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मुंबई : महाराष्ट्र निकाय चुनाव और बीएमसी चुनाव के रिजल्ट के बाद बीजेपी जश्न में डूबी। मुंबई में देवेंद्र फडणवीस से लेकर दिल्ली में नरेंद्र मोदी तक बीजेपी के नेता एक-दूसरे को बधाई देते नजर आए। ठाकरे परिवार ने 25 साल बाद बीएमसी गंवा दिया, जिसे बाला साहेब ठाकरे ने नेटवर्किंग की रणनीति से बनाया था। राज और उद्धव ठाकरे का साथ आना भी कामयाब नहीं रहा। पुणे और पिंपरी चिंचवड़ में शरद पवार-अजित पवार को करारी हार मिली। हार-जीत के इस दौर में कई ऐसे राजनीतिक उत्तराधिकारी रहे, जिन्हें कॉरपोरेटर बनने का सौभाग्य नहीं मिला। ठाकरे और पवार ब्रांड बीजेपी की आंधी में नहीं चमके। लंबे समय के बाद यह नैरेटिव सामने आया कि परिवार का नाम अब जीत की गारंटी नहीं है।

बाल ठाकरे ने नेटवर्किंग से खड़ी की शिवसेना

शिवसेना की बीएमसी पर लंबे समय तक कब्जे में बाल ठाकरे की रणनीति के साथ बीजेपी का लंबा सहयोग रहा। बाल ठाकरे ने 70 के दशक से ही पूरे मुंबई में शिवसेना की शाखाएं खोलनी शुरू कीं। शिवसैनिकों को मराठी मानूस की छोटी-छोटी जरूरतों में शामिल होने का मौका भी दिया। 1989 के राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र, मराठी में हिदुत्व को जोड़ दिया। इससे उनकी मराठी के अलावा अन्य राज्यों से आए हिंदू वोटरों में पकड़ मजबूत होती चली गई। शिवसेना में गैर मराठियों को भी बड़ी भूमिका दी गई। साथ ही, अन्य हिंदी राज्यों में मजबूत हो रही बीजेपी से हाथ मिलाया और महाराष्ट्र में शिवसेना की भूमिका बड़े भाई की रखी।

बीजेपी ने 2019 में ही बड़ी छलांग लगाई थी

मुंबई में बाल ठाकरे ने वोटिंग पैटर्न को अपनी रणनीति से शिवसेना के पक्ष में किया। मुंबई शहर में हमेशा से औसतन 50 फीसदी वोटिंग होती रही है। जिस पार्टी के वोटर ज्यादा मतदान करते हैं, जीत उसी की होती है। बाल ठाकरे ने वोटरों को बूथ तक लाने के लिए शिवसैनिकों को शाखाओं के हिसाब से जिम्मेदारी दी। फिर 1997 में पहली बार बीएमसी फतह किया और 25 साल तक इसी पैटर्न पर लगातार जीतते रहे। 2019 में बीजेपी और शिवसेना पहली बार अलग हुई। फिर भारतीय जनता पार्टी ने भी आरएसएस और अन्य अनुषांगिक संगठनों के जरिये अपने वोटरों को बूथ तक आने के लिए मोटिवेट किया। बीजेपी ने भी तब बड़ी छलांग लगाई और बीएमसी में दूसरे नंबर की पार्टी बनी।

संवाद घटा, पावर सेंटर में रह गए उद्धव ठाकरे

25 साल तक सत्ता में रहने के दौरान उद्धव ठाकरे ने बाल ठाकरे की तरह मातोश्री को पावर सेंटर तो बना दिया, मगर वह पिता के पैटर्न को भूल गए। शाखाओं में स्थानीय नेताओं का दबदबा बना। शिवसैनिकों ने मुंबईकरों की मदद करना छोड़ दिया। दूसरी ओर, तरक्की कर रही मुंबई में बीएमसी के जुड़े काम की हालत बदतर होती गई। पार्टी नेतृत्व से जनता का संवाद कम हो गया। उद्धव ठाकरे के सीएम बनकर पावर सेंटर की ताकत को भी कम किया। बीजेपी से तलाक के बाद वैचारिक बदलाव से भी ठाकरे ब्रांड की चिर परिचित छवि को धक्का लगा। 16 जनवरी के आए नतीजों में उद्धव ठाकरे को मुस्लिम वोट भी मिले, मगर बीजेपी हिंदू वोट अपने साथ ज्यादा ले गई। मुंबई में बीजेपी को 21 फीसदी और यूबीटी को 13 फीसदी वोट मिले हैं। शिंदे की शिवसेना ने 4 प्रतिशत वोट हासिल किए। मनसे के राज ठाकरे 1.3 प्रतिशत पर सिमट गए। इस तरह ठाकरे ब्रांड को 14.6 फीसदी वोट ही मिले।

बीजेपी ने पवार फैमिली को कैसे रोका?

बीजेपी ने नगर परिषद चुनावों में ही महाराष्ट्र के दूसरे ब्रांड पवार की पावर कम कर दी थी। पश्चिम महाराष्ट्र में मजबूत शरद पवार ऐसे क्षत्रप रहे, जो महाराष्ट्र की राजनीति और सरकारों को इशारों पर चलाते रहे। कहा जाता है कि उद्धव ठाकरे को बीजेपी से अलग करने वाले शरद पवार ही थे। पवार फैमिली से अभी भी कई राजनेता सांसद, विधायक और मंत्री पद पर हैं। बीजेपी ने शरद पवार की राजनीति को उनके दांव से ही चुनौती दी। पहले अजित पवार बागी बने, फिर पवार फैमिली की ताकत मानी जाने वाली सहकारी संस्थाओं में मनमानी पर अंकुश लगाया। इन संस्थाओं से जुड़ी सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक के नियम-कानून के दायरे में लाकर पैसों के खेल बंद कर दिए। अब इन बैंकों को खर्च और कर्ज का हिसाब रखना पड़ता है। घाटे में चलने वाली सहकारी समितियां और सहकारी बैंक अब चेयरमैन के इशारे पर बेलगाम बजट नहीं बना सकती हैं।

किसान और महिला बीजेपी के पक्ष में आए

दूसरी ओर, बीजेपी ने सरकार बनते ही पश्चिम महाराष्ट्र के शहरों पुणे, पिंपरी चिंचवड़ समेत ग्रामीण इलाकों में किसानों और महिलाओं के लिए पैसे देने वाली स्कीम शुरू की। इस तरह उन्होंने गन्ना बेल्ट के किसानों और शुगर मिल पॉलिटिक्स में एंट्री कर ली। अब नतीजा सामने है। निकाय चुनाव में अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से समझौते के बाद भी बीजेपी को चित्त नहीं कर सके।

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