उत्तर प्रदेश, नेटफ्लिक्स पर आने वाली एक वेब सीरीज ‘घुसखोर पंडत’ का ट्रेलर सामने आया, जिसके शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समाज के कुछ संगठनों ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यह नाम एक जाति विशेष को अपमानित करता है। मामला बढ़ता देख मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए तुरंत एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए। लखनऊ के हजरतगंज थाने में निर्देशक नीरज पांडे और उनकी टीम के खिलाफ केस दर्ज किया गया। आरोप है कि शीर्षक से सामाजिक सौहार्द बिगड़ सकता है। सरकार के कहने पर ट्रेलर हटाया गया। फिल्म से जुड़े लोगों ने भी बयान जारी कर कहा कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था।
इतनी जल्दी कार्रवाई क्यों हुई?
राजनीतिक जानकार इसे आने वाले चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। यूपी में ब्राह्मण मतदाता लगभग 12–14% माने जाते हैं, लेकिन उनका प्रभाव 100 से ज्यादा सीटों पर माना जाता है। कम संख्या में होने के बावजूद यह वर्ग चुनावी परिणाम प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ऐसे समय में जब ब्राह्मण विधायकों की बैठक चर्चा में थी, इस विवाद पर सरकार की त्वरित कार्रवाई को संदेशात्मक कदम माना जा रहा है।
ब्राह्मण प्रभाव वाले प्रमुख जिले
गोरखपुर, वाराणसी, देवरिया, जौनपुर, बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, अमेठी, चंदौली, कानपुर और प्रयागराज जैसे जिलों में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका प्रभावशाली मानी जाती है।
नाराजगी की चर्चा क्यों?
अंदरखाने चर्चा है कि कुछ ब्राह्मण नेता सरकार और संगठन में अपनी भागीदारी को लेकर असंतोष जता रहे हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई खुली बयानबाज़ी नहीं हुई, लेकिन दिसंबर की बैठक को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। इससे पहले क्षत्रिय विधायकों की भी एक बैठक चर्चा में रही थी।
ब्राह्मण समाज की राजनीतिक ताकत
यूपी के इतिहास में अब तक 21 मुख्यमंत्रियों में 6 ब्राह्मण रहे हैं। मंडल राजनीति के बाद समीकरण बदले, लेकिन ब्राह्मण मतदाता अब भी कई सीटों पर निर्णायक माने जाते हैं। यही वजह है कि सभी दल इस वर्ग को साधने के लिए सम्मेलन, संवाद और धार्मिक प्रतीकों का सहारा लेते रहे हैं।
सिर्फ फिल्म नहीं, राजनीतिक संदेश भी
‘घुसखोर पंडत’ विवाद अब सिर्फ मनोरंजन जगत का मामला नहीं रह गया है। इसे राजनीतिक संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। बसपा प्रमुख मायावती ने भी कार्रवाई का समर्थन किया, जिससे साफ है कि इस मुद्दे पर विपक्ष भी खुलकर विरोध की राह पर नहीं गया। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण और भावनात्मक मुद्दे चुनाव से पहले कितने संवेदनशील हो जाते हैं।














