प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संसदीय संबोधन में खुलासा किया है कि भारत 9 देशों के साथ व्यापार समझौते कर चुका है और 24 देशों के साथ वार्ताएं जारी हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी संसद को बताया है कि भारत और खाड़ी देश सहयोग परिषद् के 6 देशों के बीच गुरुवार को ‘मुक्त व्यापार समझौते’ पर बातचीत शुरू करने की शर्तों पर सहमति बन गई है। इन देशों में संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान शामिल हैं। वाणिज्य मंत्री ने यह भी खुलासा किया है कि भारत-अमरीका का साझा बयान 4-5 दिन में सार्वजनिक हो जाएगा, जबकि मार्च मध्य में समझौते पर हस्ताक्षर होंगे। जाहिर है कि अभी बहुत कुछ तय होना है। सिर्फ दोनों देश सैद्धांतिक तौर पर सहमत हुए हैं। इस संदर्भ में विपक्ष का प्रलाप समझ के परे है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने यहां तक कह दिया कि समझौते से भारतीय किसान बर्बाद हो जाएंगे। किसी ने कहा कि रात के अंधेरे में किसानों के साथ विश्वासघात किया गया है। आखिर विपक्ष के नेता ‘किसान-विरोधी समझौते’ पर विलाप क्यों कर रहे हैं, जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी स्पष्ट कर चुके हैं कि कृषि और डेयरी क्षेत्रों को लेकर कोई समझौता नहीं किया गया है? किसान और पशुपालक पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित हैं। यथार्थ यह भी है कि कृषि के कई उत्पादों का भारत को आयात करना पड़ता है, क्योंकि हमारे किसान उतना उत्पादन नहीं कर सकते, जितनी खपत है। लोगों को तो चाहिए। हम दालें, सूखे मेवे, खाद्य तेल, फल और सब्जियों का 26 अरब डॉलर का आयात करते हैं। यानी विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में मौजूद हैं और अरबों डॉलर का व्यापार कर रही हैं। बेशक अमरीका से इन कृषि उत्पादों का आयात कम किया जाता है। यदि अमरीका से यह आयात सस्ता पड़ेगा, तो क्या हम समझौते से चिपके रहेंगे और अमरीका से ये उत्पाद नहीं खरीदेंगे? बेहद संवेदनशील सवाल है। चूंकि देश में इन उत्पादों की खपत है, जरूरत है, लिहाजा आयात करना ‘राष्ट्रीय मजबूरी’ है।

भारतीय स्टेट बैंक की एक रपट सामने आई है कि यदि अमरीका से डेयरी उत्पाद भारत में आए, तो यहां के दुग्ध उत्पादक किसानों को करीब 1,03,000 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। क्या यह सटीक और व्यावहारिक रपट है? यह भी दलील दी जा रही है कि अमरीका में गायों को मांस और चर्बी आदि खिलाते हैं, लिहाजा उनके दूध में उसके प्रभाव भी शामिल होंगे और इस तरह असंख्य भारतीयों का धर्म भ्रष्ट हो सकता है। कुल मिला कर ऐसा प्रतीत होता है मानो कृषि और डेयरी क्षेत्र आज भी अपंग-अधूरे हैं। हालांकि भारत में दुग्ध कारोबार 7.5-9 लाख करोड़ रुपए का है। हम विश्व में सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश होने का भी दावा करते रहे हैं। हमने दूध की कमी और संकट के दौर भी देखे और झेले हैं। भारत में 13 जनवरी, 1970 को जब ‘ऑपरेशन फ्लड’ का आगाज किया गया था, तो उसे दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम करार दिया गया था। उसे ‘श्वेत क्रांति’ का नाम भी दिया गया था, लेकिन उससे पहले भारत दूध की कमी वाला देश था। इस ‘श्वेत क्रांति’ के सूत्रधार थे-डॉ. वर्गीज कुरियन। लगभग ऐसा ही हाल कृषि का है। आजादी के 78 सालों के बाद भी सहस्र वर्षों पुरानी कृषि इस स्थिति में नहीं है कि विदेशी प्रतिस्पद्र्धा का मुकाबला कर सके। किसान भी गरीब है और सरकारी मदद के भरोसे रहता है, लिहाजा भारत को आज भी कृषि और किसान को संरक्षण देना पड़ रहा है। व्यापार समझौतों पर बातचीत के दौरान भारत को इन दो मुद्दों पर अड़े रहना पड़ता है। अलबत्ता यूरोपीय संघ और अमरीका के साथ व्यापार समझौते कभी के तय हो गए होते! किसान भारत की राजनीतिक बाध्यता भी हैं। इस वोट बैंक के दबाव के आगे सभी को झुकना पड़ता है। अमरीका की जीडीपी में कृषि का योगदान मात्र 1 फीसदी है और यूरोपीय संघ में 1.6 फीसदी है, लेकिन भारतीय जीडीपी में कृषि का योगदान आज भी 16.3 फीसदी है, लिहाजा यह बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। भारत सरकार को इन पहलुओं पर विचार करते हुए कृषि को स्वायत्त और ‘बड़ा बच्चा’ बनने देना चाहिए। किसानों की केंद्र सरकार से कई अपेक्षाएं हैं, जिन्हें पूरा किया जाना चाहिए।

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