भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में आयोजित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन भारतीय न्यायपालिका के लिए एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाना चाहिए. यह केवल औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि उस न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर चिंतन है, जो वर्षों से लंबित मामलों, प्रक्रियागत जटिलताओं और आम नागरिक की सीमित पहुंच से जूझ रही है. ऐसे समय में राष्ट्रीय न्यायिक नीति का विचार न्यायिक सुधारों की धुरी बनकर सामने आया है.
भारत की न्यायपालिका संरचनात्मक रूप से संघीय है, किंतु न्याय की अपेक्षा पूरे देश में एक जैसी है. इसके बावजूद अलग अलग राज्यों की अदालतों में प्रशासनिक प्रक्रियाओं, कार्यशैली और तकनीकी उपयोग में भारी असमानता दिखाई देती है. राष्ट्रीय न्यायिक नीति का उद्देश्य इसी असंतुलन को समाप्त कर एक समान न्यायिक दृष्टिकोण विकसित करना है. जब अदालतों की प्रक्रियाएं स्पष्ट और मानकीकृत होंगी, तब न्याय केवल निर्णय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम नागरिक के अनुभव में भी भरोसेमंद बनेगा. दरअसल,लंबित मामलों की समस्या भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती है. करोड़ों मामले वर्षों से विचाराधीन हैं, जिससे न्याय में देरी एक सामान्य स्थिति बन गई है. राष्ट्रीय न्यायिक नीति के अंतर्गत यदि मामलों के वर्गीकरण, प्राथमिकता निर्धारण और समय प्रबंधन के लिए स्पष्ट दिशा तय की जाती है, तो लंबित मामलों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है. तथ्य और आंकड़ों के आधार पर नीति निर्माण न्यायिक प्रणाली को अधिक व्यावहारिक और परिणामोन्मुख बना सकता है.
न्यायिक सुधारों में तकनीक की भूमिका अब अनदेखी नहीं की जा सकती. डिजिटल सुनवाई ने यह सिद्ध किया है कि न्यायालय की कार्यवाही केवल भौतिक उपस्थिति तक सीमित नहीं है. वीडियो माध्यम से सुनवाई, अंकीय दस्तावेज और ऑनलाइन सूचना प्रणाली ने न्याय को अधिक सुलभ बनाया है. इससे समय की बचत होती है और अनावश्यक स्थगन की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगता है.
परंतु तकनीक का लाभ तभी सार्थक होगा, जब वह सभी तक समान रूप से पहुंचे. यही डिजिटल समानता की मूल भावना है. आज महानगरों और उच्च न्यायालयों में तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जिला और तहसील स्तर की अदालतें अब भी संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं. राष्ट्रीय न्यायिक नीति यदि डिजिटल समानता को अनिवार्य लक्ष्य के रूप में अपनाती है, तो न्यायिक व्यवस्था में क्षेत्रीय असमानता कम होगी. दरअसल,
जन केंद्रित न्याय की अवधारणा इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है. आम नागरिक के लिए न्यायालय आज भी भाषा, खर्च और जटिल प्रक्रियाओं का प्रतीक बना हुआ है. यदि राष्ट्रीय न्यायिक नीति के माध्यम से सरल भाषा, क्षेत्रीय भाषाओं में निर्णयों की उपलब्धता और मुवक्किल अनुकूल व्यवस्था विकसित होती है, तो न्यायपालिका और समाज के बीच की दूरी कम होगी. न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि महसूस भी होना चाहिए.
न्यायिक सुधार लोकतंत्र की मजबूती से सीधे जुड़े हुए हैं. एक सक्षम, पारदर्शी और उत्तरदायी न्यायपालिका ही संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कर सकती है. राष्ट्रीय न्यायिक नीति इस दिशा में सुधारों को निरंतरता और स्थायित्व देने का माध्यम बन सकती है. कुल मिलाकर भोपाल सम्मेलन ने यह संकेत दिया है कि न्यायपालिका अब परिवर्तन की आवश्यकता को स्वीकार कर रही है. अब चुनौती इस मंथन को ठोस नीति और प्रभावी क्रियान्वयन में बदलने की है. यदि राष्ट्रीय न्यायिक नीति संवैधानिक मर्यादाओं और सहमति के साथ आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत साबित होगी. दरअसल, केंद्र सरकार को इस सम्मेलन में प्राप्त सुझावों पर गंभीरता से विचार करके अमल में लाना चाहिए.














