सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का घनिष्ठ मित्रतापूर्ण संबंधों से प्रतिद्वंद्वी बनने का परिवर्तन नई दिल्ली के लिए सतर्कता की मांग करता है। भारत-कनाडा संबंधों में बरती गई लापरवाही या 2024 में डोनाल्ड ट्रम्प के अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद से भारत-अमरीका के बीच औपचारिकता की पूर्ण कमी को खाड़ी सहयोग परिषद (जी.सी.सी.) के सदस्य देशों में नहीं दोहराया जाना चाहिए। पिछले 10 वर्षों में भारत की कूटनीति के लिए संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ संबंधों का विस्तार एक शानदार सफलता रही है। लेकिन जैसा कि बंगलादेश ने पिछले साल दिखाया, विदेश नीति कभी स्थिर नहीं होती। पहले भारत इन नव-धनी देशों में बन रही विशाल, पैट्रोडॉलर-वित्त पोषित निर्माण परियोजनाओं, जैसे आवास से लेकर रिफाइनरियों तक, के लिए बड़ी संख्या में गैर-राजनीतिक और भरोसेमंद श्रम का स्रोत मात्र था। भारत अब एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, न कि मध्य स्तर का विकासशील देश।

खाड़ी देशों में तेजी से बदलती परिस्थितियों की भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। भारत में पहले समय की परिस्थितियां खाड़ी देशों की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थीं, सिवाय भारत की आयाओं, भारवाहकों, रसोइयों और चालकों (जिन्हें स्थानीय रूप से ए.बी.सी.डी. कहा जाता था) के लिए काम तलाशने के। संयुक्त अरब अमीरात में 45 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो अमरीका में रहने वाले मूल भारतीयों की संख्या के बाद दूसरे स्थान पर है। सऊदी अरब लगभग 28 लाख भारतीयों के साथ विश्व में तीसरे स्थान पर है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब मिलकर भारत में सबसे अधिक धन प्रेषण का स्रोत हैं। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे बड़ा योगदान जी.सी.सी. देशों का है। भारत का रणनीतिक पैट्रोलियम भंडार लगभग पूरी तरह से आबू धाबी से प्राप्त कच्चे तेल से बना है।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के संबंधों में आई इस गंभीर गिरावट का तात्कालिक कारण यमन को लेकर दोनों देशों का अलग-अलग दृष्टिकोण है। मार्च, 2015 से दोनों देशों ने सना में विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को बहाल करने के लिए मिलकर लड़ाई लड़ी, जिसे ईरान के समर्थन से हौथियों ने उखाड़ फैंका था। चार साल बाद, जब संयुक्त अरब अमीरात की मौतें बढऩे लगीं, तो उसने यमन में अपनी सैन्य उपस्थिति कम करनी शुरू कर दी। दूसरी ओर, सऊदी अरब को उतने लोगों का नुकसान नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने हौथियों पर हमले हवाई बमबारी तक ही सीमित रखे। सहानुभूति जताते हुए, यू.ए.ई. के पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर स्थापित खलीफा फाऊंडेशन चैरिटी ने घायल यमनी लोगों को इलाज के लिए भारतीय अस्पतालों में विमानों से भेजा।

सऊदी अरब के नेतृत्व वाले ‘कोएलिशन ऑफ द विलिंग’ के विघटन के बाद, संयुक्त अरब अमीरात ने अदन में एक अलगाववादी समूह-दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद (एस.टी.सी.). को अपना प्रतिनिधि बना लिया। सऊदी अरब एक एकीकृत यमन चाहता है, जो उसकी कानूनी सरकार के अधीन हो।पिछले सप्ताह, राष्ट्रीय राजधानी में स्थित यू.ए.ई. समॢथत एस.टी.सी. ने व्यावहारिक रूप से उस पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया था, जो पूर्व में दक्षिण यमन कहलाता था। सऊदी अरब के समर्थन से सना से किए गए हमलों के बाद अदन स्थित इस क्षेत्र का मुख्य हवाई अड्डा बंद कर दिया गया था।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सूडान को लेकर भी आमने-सामने हैं। दक्षिण सूडान गणराज्य में संयुक्त राष्ट्र मिशन (यू.एन.एम.आई.एस.एस.) में 2306 भारतीय सैनिक तैनात हैं। सूडान और दक्षिण सूडान के बीच विवादित क्षेत्र अबेई के लिए संयुक्त राष्ट्र अंतरिम सुरक्षा बल (यू.एन.आई.एस.एफ.ए.) में 506 भारतीय शांति सैनिक भी हैं। यदि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अपने-अपने सहयोगियों को हथियारों की आपूर्ति और वित्तीय सहायता बढ़ाते हैं, तो उन्हें खतरा होगा। ओ.एन.जी.सी. विदेश लिमिटेड ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति के तहत अविभाजित सूडान के तेल उद्योग में 2.3 अरब डॉलर का निवेश किया था। यह निवेश अब दोनों सूडानों में फैला हुआ है और गृहयुद्ध से प्रभावित हुआ है।-के.पी. नायर 

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