समरीन डॉक्टर के पास बस एक उम्मीद लेकर गई थीं. उन्हें क्या पता था कि वही मुलाकात उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी की शुरुआत बन जाएगी. इलाज के नाम पर की गई लापरवाही ने न सिर्फ उनकी सेहत छीनी, बल्कि वह सपना भी तोड़ दिया, जिसे हर महिला दिल में संजोकर रखती है. मां बनने का सपना…
दिल्ली की जिला उपभोक्ता आयोग ने इस दर्दनाक मामले में दरीयागंज स्थित एक नर्सिंग होम को 20 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. आयोग ने माना कि डॉक्टर की लापरवाही ने 40 वर्षीय समरीन को ऐसा जख्म दिया है, जो कभी भर नहीं सकता.
जब धोखे में बदल गया भरोसा
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, समरीन ने जुलाई 2020 में घर पर ही प्रेग्नेंसी टेस्ट किया था, जो कि पॉजिटिव आया. इस खबर में परिवार में खुशियां छा गईं. फिर 24 जुलाई को वह दरीयागंज के फैमिली हेल्थ केयर सेंटर पहुंचीं. वहां डॉक्टर कुलजीत कौर गिल ने सिर्फ यूरिन टेस्ट के आधार पर गर्भ की पुष्टि कर दी. उन्होंने न कोई अल्ट्रासाउंड कराया, न कोई विस्तृत जांच की.
समरीन पहले भी जटिल गर्भावस्था से गुजर चुकी थीं. यह जानकारी डॉक्टर के पास थी. इसके बावजूद बिना किसी ठोस जांच के उन्हें दवाएं दी गईं और इंजेक्शन लगाए गए. आयोग ने इसे ‘हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में अस्वीकार्य लापरवाही’ करार दिया.
दर्द देता रहा आवाज, अनसुना करता रहा अस्पताल
इलाज के बाद भी समरीन को लगातार पेट दर्द होता रहा. शरीर संकेत दे रहा था कि कुछ ठीक नहीं है. लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया. उन्हें भरोसा दिलाया जाता रहा कि सब सामान्य है. दिन बीतते गए, दर्द बढ़ता गया. करीब दो महीने बाद, जब समरीन की सहनशक्ति टूट गई, तब उन्होंने किसी दूसरे डॉक्टर से संपर्क किया. यहां सच्चाई सामने आई कि उनके गर्भ में मरा हुआ भ्रूण था और यह एक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी थी, जो अगर समय पर पकड़ में आ जाती, तो उसे बचाया जा सकता था.
हमेशा के लिए खो गया सपना
समरीन की जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उनकी फैलोपियन ट्यूब हटानी पड़ी. ऑपरेशन के बाद उन्हें बताया गया कि अब वह कभी मां नहीं बन पाएंगी. यह खबर उनके लिए किसी मौत से कम नहीं थी. एक ऐसी मौत, जिसमें शरीर जिंदा रहता है, लेकिन भीतर कुछ हमेशा के लिए खत्म हो जाता है. जिला उपभोक्ता आयोग ने कहा कि अगर डॉक्टर ने समय पर एक्टोपिक प्रेग्नेंसी की पहचान की होती, तो समरीन को यह स्थायी पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती. आयोग ने माना कि यह नुकसान अपूरणीय है.
आयोग ने क्या कहा?
अपने फैसले में आयोग ने बेहद संवेदनशील शब्दों में कहा, ‘कोई भी धनराशि उस जीवनभर के दर्द और खालीपन को नहीं भर सकती, जिससे शिकायतकर्ता गुजर रही है. लेकिन 20 लाख रुपये का मुआवजा इस लापरवाही की गंभीरता को दर्शाने के लिए आवश्यक है. यह मामला केवल डॉक्टरों की लापरवाही नहीं, बल्कि यह उस भरोसे की कहानी है, जो डॉक्टर और मरीज के बीच होता है. और जब वह भरोसा टूटता है, तो उसका असर जिंदगी भर रहता है. समरीन का मातृत्व तो लौट नहीं सकता, लेकिन यह फैसला उन तमाम महिलाओं के लिए उम्मीद की एक किरण है, जो इलाज के नाम पर लापरवाही का शिकार होती हैं.














