बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक राज्यसभा में जाने का निर्णय क्यों किया है? वह 105 दिन पहले ही 10वीं बार मुख्यमंत्री बने थे। वह 19 साल 4 माह इस पद पर रहे और अब भी 15 अप्रैल तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। नया जनादेश भाजपा-जद (यू) और एनडीए को मिला था। विपक्षी राजद को करारी पराजय देकर सत्ता बरकरार रखी गई थी। मुख्यमंत्री की जिस कुर्सी के लिए नीतीश ने ‘पलटूराम’ जैसे विशेषण को भी झेल लिया था, उस कुर्सी को अचानक छोडऩे की इच्छा क्यों जताई है? इन सवालों के जवाब तो नीतीश या भाजपा नेतृत्व ही दे सकते हैं, लेकिन यह विस्फोटक राजनीतिक खबर है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे ‘राजनीतिक अपहरण’ करार दिया है। अब बिहार का नया मुख्यमंत्री कौन होगा? यह एक सामान्य सवाल है। निश्चित है कि भाजपा का बीते 20 सालों से संचित सपना साकार होने जा रहा है। नीतीश के बेहद करीबी नेता एवं पूर्व सांसद केसी त्यागी तक ने पुष्टि की है कि मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। बहरहाल बिहार में चुनाव के दौरान भी नीतीश उम्रदराज और अस्वस्थ थे। विपक्ष के आरोपों को छोडि़ए, लेकिन ऐसे कई क्षण सार्वजनिक हुए हैं, जब लगा कि नीतीश मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं। यदि जनादेश मिलने और मुख्यमंत्री बनने के 105 दिनों के बाद ही पद छोड़ कर राज्यसभा में जाने की इच्छा व्यक्त करनी थी, तो नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की शपथ ही न लेते। सत्ता के नए पांच साल नीतीश को मिले थे। बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद वह आराम से सरकार चला सकते थे। जनता से जिन वायदों के आधार पर जनादेश हासिल किया था, उन्हें पूरा करने के प्रयास कर सकते थे। यदि अब राज्यसभा में जाकर उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया जाता है, तो उनके पास मंत्रालय, सरकार का नीतिगत एजेंडा, मंत्रालय के रोजमर्रा के दायित्व भी होंगे। यदि नीतीश मुख्यमंत्री बने रहने में असहज, असमर्थ थे, तो वही स्थितियां केंद्रीय मंत्री बनने पर भी होंगी। फिर उन्होंने यह फैसला क्यों किया? अथवा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें बाध्य किया है?

सवाल यह भी है कि अब केंद्रीय मंत्री बनकर नीतीश क्या साबित करेंगे? वह केंद्र सरकार में कृषि, रेल, सडक़ परिवहन मंत्री रह चुके हैं। नीतीश 6 बार सांसद चुने गए और 6 साल तक केंद्रीय मंत्री रहे। प्रधानमंत्री मोदी उन्हें गृह, वित्त, विदेश, रक्षा जैसे अहम मंत्रालय तो दे नहीं सकते, क्योंकि वहां उनके विश्वास-पात्र मंत्री विराजमान हैं। क्या प्रधानमंत्री नीतीश के लिए उपप्रधानमंत्री के पद का सृजन कर सकते हैं? हमें तो इसके आसार भी नगण्य लगते हैं। फिर नीतीश ने जनादेश को धोखा क्यों दिया है? मझधार में क्यों छोड़ा है? जद-यू के उन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को रोने-बिलखने और सडक़ पर प्रदर्शन करने को क्यों छोड़ दिया है, जो अपने शीर्षस्थ नेता के बिना नहीं रह सकते, जो छला-ठगा महसूस कर रहे हैं? अभी तक माना जाता रहा है कि नीतीश पर कोई दबाव नहीं डाल सकता और न ही कोई उन्हें बाध्य कर सकता है, लेकिन यह निर्णय उनका अपना नहीं लगता, बेशक उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट लिखी है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी या गृहमंत्री अमित शाह के स्तर पर ही बाध्य किया गया लगता है कि अब आप दिल्ली चले आइए और राष्ट्रीय राजनीति में योगदान दीजिए। मुख्यमंत्री पद भाजपा को मिलना चाहिए। हमारा सवाल यह भी है कि यदि नीतीश केंद्र में सक्षम और सक्रिय रहेंगे, तो मुख्यमंत्री के तौर पर क्या दिक्कत थी? कुछ भी व्याख्या कर लें, लेकिन बिहार का मौजूदा जनादेश नीतीश के चेहरे और विजन पर ही दिया गया था। भाजपा ने 89 और जद-यू ने 85 सीटें जीतीं। नीतीश ने जिस तरह बेदाग, निर्विवाद, समावेशी, समाजवादी न्याय, अति पिछड़ों और महिलाओं की राजनीति 45 लंबे सालों तक की है, वह अद्वितीय रही है। उनके करीब 20 साल के मुख्यमंत्री काल में बिहार बदला है, लेकिन आज भी वह सबसे गरीब राज्य है और उस पर 3.61 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है, लिहाजा भाजपा मुख्यमंत्री के सामने गंभीर चुनौतियां होंगी। चुनाव में जो वादे किए गए थे, उन्हें भी निभाना होगा। लगता है भाजपा अब कुछ बदलाव करना चाहेगी, ताकि जनता का विश्वास कायम रखा जा सके। वैसे बिहार को केंद्र से काफी मदद पहले भी मिली है और अब भी मिलने की संभावनाएं हैं। बहरहाल, बिहार में कुछ बदलाव देखने को मिलेगा।

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