भाजपा मुख्यालय में पार्टी महासचिव अरुण सिंह के नेतृत्व में एक टीम ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। जाहिर है कि कुछ विमर्श भी हुआ होगा। बाद में चीन की अंतरराष्ट्रीय विभाग की उपमंत्री सुन हैयान के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल आरएसएस मुख्यालय गया और सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबले से मुलाकात और बातचीत की। इन मुलाकातों को न तो ‘शिष्टाचार’ माना जा सकता है और न ही ‘कूटनीतिक’ करार दिया जा सकता है। बेशक सार्वजनिक तौर पर भाजपा-संघ सीपीसी, कमोबेश सोच और विचारधारा के स्तर पर, एक-दूसरे के विलोम रहे हैं। विरोधी भी रहे हैं। एक पूरा दौर था कि भारत के रक्षा मंत्री चीन को ‘दुश्मन नंबर एक’ करार देते रहे हैं। दरअसल चीन में तानाशाह किस्म का ‘एकाधिकार’ है, जबकि भारत पूरी तरह एक लोकतांत्रिक देश है। हमारे देश में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री 5-5 साल के लिए ही चुने जाते हैं। चीनी राष्ट्रपति जब तक चाहें, अपने पद पर काबिज रह सकते हैं। बेशक चीन ने हमारी 43,000 वर्ग किमी से अधिक जमीन पर कब्जा कर रखा है। इसमें से करीब 38,000 वर्ग किमी भू-भाग 1962 के युद्ध में चीन ने कब्जा लिया था और बाद में पाकिस्तान ने 5180 वर्ग किमी जमीन चीन को ‘समर्पित’ की थी। भारत और चीन के दरमियान बेहद गंभीर और आपत्तिजनक विवाद हैं। 2025 से पहले मानसरोवर यात्रा तक पर रोक लगी थी। जून, 2020 के लद्दाख की गलवान घाटी के उस सैन्य हमले को कभी भी भूला नहीं जा सकता, जिसमें भारत के 20 जांबाज सैनिक ‘शहीद’ हुए थे। यह दीगर है कि हमारे सैनिकों ने भी बाद में पलटवार किया था और चीन के 40-45 सैनिकों को मार डाला था, लेकिन चीन ने इस यथार्थ को आज तक स्वीकार नहीं किया। सही आंकड़ा भी सामने नहीं आ पाया, लेकिन भारतीय सैनिकों ने प्रतिशोध जरूर लिया था। ‘गलवान त्रासदी’ के बाद संगठन के स्तर पर ये पहली बार मुलाकातें हुई हैं। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल विभिन्न शिखर सम्मेलनों में भाग लेने चीन का प्रवास कर चुके हैं। उन्होंने अपने समकक्षों के साथ बैठकें भी की हैं।

संगठन के स्तर पर भाजपा-संघ और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतागण एक-दूसरे देश का दौरा करते रहे हैं। कमोबेश भाजपा के प्रतिनिधिमंडल केंद्र में वाजपेयी सरकार के कार्यकाल से ही चीन जाते रहे हैं। बेशक दोनों राजनीतिक दलों की सोच और कार्यप्रणाली में गहरे विरोधाभास हैं, लेकिन आपसी संचार और संवाद की गुंजाइश बरकरार रखी गई है। ये मुलाकातें भी उसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। इनसे किसी बड़े परिवर्तन के आसार नहीं हैं। दोनों देशों के बीच विवादों पर भारत सरकार के प्रतिनिधि ही बात करेंगे। यह उनका ही जनादेश है। भाजपा-संघ इस संदर्भ में अनधिकार चेष्टा नहीं कर सकते थे। भारत-चीन में बेहद महत्वपूर्ण यह है कि अक्तूबर, 2024 में ‘ब्रिक्स सम्मेलन’ के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संवाद से संबंधों में जो बर्फ पिघली थी, उससे दोनों देश करीब आए हैं। लद्दाख में तैनात सेनाएं पीछे हटी हैं, सीमा-विवाद पर भी बातचीत हुई है और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में दोनों को एक-दूसरे की जरूरतों का एहसास हुआ है। हमें चीन से खाद, दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों, रसायनों और कई अन्य वस्तुओं की जरूरत है, जिनका आश्वासन चीन ने दिया है। कांग्रेस को इन मुलाकातों पर कपड़े नहीं फाडऩे चाहिए। उसके मीडिया और विदेश मामलों के प्रकोष्ठ ही एक-दूसरे के खिलाफ हैं। चीनी प्रतिनिधिमंडल कांग्रेस के विदेश प्रकोष्ठ के प्रभारी एवं पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद से भी मिला है। भाजपा-संघ ने चीनी प्रतिनिधिमंडल के साथ किसी गोपनीय समझौते पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए। फिर इन मुलाकातों को ‘देशद्रोह’ क्यों करार दिया जा रहा है? बेशक चीन की तुलना में हमारा व्यापार घाटा बहुत है। उसे कम किया जा सकता है, लेकिन जिन उत्पादों को लेकर चीन हमसे बहुत आगे है और वे हमारी जरूरत की वस्तुएं हैं, तो क्या चीन से नहीं लेनी चाहिए? क्या भारत सरकार की ऐसी कोई स्थापित नीति है? विवादों के बावजूद रिश्तों में नरमी और समन्वय संभव है।

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31