किसी भी देश के गणतंत्र का 77 वां गणतंत्र दिवस इस बात के लिए अत्यंत अहम रहता है कि लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों को किस तरह आत्मसात किया जा रहा है. देश में गण की आवाज में जनता के सुर किस तरह मिल रहे हैं और तंत्र इन संयुक्त सुरों पर जनहित में कैसे काम कर रहा है – यह बहुत ही पारदर्शिता के साथ देनंदिनी घटनाक्रमों में देखा जा सकता है. भारत की गणतांत्रिक व्यवस्था पिछले 77 सालों से वैसे तो सुचारू स्वरूप में चल रही है, लेकिन कई बार इस व्यवस्था में कभी-कभी सुराख भी नजर आते हैं – जो यह दर्शाते हैं कि एक परिपक्व लोकतंत्र होने के बावजूद उसके आधारों की कार्यप्रणाली में सामंजस्य व अन्य अभाव नजर आते हैं.
हमारा मध्य प्रदेश इस बार कुछ बिंदुओं पर राष्ट्रीय सुर्खियों में शामिल रहा है. देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर ने एक बड़ी आपदा झेली. यहां दूषित पेयजल की वजह से 28 लोग काल के गाल में समा गए. स्थानीय प्रशासन के तंत्र की ऐसी खामी नजर आई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. तंत्र की इस असफलता पर चहुंओर समीक्षा भी हो रही है. इसी समीक्षा के दौरान हमारी व्यवस्था में सुराख बताने वाला एक वाक्या उस समय सामने आया, जब इंदौर जैसे महानगर के लोकतांत्रिक प्रणाली से भारी बहुमत से चुने हुए महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने हाथ खड़े कर यह कह दिया कि मेरी कोई सुनता नहीं है ! यह एक गण का तंत्र पर सीधा आक्षेप रहा. गण की इस साफगोई की गणतंत्र दिवस की बेला में खूब चर्चा हुई. यह हमारी व्यवस्था का कृष्णपक्ष रहा. जब लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली में चुना हुआ मेयर तंत्र के सामने इतना असहाय है, तो फिर निरीह आम जनता की क्या बिसात ? फिर हम स्वराज, जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा – आदि शब्दों और वाक्यों का उपयोग क्या वास्तव में अंतर्मन से कर सकते हैं ? आखिर इन निर्दोष लोगों की स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं कराने के कारण जानें गईं, तब संविधान की उस मंशा का क्या, जिसमें जीवन जीने के अधिकार को बुनियादी अधिकार बताया जाता है ?
इंदौर का यह हादसा – कोई घटना नहीं है, अपितु यह हमारी व्यवस्था और तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. केवल इंदौर का महापौर ही नहीं, देश में आए दिन ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं, जब नगर पंचायत, ग्राम पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम, जिला पंचायत, जनपद पंचायतों के चुने हुए प्रतिनिधियों की व्यापक लोकहित की बातों को तंत्र नजरअंदाज करता है. ग्राम पंचायत में सचिव सरपंच की नहीं सुनते हैं ! तब क्या यह कहा जाएगा कि गणतंत्र के 77 वर्षों बाद भी हमारे देश में तंत्र – अभी भी गण पर हावी है ! तब आम जनता की स्थानीय शासन में हिस्सेदारी का क्या?
भारत में अभी भी तंत्र का अपना एक जाल है. ऐसा कहा जाता है कि शक्तिशाली तो इसे तोड़ देते है. लेकिन निरीह प्राणी इस जाल में फंस कर रह जाते हैं. देश के अलग-अलग क्षेत्रों में यदि माफिया हावी हैं, तो निश्चित ही इसके लिए किसी हद तक चुने हुए जनप्रतिनिधि भी जिम्मेदार हैं और तंत्र भी. आए दिन खबरें आती हैं – समिति सेवक, सिपाही, वनपाल, क्लर्क, दैनिक वेतनभोगी, पटवारी, नगर निगम का सबसे छोटा कर्मचारी, इनके जैसे और भी कर्मी – छापों के बाद करोड़ोंपति बनकर सामने आ रहे हैं. तब फिर बड़े अधिकारियों के बारे में क्या ही कहना ! सरकारी सेवाओं का भ्रष्टाचार – आम आदमी को रुला रहा है और हमारे मूल्य कोने में हाथ बांधे खड़े रहते हैं! 1947 हो या 1950, हमने इस तरह के समग्र तंत्र और व्यवस्था का सपना तो नहीं देखा था ! हमारी व्यवस्था में इस जैसे अनेक सुराख हैं, जो हमें निरंतर कचोटते रहते हैं !
समाज, चुने हुए जनप्रतिनिधियों, समाज व व्यवस्था के नायकों, मतनिर्माताओं सब को मिलकर इन सुराखों का इलाज करना होगा. आज फिर गणतंत्र दिवस पर हम सबको यह संकल्प लेना चाहिए. हम सबको एक साथ मिलकर इस दिशा में आगे बढऩा होगा. आप सभी को गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं…!!!














