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ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राजनीति में उठे नए कदम ने न केवल यूरोप बल्कि पूरे नाटो गठबंधन को असहज स्थिति में डाल दिया है. रिपब्लिकन सांसद रैंडी फाइन की ओर से पेश किया गया ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट अब महज एक घरेलू अमेरिकी बिल नहीं रहा, बल्कि यह अमेरिका और उसके सबसे करीबी सैन्य गठबंधन नाटो के बीच टकराव की नींव बन गया है.

इस बिल का मकसद साफ है- अमेरिकी प्रशासन को यह कानूनी रास्ता देना कि वह ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल कर सके और भविष्य में उसे एक अमेरिकी राज्य बना सके. डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कई बार कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है और वहां केवल सैन्य मौजूदगी पर्याप्त नहीं है, बल्कि मालिकाना हक जरूरी है.

ग्रीनलैंड के मसले पर फंस गया NATO

ग्रीनलैंड फिलहाल डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और डेनमार्क नाटो का सदस्य है. ऐसे में अगर अमेरिका बलपूर्वक या दबाव के जरिए ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश करता है, तो यह NATO
के भीतर अभूतपूर्व संकट पैदा कर सकता है. इसी संदर्भ में यूरोपीय संघ के रक्षा और अंतरिक्ष आयुक्त एंड्रियस कुबिलियस का बयान बेहद अहम माना जा रहा है. उन्होंने साफ कहा कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई की, तो यह नाटो का अंत साबित हो सकता है.

डेनमार्क की मदद के लिए साथ आएंगे यूरोपीय देश?

कुबिलियस ने चेतावनी दी कि ऐसा कदम न केवल यूरोप-अमेरिका संबंधों को गहरी चोट पहुंचाएगा, बल्कि आम लोगों के बीच भी अमेरिका के प्रति भारी नकारात्मक भावना पैदा करेगा. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यूरोपीय संघ की संधि का अनुच्छेद 42.7 सदस्य देशों को बाध्य करता है कि अगर किसी सदस्य पर सैन्य हमला होता है, तो अन्य देश उसकी मदद करें. अगर डेनमार्क ने मदद मांगी, तो यूरोप को आगे आना ही होगा.

क्या नाटो अमेरिका के सामने टिक पाएगा?

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. कागजों में नाटो और यूरोपीय संघ भले ही ग्रीनलैंड की सुरक्षा की बात कर रहे हों, लेकिन हकीकत में क्या वे अमेरिका जैसी सैन्य महाशक्ति के सामने खड़े हो पाएंगे? अमेरिका नाटो का सबसे बड़ा सैन्य और आर्थिक स्तंभ रहा है. ऐसे में उसी अमेरिका के खिलाफ खड़ा होना नाटो के लिए सबसे कठिन परीक्षा होगी. कुबिलियस ने यह जरूर कहा कि यूरोपीय संघ जरूरत पड़ने पर ग्रीनलैंड को अतिरिक्त सुरक्षा दे सकता है- चाहे वह सैनिक हों, युद्धपोत हों या ड्रोन-रोधी सिस्टम. पर मुद्दा ये है कि अमेरिका के बिना यूरोप की स्वतंत्र रक्षा क्षमता एक बहुत बड़ी चुनौती होगी.

क्यों ग्रीनलैंड के पीछे पड़े हैं डोनाल्ड ट्रंप?

रैंडी फाइन और ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं. उनके मुताबिक अगर अमेरिका ने अभी कदम नहीं उठाया, तो भविष्य में ग्रीनलैंड अमेरिका विरोधी ताकतों के प्रभाव में जा सकता है. व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने भी कहा कि ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका और यूरोप, दोनों की सुरक्षा के लिए बेहद अहम मानते हैं.

क्या चाहता है ग्रीनलैंड?

इस पूरे घटनाक्रम में ग्रीनलैंड की अपनी आवाज भी बेहद साफ है. ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री कार्यालय ने साफ कहा है कि अमेरिका की ओर से ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है. बयान में दो टूक कहा गया कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है, नाटो का सदस्य है और उसकी रक्षा नाटो के जरिए ही सुनिश्चित की जानी चाहिए. जहां एक ओर नाटो ग्रीनलैंड को बचाने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि अमेरिका के सामने खड़े होने की उसकी वास्तविक क्षमता सीमित है. यह टकराव सिर्फ जमीन के एक टुकड़े का नहीं, बल्कि ग्लोबल पावर बैलेंस और गठबंधनों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाने वाला है.

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