आखिर अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के मंसूबे क्या हैं? वह दुनिया के सबसे प्राचीन लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति हैं अथवा विस्तारवादी प्रवृत्ति के साम्राज्यवादी शासक हैं या अब ‘वैश्विक डॉन’ बनने की मंशा है? राष्ट्रपति ट्रंप हररोज किसी न किसी देश पर कब्जा करने या हमला करने की धमकी देते हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को अमरीकी सैनिकों के जरिए अगवा करने के बाद वह क्यूबा, कोलंबिया सरीखे छोटे देशों के राष्ट्रपतियों को ऐसी धमकियां दे रहे हैं। ‘वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम’ जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच से राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ-साफ कहा है कि वह ग्रीनलैंड पर कब्जा करेंगे, क्योंकि यह क्षेत्र अमरीका का है और अमरीकी सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। रूस, चीन और यूरोप उन्हें रोक नहीं सकते। हालांकि ट्रंप ने ग्रीनलैंड में सेना का इस्तेमाल नहीं करने की बात कही है। उन्होंने ग्रीनलैंड को ‘बर्फ का एक टुकड़ा’ भी करार दिया है। यह एक विशालकाय, मायावी, ताकतवर दानव और बौने लिलिपुटियन के द्वन्द्व की कहानी सरीखा लगता है! राष्ट्रपति ट्रंप की लगातार धमकियों के कारण ही अमरीका और यूरोप पहली बार आमने-सामने तने हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इसी वैश्विक मंच से, ट्रंप का नाम लिए बिना ही, कहा कि यूरोप किसी की ‘दादागीरी’ के सामने नहीं झुकेगा। यूरोप कोई समझौता भी नहीं करेगा। यूरोप और नाटो मिल कर ग्रीनलैंड की रक्षा करेंगे। डेनमार्क, बेल्जियम, कनाडा सरीखे देशों के प्रधानमंत्रियों ने राष्ट्रपति ट्रंप को आगाह किया है कि वह ग्रीनलैंड पर न तो ब्लैकमेलिंग करें और न ही ‘रेडलाइन’ को लांघने की कोशिश करें। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने ‘युद्ध के हालात’ की घोषणा कर दी है, सेना का अलर्ट कर दिया है और लोगों को अपने घरों में पांच दिन का राशन रखने की अपील की है। यह स्वायत्त देश मात्र 56-57,000 की आबादी का है, लेकिन विश्व में जो 30 दुर्लभ अर्थ खनिज माने जाते हैं, उनमें से 25 खनिजों के भंडार ग्रीनलैंड में हैं। तेल और गैस के भी पर्याप्त भंडार हैं। दरअसल इस देश के जरिए एक समुद्री रूट खुलता है, जिसके जरिए व्यापार सहज और कम समय में संभव हो सकता है। ‘वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम’ के मंच से ही राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस और यूक्रेन के राष्ट्रपतियों-पुतिन और जेलेंस्की-को ‘बेवकूफ’ कहा। यह कैसी भाषा और मर्यादा है? ट्रंप ने किसी अन्य राष्ट्रपति को ‘बीमार आदमी’ करार दिया है।

यह दीगर और मजबूरी है कि ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी के प्रति सम्मान जताया है। उन्हें ‘शानदार इनसान’ और ‘मेरे दोस्त’ कहा है और यह भविष्यवाणी की है कि भारत के साथ अच्छी डील होने वाली है। राष्ट्रपति ट्रंप की मजबूरी यह है कि भारत ने अक्तूबर, 2025 में अमरीका से आने वाली ‘पीली मटर’ पर 30 फीसदी का टैरिफ थोप दिया था। नतीजा यह हुआ कि अमरीकी सांसदों को ट्रंप को पत्र लिखने पड़े कि भारत से इस टैरिफ को वापस लेने का आग्रह किया जाए। राष्ट्रपति ट्रंप को अपने विशेष दूत के तौर पर स्टीव डेंस को भारत भेजना पड़ा। डेंस ने दिल्ली में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात और बातचीत की है, लेकिन टैरिफ यथावत है। बहरहाल राष्ट्रपति ट्रंपके मंसूबे यहां तक पहुंच गए हैं कि उन्होंने ईरान को दुनिया के नक्शे से ही मिटा देने की धमकी दी है। पलटवार में ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि यदि खामेनेई की हत्या की कोशिश की गई, तो हम ट्रंप के हाथ काट देंगे। आखिर यह नौबत ही क्यों आई? सवाल है कि ट्रंप ने दुनिया भर में यह उबाल, गुस्सा, प्रतिशोध, अंतत: युद्ध के भाव पैदा क्यों कर दिए? क्या अमरीका अन्य देशों की संप्रभुता का सम्मान नहीं कर सकता? राष्ट्रपति ट्रंप को किसी एकांत में यह मंथन करना चाहिए कि वह ‘शांतिदूत’ नहीं, ‘युद्धखोर’ हैं। उन्हें नोबेल पुरस्कार का मुगालता नहीं पालना चाहिए। क्या उन्हें यह एहसास है कि अमरीका की ही 55 फीसदी जनता उनकी नीतियों, उनके फैसलों के खिलाफ है और सडक़ों पर भी है। राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल का अभी एक साल ही बीता है और सांसद उन्हें पद से हटाने की चेतावनियां दे रहे हैं। दरअसल वह लोकतांत्रिक नहीं, तानाशाही प्रवृत्ति के नेता हैं और विश्व अब यह स्वीकार नहीं करेगा। जो देश उनकी नीतियों पर नहीं चल रहे हैं, उन पर ट्रंप भारी टैरिफ ठोक रहे हैं। भारत पर उनका यह दबाव है कि वह रूस से तेल की खरीद न करे। भारत का मानना यह है कि राष्ट्रहित में जो भी देश सस्ते तेल की आपूर्ति करेगा, भारत उसी से तेल की खरीद करता रहेगा। हमें जब रूस से सस्ते तेल की आपूर्ति हो रही है, तो क्यों न हम उससे इसकी खरीद करें। बार-बार भारत स्पष्ट कर चुका है कि जो भी सस्ता तेल देगा, उसी से खरीद की जाएगी, यह भारत के लिए राष्ट्र हित का मामला है।

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