जनवरी 6-7 की दरमियानी रात, करीब 1.30 बजे, गहरी नींद में सोने का वक्त था, लेकिन राजधानी दिल्ली के तुर्कमान गेट में उपद्रव था, पथराव किया जा रहा था, कांच की बोतलों से भी हमले किए गए। एक उन्मादी, मजहबी और जेहादी किस्म की भीड़ थी, जो दंगा फैलाने पर आमादा लग रही थी। सिर्फ एक सफेद झूठ, मस्जिद तोडऩे की अफवाह, ने भीड़ को सडक़ों पर उतरने को विवश किया था। एक वीडियो में एक शख्स भडक़ा-उकसा रहा था-‘भाईयो! घरों से बाहर निकलने का वक्त है। अपनी दुकानें बंद करो। रात काली करो! मिलिट्री भी आ गई है। उधर कफ्र्यू लगा रखा है, ताकि मस्जिद को तोड़ा जा सके। देखो! मुसलमानों के क्या हाल किए जा रहे हैं! घरों से निकलो! हमें मस्जिद को बचाना है।’ सिर्फ यही नहीं, किसी जलाल इमरान ने बड़े झूठ का वीडियो जारी किया-‘मस्जिद तोड़ दी गई। 12 बजे से 3 बजे के बीच मस्जिद तोड़ दी गई।’ रिजवान पाशा ने भी सोशल मीडिया पर झूठ बोल कर दंगा भडक़ाने की साजिश की और मस्जिद को तोडऩे की झूठी खबर फैलाई। दिल्ली पुलिस ने ऐसे करीब 100 वीडियो जारी किए जाने की बात कही है, जिनमें मस्जिद तोडऩे की अफवाह फैलाई गई। सर्दी की आधी रात में पत्थर, ईंटें, कांच की बोतलें, कीलें आखिर कहां से आ गईं, यह सवाल एक बार फिर उभरा है। यही दृश्य उन इलाकों में भी सामने आया है, जो मुस्लिम बहुल थे और जहां दंगे जैसी हिंसा हुई थी। दिल्ली दंगे भी इसी पृष्ठभूमि पर भडक़े और फैले थे। अब तो राजधानी दिल्ली की सुरक्षा को भी ठेंगा दिखाया जा रहा है। ब्रह्म-सत्य सा यथार्थ यह है कि प्राचीन ‘‘फैज-ए-इलाही’’ मस्जिद पूरी तरह महफूज और सुरक्षित है। उसकी 0.195 एकड़ जमीन पूरी तरह वैध है। अलबत्ता उसके आसपास के करीब 36,400 वर्ग फुट के अवैध अतिक्रमण को, 32 बुलडोजरों और 4 क्रेन के जरिए, जरूर ध्वस्त किया गया है। मस्जिद के आसपास मिट्टी-मलबे के ढेर लगे हैं।
यह दिल्ली उच्च न्यायालय का 12 नवंबर, 2025 का आदेश था और तीन माह की अवधि में अतिक्रमण ढहाए जाने थे। तुर्कमान गेट मुस्लिम-बहुल, संकरा, घनी आबादी वाला इलाका है, लिहाजा रात के वक्त ऑपरेशन करने का फैसला लिया गया। इलाके के दुकानदारों, ठेले-पटरीवालों से बातचीत कर पुलिस ने उन्हें सचेत और आगाह कर दिया था। बुनियादी मुद्दा अतिक्रमण और मजहब के बीच ऊंची दीवारें खड़ी हैं। वक्फ के खोखले, अवैध, दस्तावेजहीन दावे ‘आग में घी’ का काम करते हैं। जब अफवाहें फैलाई जा रही थीं और भीड़ सडक़ पर उतर आई थी, तब सपा के रामपुर सांसद मोहिबुल्ला नदवी उस इलाके में क्या कर रहे थे? क्या उन्होंने भी भीड़ को उकसाने का संबोधन दिया था? पुलिस उनसे भी सवाल-जवाब करेगी। बेशक आरोपितों और संदिग्धों की धरपकड़ की गई है, फर्जी वीडियो जारी करने वालों की भी पहचान की जा रही है, लेकिन चिंता यह है कि कट्टरपंथ और जेहादी मानसिकता को कैसे समझाया जाए? आधी रात में लगभग दंगे के हालात बन गए थे। पथराव से अद्र्धसैन्य बल और पुलिस के जवान घायल हुए हैं। वे अस्पताल में उपचाराधीन हैं। पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े। हकीकत यह थी और आज भी है कि प्राचीन मस्जिद को उंगली तक नहीं लगाई गई। वहां से जामा मस्जिद तक के बीच करीब 10-12 छोटी मस्जिदें हैं, उन्हें भी खरोंच तक नहीं आई है। दरअसल राजधानी दिल्ली और देश में अवैध कब्जे और अतिक्रमण शाश्वत हो गए हैं। वे एक विकराल समस्या के तौर पर सामने हैं। भारत में 4 लाख से अधिक मस्जिदें हैं। उनसे अधिक करीब 8 लाख मस्जिदें इंडोनेशिया में ही हैं। यदि देश धर्मनिरपेक्ष न होता, तो क्या इतनी मस्जिदें देश में संभव थीं? वक्फ की बात करें, तो दिल्ली में ही उसकी 1047 संपत्तियां हैं, जिन पर विवाद नहीं है, लेकिन वक्फ राष्ट्रपति भवन परिसर, नए संसद भवन की जमीन, आईजीआई हवाई अड्डे, वायुसेना की जमीन, सीजीओ कॉम्प्लैक्स आदि की जमीन पर भी दावे ठोंकता रहा है। इसका क्या औचित्य है? सेना और रेलवे की सैंकड़ों एकड़ जमीनों पर अवैध कब्जे हैं, अतिक्रमण किए गए हैं। क्या अदालत, सरकार या पुलिस उन्हें खाली करवा सकते हैं? फिलहाल हम ‘न’ में जवाब देने को विवश हैं।














