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चंडीगढ़: आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) ने महिलाओं के निजी पलों को कैमरे में कैद करने के एक मामले में दोषी और सेवा से बर्खास्त किए गए पूर्व सेना जवान को जमानत देने का आदेश दिया है। एएफटी ने कहा कि सैन्य अधिकारियों द्वारा सजा की पुष्टि में हो रही देरी के कारण अपीलकर्ता को उसके वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह मामला पश्चिमी कमान अस्पताल, चंडीगढ़ का है। जहां पूर्व हवलदार मोरे संदीप सदाशिव पर महिलाओं के शौचालय में चोरी-छिपे मोबाइल से वीडियो और तस्वीरें बनाने का आरोप है। संदीप फिलहाल 67 इंजीनियर रेजीमेंट के क्वार्टर गार्ड में सैन्य हिरासत में था।

एएफटी के न्यायिक सदस्य जस्टिस सुधीर मित्तल और प्रशासनिक सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने सुनवाई के दौरान कहा कि अपीलकर्ता छह महीने से अधिक समय से हिरासत में है, जबकि अब तक उसकी सजा की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में वह अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ अपील दाखिल नहीं कर पा रहा है। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि सजा की पुष्टि में देरी कर किसी व्यक्ति का वैधानिक अधिकार छीना नहीं जा सकता। न्यायाधिकरण ने आदेश दिया कि सजा की पुष्टि की प्रक्रिया पूरी होने तक अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा किया जाए। इसके बाद वह अपील दाखिल कर सकेगा और सजा के निलंबन की मांग भी कर सकेगा। सजा निलंबन की अर्जी पर फैसला होने तक जमानत प्रभावी रहेगी। इसके लिए जमानती मुचलके भरने के निर्देश दिए गए हैं।

क्या है मामला
मामले के अनुसार, 27 मई 2025 को सैन्य अधिकारियों ने संदीप को चार्जशीट जारी की थी। उस पर आर्मी एक्ट की धारा 69 के तहत कोर्ट मार्शल और भारतीय दंड संहिता की धारा 354(सी) के तहत तांक-झांक का आरोप लगाया गया था। आरोप है कि उसने 21 से 25 जुलाई 2022 के बीच कमांड हॉस्पिटल के शौचालय में महिलाओं की 28 तस्वीरें और वीडियो मोबाइल फोन से रिकॉर्ड किए। संदीप ने वर्ष 2020 में सेना में भर्ती ली थी और 30 सितंबर 2024 को उसे सेवा से हटा दिया गया। 14 जून 2025 को जिला कोर्ट मार्शल का गठन हुआ, जिसने 3 नवंबर 2025 को उसे एक वर्ष की कैद, रैंक में कटौती और सेवा से बर्खास्तगी की सजा सुनाई।

सरकारी वकील ने भी मानी ये बात
अपीलकर्ता के वकील राजेश सहगल ने दलील दी कि सजा की पुष्टि अब तक नहीं हुई है और इसकी पुष्टि और प्रचार (प्रमुल्गेशन) में काफी समय लग सकता है, जबकि सजा का लगभग आधा समय पहले ही पूरा हो चुका है। उन्होंने आर्मी एक्ट की धारा 153 का हवाला देते हुए कहा कि सजा की पुष्टि के बिना वह वैध नहीं मानी जाती, इसके बावजूद अपीलकर्ता छह महीने से अधिक समय से हिरासत में है। उन्होंने यह भी बताया कि सजा की पुष्टि न होने के कारण अपील दाखिल नहीं की गई। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने भी स्वीकार किया कि सजा की पुष्टि अभी नहीं हुई है और कहा कि इसे शीघ्र पूरा किया जाएगा। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद AFT ने बर्खास्त सैनिक को जमानत पर रिहा करने के आदेश जारी किए।

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