आज का समय फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम का है। हर व्यक्ति बोल रहा है, लिख रहा है, दिख रहा है। प्रतिभा को मंच मिल रहा है, अभिव्यक्ति को विस्तार मिल रहा है। लेकिन इसी शोर के बीच एक तबका ऐसा है, जो आज भी चुप है-या यूं कहें कि चुप करा दिया गया है।
मैं उन स्त्रियों की बात कर रही हूं, जिनका पूरा जीवन केवल नर्म, गोल और गर्मा-गर्म रोटियां बनाते-बनाते ठंडा पड़ गया। 40 साल पहले हालात अलग थे, तब विकल्प नहीं थे। लेकिन आज भी वही जीवन जीना, वही तर्क देना, यह मजबूरी नहीं, आदत बन चुकी है। स्पष्ट कर दूं-रोटी बनाना कोई अपराध नहीं, अपराध यह है कि आप खुद को केवल रोटी बनाने की मशीन में बदल दें। ‘रोटी बनाना’ और ‘रोटी भी बनाना’, इन दोनों में वही अंतर है जो जिंदा रहने और जीने में होता है।

कटु सत्य यह है कि रोटी को एकदम गोल बनाने की जिद में आपने अपने व्यक्तित्व की सारी धार कुंद कर दी। दूसरों की थाली गर्म रखने में आप खुद ठंडी पड़ गईं और यह कोई त्याग नहीं, यह आत्म-उपेक्षा है। आप सबको उतनी ही गर्म रोटी खिलाइए, जितनी आप स्वयं भी उनके साथ बैठकर खा सकें। वरना याद रखिए, जो औरत खुद नहीं खाती, उसे कोई खिलाने नहीं आता। आपने अपनी पूरी ऊर्जा फर्श चमकाने, रसोई संभालने और चूल्हे में झोंक दी। अब जब खुद को पीछे छूटा पाती हैं, तो अपनी कुंठा नई पीढ़ी, कामकाजी महिलाओं या बहुओं पर थोप देती हैं। यह असंतोष का समाधान नहीं, सिर्फ उसका बदसूरत रूप है। अब दूसरों से जलना बंद कीजिए। सच तो यह है कि जलन उनकी नहीं, अपनी अधूरी संभावनाओं की है। ठहरिए और खुद से पूछिए-

क्या मैं आज वही हूं, जो मैं हो सकती थी?
अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो दोष दुनिया को नहीं, अपनी प्राथमिकताओं को दीजिए। जिन कारणों ने आपको रोका, उन्हें रोने की सूची से हटाकर जीवन की ‘बी-लिस्ट’ में डाल दीजिए।
कड़वा सच यह है कि दुनिया आपको आपके त्याग से नहीं, आपकी उपलब्धियों से पहचानती है। आपने कितना सहा, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। यहां तक कि परिवार को भी नहीं। बच्चे बड़े होते ही व्यस्त हो जाते हैं और पति की व्यस्तता तो वर्षों पुराना बहाना है।अक्सर देखा जाता है कि रोटी ठंडी हो रही हो और आप आवाज दें, तो जवाब मिलता है-‘आपको तो खाने की ही पड़ी है।’ सोचिए, जिस खाने के लिए आपने अपने सपने फ्रीजर में रख दिए, उसकी कीमत किसी की नजर में क्या है।
इसलिए अब वक्त है कि ‘रोटी ही बनाना’ को ‘रोटी भी बनाना’ में बदला जाए।

जीवन कोई गैस सिलैंडर नहीं है, जो जब चाहे बदल लिया जाए। जो करना है, अभी कीजिए। क्योंकि भविष्य में न आपका बेटा अपनी पत्नी को सिर्फ रोटी बनाने देगा और न आपकी बेटी खुद को चूल्हे तक सीमित करेगी। तब उन्हें कोसने से अच्छा है कि आज खुद को बदला जाए।
खाना बनाइए, घर संभालिए लेकिन इसके बाद खुद को भी समय दीजिए। कुछ रचिए, कुछ सीखिए। जब आप खुद को गंभीरता से लेंगी, तब परिवार भी आपको हल्के में लेना बंद कर देगा। और हां! जिस दिन आप रसोई के समय सबके पीछे भागना बंद करेंगी, उसी दिन सब समय पर खाने आने लगेंगे। सम्मान मांगना नहीं पड़ता, सीमाएं तय करनी पड़ती हैं। यह लेख घर-परिवार छोडऩे की वकालत नहीं करता। यह सिर्फ इतना कहता है कि घर बचाने के चक्कर में खुद को मत खोइए। किसी भूली हुई हॉबी को फिर से उठाइए-लिखिए, पढि़ए, सीखिए, कमाइए या बस खुद के लिए जिएं। शुरुआत में तालियां नहीं मिलेंगी लेकिन याद रखिए, जो औरत खुद के लिए खड़ी हो जाती है, उसे गिराना आसान नहीं होता।और अंत में-
जीवन जीना कोई मजबूरी नहीं, 
यह एक कला है, एक तैयारी है।
खुद को खुश रखना कोई स्वार्थ नहीं,
यह आपकी सबसे पहली जिम्मेदारी है।-प्रज्ञा पांडेय ‘मनु’

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