दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूरोपीय संघ और भारत ने मुक्त व्यापार समझौता करने की घोषणा की है। इसे दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक समझौतों में से एक कहा जा रहा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस समझौते की सबसे बड़ी वजह मौजूदा वैश्विक राजनीति है, जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कारोबार का इस्तेमाल अन्य देशों पर दबाव बनाने के लिए एक कूटनीतिक हथियार की तरह कर रहे हैं। अमरीका की इसी आक्रामकता का जवाब देने के लिए यूरोपीय संघ और भारत तेजी से मुक्त व्यापार समझौते की तरफ बढ़े हैं लेकिन इसके प्रभावी होने में अभी लंबा वक्त लग सकता है क्योंकि इसे कानूनी रूप देने के लिए यूरोपीय संघ की पाॢलयामैंट और यूरोपीय परिषद में पारित करवाना है।
बहरहाल, भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमैंट केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन और भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं का भी संकेत देता है। यह डील ऐसे समय में सामने आई है, जब अमरीका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा हुआ है और अमरीका भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ लागू कर चुका है। लेकिन यूरोपीय संघ और भारत के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते ने अमरीका को आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर असहज कर दिया। यही वजह है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को आखिरकार झुकना पड़ा और भारतीय सामानों पर लगने वाला टैरिफ 25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करना पड़ा।
यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि इससे पहले तक बातचीत बेनतीजा रही थी और अमरीका लगातार भारत पर दबाव बना रहा था। यह समझौता सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि दबाव, मजबूरी और रणनीतिक बदलाव की भी मिसाल है। ट्रम्प के इस फैसले के पीछे भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच हुई बड़ी ट्रेड डील अहम वजह बनी। इस डील से भारत की ताकत बातचीत में बढ़ गई और अमरीका को यह डर सताने लगा कि कहीं वह पीछे न छूट जाए। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले ही भारत-ई.यू. डील को विकास, निवेश और रणनीतिक सांझेदारी के लिए बड़ा कदम बताया था।
गौरतलब है कि दुनिया को जब डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ वॉर झकझोर रही थी, तब भारत ने सीधे टकराव की बजाय कूटनीति का रास्ता चुना। भारत ने अपने उत्पादों के लिए वैकल्पिक बाजार तलाशे। यूरोपियन यूनियन के साथ ऐतिहासिक डील, ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ समझौतों ने अमरीका पर दबाव बढ़ा दिया। ट्रम्प को समझ आ गया कि भारत के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेडऩा एक बड़ी गलती थी। यह समझौता सिर्फ कारोबार तक ही सीमित नहीं, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक राजनीति पर भी होंगे, खासकर अमरीकी आक्रामक कारोबार नीति पर।
अमरीका लंबे समय से भारत जैसे बड़े बाजार के साथ एक बड़ी ट्रेड डील करना चाहता था, ताकि वह भारतीय बाजार से अधिकतम लाभ उठा सके। ऐसे में भारत और ई.यू. के बीच हुई डील अमरीका के लिए एक रणनीतिक झटका है, क्योंकि इससे अमरीका-भारत ट्रेड एग्रीमैंट की संभावनाएं कमजोर होती दिख रही थीं। यूरोपीय संघ के साथ समझौता आगे बढ़ाने का भारत का फैसला उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता को दर्शाता है। इसी कदम ने संभवत: अमरीका को यह संकेत दिया कि अगर वह भारत के साथ समझौता जल्दी नहीं करता, तो उसे रणनीतिक और आर्थिक नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि ट्रम्प को अपनी रणनीति भारत के खिलाफ बदलनी पड़ी।भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों, जैसे कि रूसी कच्चा तेल पर समझौता किए बिना भी वैश्विक शक्तियों के साथ बराबरी के स्तर पर व्यापार कर सकता है। साफ है, भारत ने अमरीका के साथ सीधे टकराव की बजाय धैर्य, कूटनीति और वैकल्पिक बाजारों की रणनीति अपनाई। नतीजा यह हुआ कि टैरिफ वॉर में भारत मजबूती से खड़ा रहा और आखिरकार झुकना अमरीका को पड़ा।
बहरहाल, यह समझौता भारत के लिए कई महत्वपूर्ण सबक और चुनौतियां भी पेश करता है। यह दर्शाता है कि प्रमुख ग्लोबल अर्थव्यवस्थाओं के बीच संरक्षणवाद बढ़ रहा है। देश अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए टैरिफ और व्यापार धमकियों का इस्तेमाल करने में संकोच नहीं कर रहे। भारत को अपनी निर्यात रणनीतियों और व्यापार समझौतों को इस बदलते सीन के अनुरूप ढालना होगा। अगर अमरीका और ई.यू. जैसे बड़े ब्लॉक द्विपक्षीय समझौतों पर फोकस करते हैं तो भारत को अपनी सप्लाई चेन को और अधिक लचीला और विविध बनाने की जरूरत होगी ताकि एक या दो प्रमुख बाजारों पर निर्भरता कम हो सके।
यह समझौता भारत को अपने खुद के मुक्त व्यापार समझौतों को तेजी से अंतिम रूप देने और मजबूत करने के लिए प्रेरित कर सकता है। विशेष रूप से उन देशों के साथ, जो प्रमुख व्यापारिक भागीदार हैं ताकि भविष्य में संभावित व्यापारिक दबावों से बचा जा सके। यह ग्लोबल ट्रैंड भारत को ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों के माध्यम से अपने स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता को और मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, ताकि वह बाहरी झटकों के प्रति कम संवेदनशील बने।-रवि शंकर














