ही काम करता रहा है। हालांकि भागवत का बयान और यथार्थ तकनीकी और संवैधानिक आधार पर सही नहीं माना जा सकता। भारत के संविधान की प्रस्तावना में ही ‘पंथनिरपेक्ष’ देश घोषित किया गया है, लेकिन सरसंघचालक भागवत ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए संविधान संशोधन को भी अनिवार्य नहीं मानते। तो संविधान के मुताबिक, भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ कैसे माना जा सकता है? यदि संवैधानिक स्थिति नहीं है, तो वह कानूनन अवैध है। बहरहाल भारत की आबादी 147 करोड़ को पार कर चुकी है। हिंदू 78.9-79.4 फीसदी आबादी (करीब 115 करोड़) के साथ आज भी भारत का सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय है। यह भी हकीकत है कि हिंदुओं की आबादी लगातार घटी है और मुस्लिम आबादी बढ़ते हुए 15.2 फीसदी से ज्यादा हो गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का आकलन है कि देश में मुस्लिम आबादी 24.6 फीसदी बढ़ी है, जबकि हिंदू समुदाय की जनसंख्या में 4.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। गृहमंत्री आबादी के इस बदलते समीकरण को प्रजनन-दर की बढ़ोतरी या कमी के संदर्भ में नहीं आंकते, बल्कि ‘घुसपैठ’ को मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी का बुनियादी कारक मानते हैं।

यदि ऐसा है, तो सरकार बीते साढ़े 11 साल से घुसपैठियों को चिह्नित करने और देश से बाहर खदेडऩे में अक्षम, असमर्थ क्यों है? यदि कुछ और ही कारण हैं, तो वे देश के सामने रखे जाने चाहिए। लोकतंत्र में तो यही अपेक्षित होता है। सरसंघचालक भागवत मुसलमानों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी ‘हिंदू’ अथवा ‘सनातनी’ करार देते रहे हैं। उनका मानना है कि विशेष परिस्थितियों में उनके पूर्वजों को धर्मांतरण कर ‘मुसलमान’ बनना पड़ा। इस मुद्दे पर एक तार्किक और साक्ष्यनुमा बहस की दरकार है। अकेले सरसंघचालक ने बयान दे दिया और देश उसे स्वीकार कर लेगा, यह संभव नहीं है, क्योंकि भागवत कोई संवैधानिक पुरुष नहीं हैं। बेशक भारत में हिंदू एक महत्वपूर्ण और एकतरफा बहुसंख्यक समुदाय है, जिनके आधार पर भावनात्मक और प्रतीकात्मक रूप से भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ माना जा सकता है। दरअसल यह हिंदू सोच, संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता और समभाव की चेतना की ही खूबसूरती है कि भारत में आज भी 5.5 लाख से अधिक मस्जिदें हैं। ईसाई धर्म के चर्च की अनुमानित संख्या 28,278 है। इनके अलावा बड़े चैपल और चर्च भी हैं। मसलन-सेंट पॉल कैथेड्रल (कोलकाता), क्राइस्ट चर्च (शिमला), सेंट थॉमस कैथेड्रल (मुंबई) आदि। केरल और तमिलनाडु में भी बड़े चर्च और चैपल हैं, जहां ईसाइयों की आबादी अच्छी-खासी है। भारत में केरल को ईसाई धर्म का ‘उद्गम स्थल’ माना जाता रहा है। इसी तरह भारत में सिखों के गुरुद्वारों की संख्या भी 2024 तक 7657 बताई जाती है। कमोबेश उन्हें ‘हिंदू’ करार नहीं दिया जा सकता, बेशक मुगलकाल में सोच ‘सनातनी’ रही होगी। तब राष्ट्र के लिए संघर्ष करने और बलिदान देने का जज्बा चरम पर था। बहरहाल सरसंघचालक ने जो भी हिंदूवादी बयान दिया है, वह उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक सोच के अनुकूल होगा। उनकी चिंता बांग्लादेश में हिंदुओं पर ढाए जाने वाले अत्याचारों को लेकर स्वाभाविक है। उसके लिए उनका कहना है कि मोदी सरकार को संज्ञान लेना पड़ेगा। इसी संदर्भ में वे पश्चिम बंगाल की नई बाबरी मस्जिद को ‘राजनीतिक साजिश’ करार देते हैं, लिहाजा सरकार को जांच करानी चाहिए कि उस मुहिम में कौन लोग शामिल हैं? चंदे के तौर पर जो करोड़ों रुपए जमा हो रहे हैं, वे किसके हैं? हवाला के जरिए गलत पैसा तो भारत में नहीं आ रहा है? हिंदू राष्ट्र की अवधारणा व्यावहारिक नहीं लगती, लेकिन साधु-संतों और संघ की अपनी वैचारिक सोच है। हिंदूवादी सोच को अगर विस्तृत रूप से देखा जाए तो इसमें कई समुदाय आ जाते हैं, जैसा कि मोहन भागवत कहते हैं।

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