कैंसर और मधुमेह (डायबिटीज) भारत में दोहरा, जानलेवा, गंभीर स्वास्थ्य संकट हैं। देश में 2025 तक मधुमेह पीडि़तों की अनुमानित संख्या 12.49 करोड़ है। करीब 8-18 फीसदी कैंसर रोगियों को मधुमेह भी होता है, लिहाजा टाइप-2 मधुमेह के कारण स्तन, कोलन, लिवर, पैंक्रियाज के कैंसर का जोखिम 20-30 फीसदी तक बढ़ जाता है। भारत में मुख कैंसर विश्व में सबसे अधिक है, क्योंकि भारतीय तंबाकू का सेवन बहुत करते हैं। फेफड़े, श्वास-नली, बड़ी आंत या मलाशय, पैंक्रियाज, स्तन आदि के कैंसर करीब 50 फीसदी मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। पहली बार बजट में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को 1 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। कुल बजट 1,01,709 करोड़ रुपए का है, जिसे पांच साल में 42 फीसदी बढ़ाया गया है, लेकिन जीडीपी का जितना हिस्सा स्वास्थ्य और शिक्षा पर आवंटित किया जाना चाहिए, उतना बजट नहीं दिया जा रहा है। यह विडंबना और संकुचित सोच का नतीजा ही है। स्वास्थ्य का बजट अब भी 2 फीसदी से कम है, जो 147 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश के लिए ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ समान है। देश का औसतन 9वां नागरिक कैंसर-पीडि़त है। अभी तक कैंसर लगभग लाइलाज है, क्योंकि देश में सुविधाएं और चिकित्सा पर्याप्त नहीं है। जहां इलाज उपलब्ध है, वहां लंबी प्रतीक्षा है, मशीनें खराब पड़ी रहती हैं, डाक्टर भाी गायब रहते हैं, शोध का स्तर उथला है और अंतत: इलाज बेहद महंगा है। राजधानी दिल्ली की नाक के तले ही कैंसर की नकली दवाइयां बनाई और बेची जा रही हैं। कुछ गिरोह पकड़े भी जाते हैं, लेकिन उनका कानूनी निष्कर्ष क्या होता है, कितना दंडनीय अपराध साबित होता है, उनका सार्वजनिक खुलासा नगण्य है।
बहरहाल बजट में कैंसर, मधुमेह समेत 7 गंभीर बीमारियों की दवाएं सस्ती घोषित की गई हैं। बेशक कैंसर की दवाओं पर शुल्क घटने से इन दवाओं के आयात और वितरण से जुड़ी कंपनियों के मार्जिन में सुधार होगा। बजटीय आबंटन 10,000 करोड़ रुपए का सीधा लाभ उनको मिलेगा, जो ‘बायोसिमिलर्स’ और शोध पर काम कर रही हैं। बॉयोकॉन, सन फार्मा, जायडस लाइफ साइंसेज को ये लाभ मिल सकते हैं। डा. रेड्डीज कैंसर की कई महत्त्वपूर्ण दवाओं के उत्पादन और वितरण में सक्रिय है। नेटको फार्मा की कैंसर दवाओं के पोर्टफोलियो में इसकी बड़ी पकड़ है। मौजूद सवाल यह है कि देश में कैंसर का इलाज मुफ्त क्यों नहीं किया जा सकता? अथवा जो अस्पताल कैंसर के इलाज के लिए चिह्नित किए जाएं, उनमें इतना अनुशासन और सख्ती की जानी चाहिए कि आम आदमी को कैंसर का इलाज 100 फीसदी सुनिश्चित किया जा सके। जब देश में ‘मुफ्त की रेवडिय़ां’ बांटने की राजनीतिक संस्कृति पुख्ता हो चुकी है और इस आधार पर चुनाव जीते जा रहे हैं, तो कैंसर किसी की जिंदगी और मौत से जुड़ी बीमारी है। ‘अमीर अर्थव्यवस्था’ वाला देश कैंसर का मुफ्त इलाज मुहैया क्यों नहीं करा सकता? किसानों की सम्मान राशि के लिए बजट में 65,000 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया है, तो कैंसर-पीडि़तों के लिए बजटीय प्रावधान क्यों नहीं किया जा सकता? देश में दवाओं का इतना संकट नहीं है, बल्कि अस्पताल और डाक्टरों की उपलब्धता बहुत कम है। हास्यास्पद् है कि बजट में ‘मेडिकल पर्यटन’ की खूब गालबजाई की गई है। राजधानी दिल्ली में ही प्रति लाख आबादी पर अस्पताल मात्र 0.52 है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और मणिपुर में प्रति लाख आबादी पर औसतन एक अस्पताल नहीं है। सबसे कम डाक्टर नगालैंड, मिजोरम, झारखंड, छत्तीसगढ़ और बिहार में उपलब्ध हैं। देशवासियों और विदेशियों को सहज और सुलभ इलाज कैसे मुहैया कराएंगे? बहरहाल 1 लाख एलाइड पेशेवरों को प्रशिक्षण और 1000 करोड़ रुपए का बजट, 3 नये नेशनल फार्मा संस्थान, 50 फीसदी ट्रॉमा केयर सेंटर, जिलेवार अस्पताल, आयुष फार्मेसी, ड्रग टेस्टिंग लैब, जामनगर स्थित टेऊडिशनल मेडिसन सेंटर और मानसिक स्वास्थ्य केंद्र की घोषणाएं अच्छी हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति और सक्रियता जमीन पर भी दिखनी चाहिए। यदि लद्दाख, चंडीगढ़, पुड्डुचेरी, केरल, तमिलनाडु में प्रति लाख आबादी पर सबसे अधिक बेड उपलब्ध हो सकते हैं, तो यही व्यवस्था देश भर में भी की जा सकती है। बहरहाल जो भी है, बजट का स्वागत है, बशर्ते जो आवंटित किया गया है, उसका पूरी तरह इस्तेमाल हो।














