गुवाहाटी : हिमंत बिस्व सरमा असम में युवाओं के बीच ‘मामा’ के तौर पर लोकप्रिय हैं। जनसभाओं में वह रॉकस्टार की तरह समर्थकों से हाथ मिलाते हैं। उनके साथ सेल्फी लेने के लिए युवाओं में होड़ लगी रहती है। सरकार की ‘बाबू आसोनी’ और ‘ओरुनदोई’ स्कीम भी बीजेपी के पक्ष में माहौल बना रही है। इसके बावजूद हिमंत बिस्वा सरमा डंके की चोट पर मिया मुसलमानों के खिलाफ तीखी बयानबाजी कर रहे हैं। उनके बयानों का कांग्रेस विरोध कर रही है, मगर मिया वाले नैरेटिव का जवाब उसके पास नहीं है। गौरव गौगोई के नेतृत्व में चुनाव की तैयारी कर रही कांग्रेस ने सरमा सरकार के खिलाफ करप्शन के कई आरोप लगाए, मगर अभी तक यह टिकाऊ मुद्दा नहीं बना। पार्टी मुसलमानों के पक्ष में भी खुलकर बोल नहीं रही है।

कांग्रेस के नेताओं में ही मतभेद

दो महीने बाद असम में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो जाएगा। मिया मुसलमानों को टारगेट कर रहे हिमंत बिस्वा सरमा बीजेपी के लिए हैट्रिक लगाने का दावा कर रहे हैं। आंतरिक कलह और कमजोर स्थिति के कारण कांग्रेस काउंटर नहीं कर पा रही है। कांग्रेस ने आजादी के बाद असम में लंबे समय तक शासन किया है। तरुण गौगोई के नेतृत्व में पार्टी लगातार 15 साल तक सत्ता में रही। कांग्रेस के पास मुसलमान और अहोम वोटरों की ताकत हमेशा ही रही है। आदिवासी और चाय बागान के वर्करों का साथ हमेशा उसे मिला। 2016 में बीजेपी ने इसी वोट बैंक में सेंध लगाई और सत्ता हासिल कर ली। पार्टी के नेता मानते हैं कि असम कांग्रेस के प्रभारी जितेंद्र सिंह और प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के बीच मतभेद हैं। कांग्रेस के गठबंधन में शामिल सीपीएम, रायजोर दल और असम जातीय परिषद भी दमदार स्थिति में नहीं है। इसका सीधा फायदा बीजेपी और हिमंत बिस्वा सरमा उठा रहे हैं।

हिमंत बिस्वा सरमा ने चले कई दांव

असम में हिमंत बिस्वा सरमा ने चुनावी राज्य असम में रणनीतिक तौर से बिसात पर सारे घोड़े खोल रखे हैं। बीजेपी सरकार ‘ओरुनदोई’ स्कीम के तहत 37 लाख महिला लाभार्थियों को बीहू के उपहार के रूप में 8,000 रुपये दे चुकी है। ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन में पढ़ने वाले युवा वोटरों के लिए बाबू आसोनी योजना चल रही है। जिसके तहत ग्रैजुएशन करने वाले स्टूडेंट को 1000 और पीजी स्टूडेंट को 2000 रुपये दिए जा रहे हैं। इसके अलावा 10वीं और 11वीं में पढ़ने वाली लड़कियों को सीए निजुत मोइना स्कीम के तहत पैसे दिए जा रहे हैं। महिलाओं के लिए अलग योजना चल रही है। हिमंत बिस्वा सरमा भी असम में उसी तरह मामा के नाम से लोकप्रिय हो चुके हैं, जैसे शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश में। हिमंता भी रैलियों में युवाओं को भांजा-भांजी बुलाते हैं। अब असम बीजेपी के भीतर उनके नेतृत्व को चुनौती देने वाला कोई चेहरा नहीं है और उन्हें दिल्ली हाईकमान का आशीर्वाद भी हासिल है।

मिया मुसलमानों के लिए विवादित बयान

नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी के रणनीतिकार हिमंत बिस्व सरमा लोकलुभावन स्कीम लागू करने के बाद भी बंगाली मूल के मुसलमान यानी मिया मुसलमान वाले नैरेटिव को हवा दे दी है। हाल ही में उन्होंने कई ऐसे बयान दिए, जिस पर काफी विवाद हुआ। एक बयान में उन्होंने कहा कि मिया यहां चैन से नहीं रह सकते, हम उनके लिए परेशान करेंगे, वे तभी भागेंगे। अगर वो रिक्शा के लिए 5 रुपये मांगें, तो उसे 4 रुपये ही दो। इसके अलावा उन्होंने बीजेपी कार्यकर्ताओं से अपील की वोटर लिस्ट से मिया मुसलमानों को हटाने के लिए ज्यादा से ज्यादा फॉर्म-7 चुनाव आयोग में जमा करें। विवाद होने पर उन्होंने खुले तौर पर कहा कि मिया मुसलमान बांग्लादेश से आए हैं, जिससे असम की अस्मिता को खतरा है, इसलिए वह विरोध करते रहेंगे। हिमंता ने इस चुनाव में बांग्ला भाषी मिया मुसलमानों को चुनावी मुद्दा बना दिया। असम में चुनाव के ऐलान से पहले वोटों का ध्रुवीकरण हो चुका है। वह पहले ही बहु विवाह, बाल विवाह और मदरसों के खिलाफ कानून बना चुके हैं।

खेमों में बंटी कांग्रेस में गोगोई अकेले

कांग्रेस की मुसीबत यह है कि कांग्रेस प्रभारी से टकरा रहे गौरव गोगोई अहोम और मुस्लिम वोटरों को साथ लाने अभी तक विफल रहे हैं। लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के कारण पार्टी कई खेमों में बंटी हुई है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब हिमंत बिस्व सरमा ने गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ पर पाकिस्तान से दोस्ती के आरोप लगाए तो दूसरे कांग्रेस नेता खामोश रहे। आखिरकार गौरव गोगोई को डिफेंसिव मोड में आना पड़ा। गोगोई ने जब असम सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया तब भी उन्हें व्यापक समर्थन नहीं मिला। मिया मुसलमान के मुद्दे पर पार्टी सत्ताधारी बीजेपी और सीएम हिमंत बिस्व सरमा को घेरने में विफल हुई। पिछले साल कांग्रेस की किरकिरी भी हुई, जब राभा हासोंग स्वायत्त परिषद (RHAC) चुनावों के दौरान उसके दो उम्मीदवारों ने अंतिम समय में नाम वापस ले लिए। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले उनके दो विधायक भी बीजेपी में चले गए।

AIUDF ने मुस्लिम वोटरों में बनाई पैठ

पांच साल तक असम में कांग्रेस मजबूत विपक्ष की पहचान नहीं बचा सकी, जबकि राज्य की तीसरी ताकत बजरुद्दीन अजमल ने लोअर असम और बराक घाटी में हिमंता के मिया वाले नैरेटिव को लपक लिया है। उनकी पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) मिया मुसलमानों में ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह कांग्रेस के लिए खतरा है, जबकि बीजेपी के लिए फायदे का सौदा है। अगर मुस्लिम वोट बंटता है तो बीजेपी और उसके गठबंधन के साथी असम गण परिषद, पीपल्स पार्टी लिबरल और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट को फायदा मिल सकता है।

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