पटना: ‘जेडीयू ज्वाइन किया। किसी पद को धारण नहीं किया। सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हुआ। कार्यकर्ताओं की मांग के बाद भी डिप्टी सीएम नहीं बने। भविष्य में होने वाले मंत्रिमंडल के गठन में भी उनके शामिल होने की उम्मीद नहीं है। वे जमीन की राजनीति करना चाहते हैं। उन्होंने अपनी पहली और बड़ी जनसंपर्क यात्रा पर निकल पड़े हैं। निशांत कुमार के लिए सद्भाव यात्रा उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत बन रही है।’ उपरोक्त बयान एक जेडीयू नेता के हैं। उन्होंने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर आगे कहा कि निशांत कुमार बिहार की राजनीति में बड़ा लकीर खींचना चाहते हैं। अपने पिता की विरासत के लिए उनकी ये यात्रा इम्तिहान से कम नहीं है। इस यात्रा को कम करके आंकना ठीक नहीं होगा। निशांत कुमार इस यात्रा के जरिए जेडीयू के नस- नस को समझ जाएंगे। और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पैठ को मजबूत कर पाएंगे।

निशांत की यात्रा के मायने!

ध्यान रहे कि 2005 से 2026 तक अपने दो दशकों के कार्यकाल में पूर्व सीएम और निशांत कुमार के पिता नीतीश कुमार ने 16 यात्राएं शुरू की। ये सभी यात्राएं पश्चिम चंपारण से शुरू हुईं। पश्चिम चंपारण से यात्रा शुरू करने का राजनीतिक महत्व निशांत को भी मालूम है। निशांत कुमार यात्रा के जरिए ही अपनी पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। निशांत कुमार की ये यात्रा पूरे राज्य में चलेगी। इस यात्रा का उद्देश्य किसी को भाषण पिलाना नहीं है। इस यात्रा का मकसद लोगों से सीधे संवाद करना है। निशांत कुमार ने कहा भी है कि सभी वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने का मेरा संकल्प है। साथ ही लोगों को अपने पिता के किए गए विकास कार्यों के प्रति जागरूक भी करना है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद जेडीयू में आए एक खालीपन को निशांत कुमार की यही यात्रा अब भरपाई करेगी।

जेडीयू की जमीन!

सियासी जानकार मानते हैं कि निशांत कुमार की ये यात्रा उनकी खुद की राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के बाद जेडीयू को एक सियासी बूस्टर देगी। जेडीयू का फैलाव पहले से ज्यादा होगा। जेडीयू में युवा जुड़ेंगे। निशांत के प्रभाव में आकर कुशवाहा समाज के युवाओं का दल उनकी ओर आकर्षित होगा। ये जेडीयू के लिए बहुत बड़ा मौका साबित होने वाला है। निशांत के बाहर निकलने के बाद कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद की लहर उठी है। नीतीश कुमार हमेशा परिवारवाद के खिलाफ रहे। उन्होंने फ्रंट पर आकर निशांत कुमार को भी सपोर्ट नहीं किया। पार्टी ने सावधानी के साथ निशांत को लॉन्च किया है। इसका असर ये हुआ कि डायरेक्ट परिवारवाद के दाग से नीतीश कुमार भी बच गए। वहीं दूसरी ओर निशांत जेडीयू को आगे बढ़ाने में लग गए।

सद्भाव यात्रा शुरू

निशांत कुमार ने सम्राट चौधरी की कैबिनेट में किसी पद की डिमांड भी नहीं की है। वे किसी कोर टीम का हिस्सा भी नहीं हैं। निशांत कुमार एक ऐसी राजनीति की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जिसमें अपनी छवि को प्रमुखता दी है। वे सीधे किसी पद पर जाने की जगह जमीन पर संघर्ष करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। निशांत कुमार के सामने चुनौती भी कम नहीं है। उनका राजनीतिक अनुभव हालांकि कम बताया जा रहा है। उनकी तुलना हमेशा उनके पिता से की जाएगी। लेकिन वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, जेडीयू नेताओं को भरोसा है कि वे जेडीयू के साथ नीतीश कुमार की सियासी विरासत का भी उद्धार करेंगे। सद्भाव यात्रा से तय हो जाएगा कि निशांत कुमार सिर्फ नीतीश कुमार के बेटे नहीं, एक ऐसे जेडीयू नेता हैं। जो पार्टी को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। राजनीतिक पंडित कहते हैं- इस यात्रा से निशांत को जो लाभ मिलेगा, वो तो मिलेगा ही। सबसे बड़ा फायदा जेडीयू के सियासी फ्यूचर को होगा। ये यात्रा पार्टी की बढ़ोतरी में अहम भूमिका निभाएगी।

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